28 जुलाई 2026
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यूएनएससी में अमेरिका का फ्रांस के खिलाफ वॉकआउट, वोल्कर टर्क की पुनर्नियुक्ति पर भड़का विवाद

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यूएनएससी में अमेरिका का फ्रांस के खिलाफ वॉकआउट, वोल्कर टर्क की पुनर्नियुक्ति पर भड़का विवाद

सारांश

संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका ने फ्रांस के खिलाफ वॉकआउट कर एक असाधारण कूटनीतिक संकेत दिया — वोल्कर टर्क की 144 देशों के समर्थन से हुई पुनर्नियुक्ति के बाद वाशिंगटन-पेरिस के बीच दरार खुलकर सामने आई। ट्रंप युग में पश्चिमी गठबंधन की एकता पर यह सबसे तीखा सार्वजनिक टकराव है।

मुख्य बातें

वोल्कर टर्क को 144 देशों के समर्थन से संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त का दूसरा कार्यकाल मिला; अक्टूबर 2026 से कार्यभार।
अमेरिकी राजनयिक डैन नेग्रिया ने यूएनएससी में फ्रांस पर 'दिखावटी नैतिकता' का आरोप लगाया और प्रतिनिधिमंडल बैठक छोड़कर निकल गया।
अमेरिका और रूस दोनों ने टर्क की पुनर्नियुक्ति के विरुद्ध मतदान किया, लेकिन विफल रहे।
अमेरिका का मतदान टालने का प्रस्ताव 63 के मुकाबले 27 वोटों से, और रूस का अगले वर्ष चुनाव का प्रस्ताव 71 के मुकाबले 19 वोटों से खारिज।
भारत ने टर्क के पक्ष में मतदान किया, लेकिन दोनों अन्य प्रस्तावों पर अनुपस्थित रहा।
फ्रांसीसी मिशन की एक्स पोस्ट — जिसमें अमेरिका को उत्तर कोरिया और रूस के साथ खड़ा बताया — ने ट्रंप प्रशासन की नाराजगी और बढ़ाई।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में 28 जुलाई 2026 को उस समय असाधारण तनाव देखने को मिला, जब अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल ने फ्रांस के स्थायी प्रतिनिधि जेरोम बोनाफोंट का वक्तव्य शुरू होते ही विरोधस्वरूप बैठक से वॉकआउट कर दिया। यह तनाव वोल्कर टर्क को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त के रूप में दूसरा कार्यकाल मिलने के बाद वाशिंगटन और पेरिस के बीच उभरे गहरे मतभेदों का नतीजा है।

मुख्य घटनाक्रम

यूक्रेन पर आयोजित सुरक्षा परिषद की चर्चा के दौरान अमेरिका के वरिष्ठ राजनयिक डैन नेग्रिया ने फ्रांस पर मानवाधिकार के मुद्दे पर 'दिखावटी नैतिकता' का आरोप लगाया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जब तक फ्रांस अपनी 'अहंकारी और अपमानजनक भाषा' नहीं छोड़ता, अमेरिका उसकी राजनीतिक बयानबाजी सुनने को तैयार नहीं है। इसी के बाद अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल बैठक छोड़कर बाहर निकल गया।

किसी करीबी पश्चिमी सहयोगी के खिलाफ इस तरह का वॉकआउट कूटनीतिक दृष्टि से अत्यंत असामान्य माना जा रहा है और इसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन तथा यूरोपीय सहयोगियों के बीच बढ़ते दरार का प्रतीक बताया जा रहा है।

विवाद की जड़: टर्क की पुनर्नियुक्ति

यह टकराव शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा में हुए उस मतदान से उपजा, जिसमें वोल्कर टर्क को अक्टूबर से शुरू होने वाले दूसरे कार्यकाल के लिए 144 देशों का समर्थन मिला। 10 देशों ने विरोध में और 13 ने मतदान से परहेज किया। अमेरिका और रूस दोनों ने टर्क की पुनर्नियुक्ति के विरुद्ध मतदान किया, लेकिन उन्हें रोकने में असफल रहे।

गौरतलब है कि वोल्कर टर्क ने अपने कार्यकाल में अमेरिका, रूस, इजरायल और भारत सहित कई देशों के मानवाधिकार रिकॉर्ड पर सवाल उठाए हैं। इसके बावजूद भारत ने उनके पक्ष में मतदान किया, हालाँकि महासभा के दोनों अन्य प्रस्तावों पर भारत अनुपस्थित रहा।

फ्रांस और अमेरिका के बीच वाकयुद्ध

जिनेवा स्थित फ्रांसीसी संयुक्त राष्ट्र मिशन ने शनिवार को अपने आधिकारिक एक्स अकाउंट पर लिखा: 'अमेरिका पहले मानवाधिकार का प्रतीक हुआ करता था, लेकिन अब नहीं। आज वह उत्तर कोरिया, निकारागुआ, माली और रूस के साथ अलग-थलग खड़ा है।' इस पोस्ट ने ट्रंप प्रशासन की नाराजगी और भड़का दी।

जवाब में संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के स्थायी प्रतिनिधि माइक वॉल्ट्ज ने एक्स पर लिखा कि फ्रांस ने ऐसे व्यक्ति के पक्ष में मतदान किया है जो 'अमेरिका, ब्रिटेन और इजरायल जैसे स्वतंत्र लोकतांत्रिक देशों को लगातार नसीहत देता है, जबकि दुनिया के सबसे दमनकारी शासनों के प्रति नरम रुख अपनाता है।'

