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UPI पर 0.4% चार्ज प्रस्ताव: विपक्ष का हमला — 'गरीब और छोटे दुकानदारों पर पड़ेगा बोझ'

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UPI पर 0.4% चार्ज प्रस्ताव: विपक्ष का हमला — 'गरीब और छोटे दुकानदारों पर पड़ेगा बोझ'

सारांश

UPI पर 0.4% मर्चेंट शुल्क का प्रस्ताव विपक्ष को एकजुट कर गया है। कांग्रेस, RJD, RSP और DMK का कहना है कि डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने के बाद उस पर ही चार्ज लगाना आम जनता और छोटे दुकानदारों से विश्वासघात है। व्यापारी यह बोझ ग्राहकों पर डालेंगे — और महंगाई बढ़ेगी।

मुख्य बातें

₹2,000 से अधिक के UPI मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर 0.4% शुल्क लगाने का प्रस्ताव सामने आया है।
कांग्रेस, RJD, RSP और DMK ने इस प्रस्ताव का एकजुट विरोध किया।
RJD सांसद मनोज झा ने कहा — छोटे दुकानदार का मार्जिन दाल पर ₹2 , दूध पर ₹1 ; ऐसे में शुल्क असहनीय होगा।
प्रेमचंद्रन की चेतावनी — व्यापारी यह बोझ अंततः ग्राहकों पर डालेंगे।
सरकार और BJP का कहना है कि यह शुल्क ग्राहक पर नहीं, केवल मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर है।
विपक्ष का आरोप — यह कदम डिजिटल इंडिया को पलटने जैसा और नोटबंदी की तरह आम लोगों पर बोझ डालने वाला है।

यूपीआई (UPI) के ज़रिए ₹2,000 से अधिक के मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लगाने के प्रस्ताव पर विपक्षी दलों ने 17 सितंबर 2026 को केंद्र सरकार के विरुद्ध तीखा मोर्चा खोल दिया। कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल (RJD), रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (RSP) और द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) ने एकजुट होकर इस कदम को आम जनता और छोटे व्यापारियों के आर्थिक हितों पर सीधा प्रहार करार दिया। विपक्ष का केंद्रीय तर्क यह है कि सरकार पहले नागरिकों को डिजिटल भुगतान की आदत डलवाती है और फिर उसी पर शुल्क लादती है।

कांग्रेस का तर्क: डिजिटल इंडिया से पलटी खाई सरकार

नई दिल्ली में कांग्रेस नेता शकील अहमद ने इस प्रस्ताव पर तीव्र नाराज़गी व्यक्त करते हुए कहा, 'सरकार को यह समझना चाहिए। पहले तो आपने लोगों को फोन से पेमेंट करने, आसानी से पैसे ट्रांसफर करने और आसान डिलीवरी की आदत डाली, और अब आप चार्ज लगा रहे हैं।' उन्होंने GST और नोटबंदी के उदाहरण देते हुए यह भी कहा कि 2014 से अब तक ऐसी नीतियों का बोझ बार-बार आम लोगों पर पड़ा है। अहमद ने आरोप लगाया कि बुनियादी ढाँचे पर खर्च के बावजूद शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में समस्याएँ बनी हुई हैं।

RJD का सवाल: छोटे दुकानदार कहाँ से भरेंगे चार्ज?

पटना में RJD सांसद मनोज झा ने सड़क किनारे की छोटी दुकानों का उदाहरण देते हुए कहा कि दाल पर सिर्फ ₹2 और दूध पर ₹1 का मार्जिन कमाने वाले दुकानदारों के लिए यह शुल्क असहनीय होगा। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यह निर्णय किसी 'विदेशी ताकत' के दबाव में लिया जा रहा है, जिसे उन्होंने अधिक चिंताजनक बताया। गौरतलब है कि छोटे खुदरा व्यापारियों का मुनाफा पहले से ही बड़े ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स की प्रतिस्पर्धा से दबाव में है।

RSP और DMK की चेतावनी: बोझ आखिर ग्राहक पर ही पड़ेगा

तिरुवनंतपुरम से RSP सांसद एन.के. प्रेमचंद्रन ने स्पष्ट किया कि सरकार भले ही कहे कि यह शुल्क ग्राहक पर नहीं पड़ेगा, वास्तविकता यह है कि व्यापारी इस बोझ को उपभोक्ताओं पर स्थानांतरित करेंगे। उन्होंने कहा, 'मर्चेंट यह बोझ नहीं उठाने वाले हैं।' चेन्नई में DMK प्रवक्ता टी.के.एस. इलांगोवन ने सवाल उठाया कि जब लोग पहले से ही करों का पूरा ढाँचा वहन कर रहे हैं, तो भुगतान करने की क्रिया पर अलग से शुल्क क्यों? उन्होंने कहा, 'वे नकद पैसे साथ नहीं रखते और UPI से पेमेंट करते हैं — बस इतना ही अंतर है।'

