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उस्ताद बिस्मिल्लाह खां पुण्यतिथि: शहनाई को मंगल-ध्वनि से विश्व-मंच तक ले जाने वाले भारत रत्न को नमन

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उस्ताद बिस्मिल्लाह खां पुण्यतिथि: शहनाई को मंगल-ध्वनि से विश्व-मंच तक ले जाने वाले भारत रत्न को नमन

सारांश

शहनाई को मंगल-ध्वनि की चौखट से उठाकर विश्व के संगीत-मंचों तक पहुँचाने वाले उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की आज पुण्यतिथि है। 21 अगस्त 2006 को 90 वर्ष की आयु में उनके निधन के साथ एक युग का पटाक्षेप हुआ, लेकिन उनकी साधना और सांस्कृतिक एकता का संदेश आज भी भारतीय संगीत की आत्मा में जीवित है।

मुख्य बातें

उस्ताद बिस्मिल्लाह खां का निधन 21 अगस्त 2006 को 90 वर्ष की आयु में हुआ।
जन्म 21 मार्च 1916 को बिहार के डुमरांव में; 6 वर्ष की उम्र में वाराणसी में गुरु अली बक्स विलायतु से शहनाई की शिक्षा ली।
15 अगस्त 1947 को लाल किले से और 26 जनवरी 1950 को पहले गणतंत्र दिवस पर शहनाई वादन किया।
अफगानिस्तान, अमेरिका, जापान, ईरान सहित दर्जनों देशों में अंतरराष्ट्रीय प्रस्तुतियाँ दीं।
2001 में भारत रत्न ; इससे पहले पद्म श्री ( 1961 ), पद्म भूषण ( 1968 ), पद्म विभूषण ( 1980 ) से सम्मानित।
संगीत नाटक अकादमी ने 2007 में उनकी स्मृति में 'उस्ताद बिस्मिल्लाह खां युवा पुरस्कार' की स्थापना की।

उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की 21 अगस्त 2006 को 90 वर्ष की आयु में हुई मृत्यु के साथ भारतीय शास्त्रीय संगीत का एक अध्याय बंद हो गया — वह अध्याय जिसमें शहनाई ने विवाह-द्वारों की चौखट लाँघकर अंतरराष्ट्रीय कॉन्सर्ट हॉलों में अपनी जगह बनाई। भारत रत्न से सम्मानित इस महान शहनाई वादक की पुण्यतिथि पर उनकी विरासत को याद करना उस साधना को नमन करना है, जिसने एक लोक-वाद्य को शास्त्रीय संगीत की सर्वोच्च पीठ पर प्रतिष्ठित किया।

जन्म और संगीत की विरासत

बिस्मिल्लाह खां का जन्म 21 मार्च 1916 को बिहार के डुमरांव में एक संगीत-परिवार में हुआ। उनके पिता पैगंबर खां डुमरांव के महाराजा के दरबार में शहनाई वादक थे और पूर्वजों की पीढ़ियाँ भी रियासती दरबारों से जुड़ी थीं। जन्म के समय उनका नाम कमरुद्दीन रखा गया था, किंतु जब उनके दादा रसूल बख्श खां ने पहली बार नवजात को देखा तो उनके मुख से 'बिस्मिल्लाह' शब्द निकला — और यही शब्द आगे चलकर उनकी विश्व-पहचान बन गया।

मात्र छह वर्ष की आयु में वे वाराणसी आ गए, जहाँ उनके मामा और गुरु अली बक्स विलायतु — जो काशी विश्वनाथ मंदिर से जुड़े प्रतिष्ठित शहनाई वादक थे — ने उन्हें इस वाद्य की बारीकियाँ सिखाईं। गुरु के प्रति समर्पण और अथक अभ्यास ने उन्हें शहनाई पर ऐसी पकड़ दी कि वाद्य और वादक एक-दूसरे के पर्याय बन गए।

राष्ट्रीय मंच पर उदय

बिस्मिल्लाह खां के करियर में 1937 एक निर्णायक मोड़ था। कोलकाता में आयोजित अखिल भारतीय संगीत सम्मेलन में उनकी प्रस्तुति ने शहनाई को राष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान दिलाई और संगीत-प्रेमियों के बीच उनकी कला की व्यापक चर्चा शुरू हुई।

15 अगस्त 1947 को देश की स्वतंत्रता का ऐतिहासिक अवसर उनके जीवन का सबसे यादगार क्षण बना। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के आमंत्रण पर उन्होंने लाल किले से शहनाई वादन किया। इसके बाद 26 जनवरी 1950 को देश के पहले गणतंत्र दिवस पर भी उनकी शहनाई ने राष्ट्र को मंत्रमुग्ध किया। स्वतंत्रता दिवस समारोहों में उनकी प्रस्तुतियाँ दूरदर्शन पर प्रसारित होती थीं, जिससे उनकी धुन घर-घर पहुँची।

अंतरराष्ट्रीय पहचान और सांस्कृतिक एकता का संदेश

बिस्मिल्लाह खां ने अपनी कला को भारत की सीमाओं तक नहीं बाँधा। अफगानिस्तान, अमेरिका, कनाडा, बांग्लादेश, ईरान, इराक, जापान, हांगकांग और यूरोप के अनेक देशों में उन्होंने प्रस्तुतियाँ दीं। जिस शहनाई को कभी केवल विवाह और पारंपरिक अवसरों से जोड़ा जाता था, वह अब अंतरराष्ट्रीय संगीत मंचों पर गरिमा के साथ सुनी जाने लगी।