अमेरिकी प्रतिनिधि बार्टोस ने भी एक्स पर तंज कसते हुए लिखा कि वोल्कर टर्क ने संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय को 'मृत्युशैया पर पहुंचा दिया है' और आज के मतदान ने उसकी 'अंतिम विदाई पर मुहर लगा दी।'

रूस का रुख और महासभा के प्रस्ताव

अमेरिका महासभा में मतदान टालने के अपने प्रस्ताव के समर्थन में केवल 27 वोट ही जुटा सका, जबकि 63 देशों ने इसके विरुद्ध और 47 ने परहेज किया। इसके बाद रूस ने प्रस्ताव रखा कि नए महासचिव के कार्यभार संभालने के बाद अगले वर्ष मानवाधिकार प्रमुख का चुनाव कराया जाए, लेकिन यह प्रस्ताव भी 71 वोटों के मुकाबले 19 वोटों से खारिज हो गया।

संयुक्त राष्ट्र में रूस के उप-स्थायी प्रतिनिधि दिमित्री चुमाकोव ने आरोप लगाया कि वोल्कर टर्क और उनका कार्यालय 'राजनीतिक पक्षपात' दिखाते हुए पश्चिमी देशों के भू-राजनीतिक हितों को आगे बढ़ा रहे हैं — एक ऐसा आरोप जो विरोधाभासी रूप से अमेरिका के अपने आरोपों से मेल खाता है।

आगे क्या होगा

वोल्कर टर्क अक्टूबर 2026 से अपना दूसरा कार्यकाल शुरू करेंगे। यह देखना होगा कि अमेरिका और फ्रांस के बीच यह कूटनीतिक खटास नाटो और पश्चिमी गठबंधन के व्यापक ढाँचे को किस हद तक प्रभावित करती है। विश्लेषकों के अनुसार, यह घटना संयुक्त राष्ट्र मंच पर ट्रांस-अटलांटिक एकता की बढ़ती दरारों का संकेत है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो संयुक्त राष्ट्र की राजनीति की जटिलता को उजागर करता है। फ्रांस की एक्स पोस्ट कूटनीतिक शिष्टाचार की सीमा लाँघती दिखी, लेकिन अमेरिका की प्रतिक्रिया की तीव्रता यह संकेत देती है कि वाशिंगटन अब बहुपक्षीय मंचों पर 'सहयोगी आलोचना' को भी उसी तरह लेता है जैसे विरोधी देशों की। यह घटना संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार तंत्र की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े करती है जब उसके सबसे बड़े वित्त-पोषक उसके प्रमुख को ही अस्वीकार कर रहे हों।
RashtraPress
28 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यूएनएससी में अमेरिका ने फ्रांस के खिलाफ वॉकआउट क्यों किया?
अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल ने फ्रांस के स्थायी प्रतिनिधि जेरोम बोनाफोंट का वक्तव्य शुरू होते ही बैठक छोड़ दी। अमेरिकी राजनयिक डैन नेग्रिया ने फ्रांस पर 'दिखावटी नैतिकता' और 'अहंकारी भाषा' का आरोप लगाया, जो वोल्कर टर्क की पुनर्नियुक्ति पर फ्रांसीसी मिशन की तीखी एक्स पोस्ट के बाद और भड़की।
वोल्कर टर्क कौन हैं और उन्हें दोबारा क्यों चुना गया?
वोल्कर टर्क संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त हैं, जिन्होंने अपने कार्यकाल में अमेरिका, रूस, इजरायल और भारत सहित कई देशों के मानवाधिकार रिकॉर्ड पर सवाल उठाए हैं। 144 देशों के समर्थन से उन्हें अक्टूबर 2026 से शुरू होने वाला दूसरा कार्यकाल मिला।
भारत ने इस मतदान में क्या रुख अपनाया?
भारत ने वोल्कर टर्क की पुनर्नियुक्ति के पक्ष में मतदान किया, हालाँकि टर्क भारत की भी आलोचना कर चुके हैं। अमेरिका और रूस के दोनों वैकल्पिक प्रस्तावों पर भारत अनुपस्थित रहा।
अमेरिका और रूस के प्रस्ताव क्यों खारिज हुए?
अमेरिका का मतदान टालने का प्रस्ताव 63 के मुकाबले केवल 27 वोट पाकर खारिज हुआ। रूस का अगले वर्ष चुनाव कराने का प्रस्ताव 71 के मुकाबले 19 वोटों से नकारा गया, जो यह दर्शाता है कि अधिकांश देश टर्क की पुनर्नियुक्ति के पक्ष में थे।
इस विवाद का पश्चिमी गठबंधन पर क्या असर पड़ सकता है?
विश्लेषकों के अनुसार, किसी नाटो सहयोगी के खिलाफ सुरक्षा परिषद में वॉकआउट अत्यंत असामान्य है और ट्रंप प्रशासन तथा यूरोपीय सहयोगियों के बीच बढ़ते मतभेदों का संकेत है। यह घटना नाटो एकता और बहुपक्षीय मंचों पर अमेरिका की भूमिका को लेकर व्यापक बहस को और तेज कर सकती है।
राष्ट्र प्रेस
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