सरकार और BJP का पक्ष

सरकार और भारतीय जनता पार्टी (BJP) की ओर से स्पष्ट किया गया है कि यह प्रस्तावित शुल्क मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर है, सीधे ग्राहक पर नहीं। सरकार का तर्क है कि डिजिटल भुगतान का बुनियादी ढाँचा बनाए रखने की लागत को संतुलित करना ज़रूरी है और इससे आम उपभोक्ता प्रभावित नहीं होगा। हालाँकि, विपक्ष के अनुसार व्यापार-व्यवहार में यह अंतर केवल सैद्धांतिक है।

आम जनता और डिजिटल भुगतान पर असर

यह ऐसे समय में आया है जब भारत में UPI ट्रांजैक्शन प्रति माह अरबों की संख्या छू रहे हैं और देश को वैश्विक स्तर पर डिजिटल भुगतान में अग्रणी माना जाता है। विपक्ष का यह भी कहना है कि नोटबंदी के बाद नागरिकों को डिजिटल पेमेंट की ओर प्रोत्साहित किया गया था; अब उसी माध्यम पर शुल्क लगाना उस प्रतिबद्धता के विपरीत है। आलोचकों का कहना है कि इससे छोटे व्यापारी एक बार फिर नकद लेनदेन की ओर लौटने को मजबूर हो सकते हैं, जो डिजिटल इंडिया अभियान के लिए एक बड़ा झटका होगा। यह प्रस्ताव अभी विचाराधीन है और इस पर अंतिम निर्णय शेष है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन अर्थशास्त्र की यह बुनियादी सच्चाई है कि कारोबारी लागत का बोझ उपभोक्ताओं तक पहुँचता ही है — विशेषकर उन छोटे खुदरा विक्रेताओं के मामले में जिनका मार्जिन पहले से ही न्यूनतम है। विडंबना यह है कि नोटबंदी के बाद डिजिटल भुगतान को राष्ट्रीय कर्तव्य की तरह प्रचारित किया गया था; अब उसी आधारभूत ढाँचे पर शुल्क की संभावना उस नैतिक अनुबंध को तोड़ती दिखती है। सबसे बड़ा जोखिम यह है कि यदि छोटे व्यापारी नकद की ओर लौटते हैं, तो इससे कर-अनुपालन और पारदर्शिता — जो डिजिटल भुगतान के असली लाभ थे — दोनों कमज़ोर पड़ेंगे। सरकार को इस प्रस्ताव पर जनविश्वास और राजस्व के बीच संतुलन साधते हुए सार्वजनिक परामर्श की प्रक्रिया अपनानी चाहिए।
RashtraPress
17 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

UPI पर 0.4% चार्ज का प्रस्ताव क्या है?
यह प्रस्ताव ₹2,000 से अधिक के UPI मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर 0.4 प्रतिशत शुल्क लगाने से संबंधित है। यह शुल्क सीधे ग्राहक पर नहीं, बल्कि व्यापारियों (मर्चेंट) के लेनदेन पर लागू होना प्रस्तावित है, हालाँकि अभी तक इस पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।
विपक्ष इस प्रस्ताव का विरोध क्यों कर रहा है?
विपक्ष का तर्क है कि व्यापारी यह अतिरिक्त लागत अंततः ग्राहकों पर डालेंगे, जिससे महंगाई बढ़ेगी और गरीब व छोटे दुकानदार सबसे अधिक प्रभावित होंगे। कांग्रेस, RJD, RSP और DMK ने इसे डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने की नीति के विपरीत बताया है।
क्या यह शुल्क सीधे UPI यूज़र्स पर लगेगा?
सरकार और BJP का कहना है कि यह शुल्क मर्चेंट ट्रांजैक्शन पर है और आम ग्राहक पर सीधे लागू नहीं होगा। लेकिन RSP सांसद एन.के. प्रेमचंद्रन सहित कई विपक्षी नेताओं का कहना है कि व्यापारी यह बोझ उपभोक्ताओं पर डालेंगे, जिससे अप्रत्यक्ष रूप से आम जनता प्रभावित होगी।
इस प्रस्ताव से छोटे दुकानदारों पर क्या असर पड़ेगा?
RJD सांसद मनोज झा के अनुसार, सड़क किनारे की छोटी दुकानों पर दाल जैसी वस्तुओं पर मात्र ₹2 और दूध पर ₹1 का मार्जिन होता है। ऐसे में 0.4% का अतिरिक्त शुल्क उनके लिए असहनीय होगा और वे नकद लेनदेन की ओर लौटने को मजबूर हो सकते हैं।
क्या यह प्रस्ताव डिजिटल इंडिया अभियान को प्रभावित करेगा?
विपक्ष का आरोप है कि नोटबंदी के बाद डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा दिया गया था और अब उसी पर शुल्क लगाना उस प्रतिबद्धता के विपरीत है। आलोचकों का कहना है कि इससे व्यापारी और ग्राहक दोनों एक बार फिर नकद की ओर लौट सकते हैं, जो डिजिटल इंडिया के लक्ष्यों के लिए नुकसानदेह होगा।
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