वे संगीत को समाज को जोड़ने वाली शक्ति मानते थे। उनका जीवन हिंदू-मुस्लिम सांस्कृतिक एकता का जीवंत उदाहरण था — एक मुस्लिम संगीतकार जिनकी साधना काशी विश्वनाथ के आँगन में फली-फूली और जिनका विश्वास था कि सुरों की कोई धार्मिक सीमा नहीं होती।

पुरस्कार और सम्मान

उनकी संगीत-साधना को देश-विदेश में अनेक प्रतिष्ठित सम्मान मिले। 1956 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1961 में पद्म श्री, 1968 में पद्म भूषण, 1980 में पद्म विभूषण, 1992 में ईरान गणराज्य का तलार मौसिकी सम्मान और 2001 में भारत रत्न — देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान — उन्हें प्रदान किया गया।

विरासत और स्मृति

बिस्मिल्लाह खां का जीवन उतना ही सादगीपूर्ण था जितनी उनकी शहनाई की धुन सरल और गहरी। इतनी बड़ी वैश्विक पहचान के बावजूद वे दिखावे से कोसों दूर रहे। उनके पाँच पुत्र थे और उन्होंने एक पुत्री को गोद भी लिया था। यद्यपि उन्होंने बहुत कम शिष्यों को औपचारिक रूप से दीक्षित किया, तथापि भारतीय संगीत जगत पर उनकी छाप अमिट रही। उनकी स्मृति को जीवित रखने के लिए संगीत नाटक अकादमी ने 2007 में 'उस्ताद बिस्मिल्लाह खां युवा पुरस्कार' की स्थापना की, जो संगीत, नृत्य और रंगमंच के उभरते कलाकारों को दिया जाता है। उनकी शहनाई की गूंज आज भी यह याद दिलाती है कि सच्ची साधना किसी वाद्य को भी इतिहास में अमर कर सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि एक वाद्य की सामाजिक यात्रा की कहानी है — शहनाई जो शताब्दियों तक 'शुभ अवसर की ध्वनि' तक सिमटी रही, उसे शास्त्रीय संगीत के गंभीर मंचों पर स्थापित करना सांस्कृतिक पूर्वाग्रह से सीधी टक्कर थी। यह भी उल्लेखनीय है कि एक मुस्लिम संगीतकार ने काशी के मंदिर-प्रांगण में साधना करते हुए हिंदू-मुस्लिम साझी विरासत का जो जीवंत उदाहरण प्रस्तुत किया, वह आज की विभाजनकारी राजनीतिक भाषा के संदर्भ में और भी प्रासंगिक हो जाता है। मुख्यधारा की श्रद्धांजलि-कवरेज अक्सर उनकी 'सादगी' को रोमांटिक रूप देती है, लेकिन यह नहीं पूछती कि उनके बाद शहनाई की परंपरा को आगे ले जाने वाली पीढ़ी कहाँ है — यही असली सवाल है जो उनकी विरासत की परीक्षा लेता है।
RashtraPress
5 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

उस्ताद बिस्मिल्लाह खां कौन थे और उन्हें क्यों याद किया जाता है?
उस्ताद बिस्मिल्लाह खां भारत के सर्वश्रेष्ठ शहनाई वादक थे, जिन्हें 2001 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया। उन्होंने शहनाई को पारंपरिक अवसरों की सीमा से निकालकर अंतरराष्ट्रीय शास्त्रीय संगीत मंचों पर प्रतिष्ठित किया और भारतीय स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से वादन कर इतिहास रचा।
बिस्मिल्लाह खां का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उनका जन्म 21 मार्च 1916 को बिहार के डुमरांव में हुआ था। उनके पिता पैगंबर खां डुमरांव के महाराजा के दरबारी शहनाई वादक थे। छह वर्ष की आयु में वे वाराणसी आ गए, जहाँ उनके मामा और गुरु अली बक्स विलायतु ने उन्हें शहनाई की शिक्षा दी।
बिस्मिल्लाह खां का निधन कब हुआ और उनकी आयु क्या थी?
उस्ताद बिस्मिल्लाह खां का निधन 21 अगस्त 2006 को 90 वर्ष की आयु में हुआ। उनके निधन के साथ भारतीय शास्त्रीय संगीत के एक गौरवशाली युग का अंत हुआ।
बिस्मिल्लाह खां को कौन-कौन से प्रमुख पुरस्कार मिले?
उन्हें 1956 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1961 में पद्म श्री, 1968 में पद्म भूषण, 1980 में पद्म विभूषण, 1992 में ईरान का तलार मौसिकी सम्मान और 2001 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया।
उनकी स्मृति में क्या पुरस्कार स्थापित किया गया है?
संगीत नाटक अकादमी ने 2007 में 'उस्ताद बिस्मिल्लाह खां युवा पुरस्कार' की स्थापना की। यह पुरस्कार संगीत, नृत्य और रंगमंच के क्षेत्र में उभरते युवा कलाकारों को दिया जाता है।
राष्ट्र प्रेस
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