उर्वरकों का बढ़ता आयात प्रतिशत: शक्ति सिंह गोहिल की चिंता
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नई दिल्ली, 16 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने सोमवार को राज्यसभा में एप्रोप्रिएशन बिल प्रस्तुत किया। कांग्रेस के सांसद शक्ति सिंह गोहिल ने एप्रोप्रिएशन बिल पर चर्चा करते हुए कहा कि इसमें फर्टिलाइजर के लिए करीब 19.23 हजार करोड़ रुपए की अतिरिक्त अनुदान मांग की गई है।
शक्ति सिंह गोहिल ने कहा, “मैं यह कहने को मजबूर हूं कि उर्वरकों के मामले में हमारा आयात प्रतिशत लगातार बढ़ता जा रहा है। पहले के मुकाबले आज हमें यूरिया का लगभग 138.8 प्रतिशत और डीएपी का 94.5 प्रतिशत आयात करना पड़ रहा है।”
उन्होंने आगे बताया कि इसी के साथ ही सरकार रक्षा सेवाओं के लिए भी अतिरिक्त धन की मांग कर रही है। उन्होंने कहा कि हमारे पड़ोसी देशों चीन और पाकिस्तान पर ध्यान देना आवश्यक है। चीन का अनुसंधान और विकास पर खर्च बहुत अधिक है। मैं नहीं कहता कि हमें उसकी सीधी तुलना करनी चाहिए, क्योंकि उसका सकल घरेलू उत्पाद काफी बड़ा है, लेकिन हमारे अनुसंधान एवं विकास बजट की तुलना अवश्य होनी चाहिए।”
उन्होंने वित्त मंत्री से कहा कि जब आप रक्षा सेवाओं के लिए 41,430 करोड़ रुपए की अतिरिक्त मांग लेकर आए हैं, तो यह भी देखना चाहिए कि क्या यह पर्याप्त है। गोहिल ने कहा कि वह रक्षा संबंधी स्थायी समिति के सदस्य हैं। समिति की आंतरिक चर्चा को यहाँ नहीं बताएंगे, लेकिन उन्होंने देखा है कि जब हमारी सेनाओं में पद खाली रहते हैं तो इसका सीधा असर देश की सुरक्षा पर होता है। उन्होंने कहा कि वह यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि न तो वह और न ही उनकी पार्टी ने कभी आतंकवाद या सेना के नाम पर राजनीति की है।
वहीं, शिवसेना शिंदे गुट के राज्यसभा सांसद मिलिंद देवड़ा ने कहा कि हम एप्रोप्रिएशन बिल पर चर्चा कर रहे हैं जब विश्व में वैश्विक अनिश्चितता का दौर चल रहा है। आज अलग-अलग हिस्सों में युद्ध हो रहे हैं और टैरिफ से जुड़े व्यवधान दिखाई दे रहे हैं। यह स्थिति वास्तव में अभूतपूर्व है। उन्होंने कहा कि ऐसे संकटों के बीच रास्ता निकालना और हर संकट को अवसर में बदलना किसी भी सरकार की असली ताकत होती है।
उन्होंने बताया कि हमारे 60 प्रतिशत तेल और गैस की आपूर्ति पश्चिम एशिया से होती है। कच्चे तेल की कीमतों में हर 10 डॉलर की वृद्धि हमारे खर्च और राजकोषीय घाटे पर लगभग 15 बिलियन डॉलर का अतिरिक्त दबाव डालती है। एक और महत्वपूर्ण बात है, जिस पर बहुत कम चर्चा होती है, कि मध्य पूर्व में काम करने वाले हमारे भारतीय श्रमिक हर साल लगभग 3.5 लाख करोड़ रुपए भारत भेजते हैं। यह भी हमारी अर्थव्यवस्था की एक बड़ी ताकत है।
उन्होंने कहा कि जिस तरह कोविड एक चुनौती थी, हमने उसे अवसर में बदला, उसी तरह आज पश्चिम एशिया में जो चुनौतियां हैं, उन्हें भी हम अवसर में बदल सकते हैं।
देवड़ा ने कहा, “आज मैं गर्व से कह सकता हूं कि दुनिया में भारत केवल आर्थिक और राजनीतिक स्थिरता का ही नहीं, बल्कि राजनीतिक संतुलन और समझदारी का भी एक मजबूत केंद्र बनकर उभरा है। भारत के लोग और मतदाता यह भली-भांति जानते हैं कि वास्तविक प्रदर्शन और समाज में अनावश्यक डर फैलाने वालों में क्या अंतर है।”
उन्होंने केंद्रीय सरकार और वित्त मंत्री को धन्यवाद दिया कि उन्होंने आर्थिक स्थिरीकरण कोष की स्थापना की है। देवड़ा ने कहा कि अगर हम केवल 5 से 10 प्रतिशत तक के अप्रभावी खर्च को तर्कसंगत बना दें तो हर साल लगभग 50,000 से 70,000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त राजकोषीय स्थान हम बना सकते हैं। यह बिना करदाताओं पर कोई नया बोझ डाले संभव है। इस बचत को अधिक प्रभावी योजनाओं में लगाया जा सकता है, विशेषकर उन योजनाओं में जो संपत्ति और बुनियादी ढांचा तैयार करती हैं। उदाहरण के लिए, राजस्व व्यय की तुलना में पूंजीगत व्यय पर अधिक खर्च किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि हमें घरेलू गैस उत्पादन में अधिक निवेश को प्रोत्साहित करना चाहिए। इसके साथ ही, हमें बायो-सीएनजी और वेस्ट-टू-गैस में अधिक निवेश करना चाहिए। भारत का कृषि और नगर कचरा हर साल लगभग 60 मिलियन टन बायोगैस पैदा करने की क्षमता रखता है। इससे आयातित सीएनजी और एलएनजी पर हमारी निर्भरता काफी कम हो सकती है। तीसरा, हमारे रणनीतिक तेल और गैस भंडार अभी केवल कुछ हफ्तों के लिए पर्याप्त हैं। इन भंडारों का विस्तार कर उन्हें कई महीनों तक के लिए पर्याप्त बनाया जाए, ताकि किसी भी वैश्विक झटके से निपटा जा सके।