वंदे मातरम असंवैधानिक नहीं, भारत की सभ्यतागत विरासत का हिस्सा — ओवैसी पर अमित मालवीय का पलटवार
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय जनता पार्टी (BJP) की आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने 8 मई 2026 को ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख और सांसद असदुद्दीन ओवैसी को कड़ा जवाब दिया, जिन्होंने राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' को राष्ट्रगान के समकक्ष दर्जा दिए जाने का विरोध किया था। मालवीय ने स्पष्ट कहा कि 'वंदे मातरम' को असंवैधानिक ठहराने का प्रयास बौद्धिक रूप से बेईमान और ऐतिहासिक रूप से चयनात्मक है।
ओवैसी ने क्या कहा था
सांसद ओवैसी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पोस्ट करते हुए तर्क दिया कि 'वंदे मातरम' एक देवी की स्तुति है और इसे 'जन-गण-मन' के बराबर नहीं माना जा सकता, क्योंकि जन-गण-मन भारत और उसके नागरिकों का गुणगान करता है, किसी खास धर्म का नहीं। उन्होंने यह भी दावा किया कि गीत के रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ब्रिटिश राज के प्रति सहानुभूति रखते थे और मुसलमानों से नफरत करते थे। ओवैसी के अनुसार, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और रवींद्रनाथ टैगोर — सभी ने इस गीत को अस्वीकार कर दिया था।
मालवीय का संवैधानिक तर्क
अमित मालवीय ने 'एक्स' पर विस्तृत जवाब देते हुए कहा कि संविधान सभा ने 'वंदे मातरम' को कभी अस्वीकार नहीं किया। उन्होंने लिखा कि 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने 'जन-गण-मन' को राष्ट्रगान के रूप में अपनाने के साथ-साथ भारत के स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका के कारण 'वंदे मातरम' को राष्ट्रगीत के रूप में समान सम्मान और दर्जा दिया। मालवीय के अनुसार, यह कहना कि संविधान निर्माताओं ने इसे अस्वीकार किया, तथ्यात्मक रूप से गलत है।
सभ्यतागत विरासत और सांस्कृतिक प्रतीकवाद
ओवैसी के इस तर्क पर कि 'वंदे मातरम' सिर्फ एक देवी की स्तुति है, मालवीय ने कहा कि यह दृष्टिकोण भारत के सभ्यतागत संदर्भ को जानबूझकर नजरअंदाज करता है। उन्होंने तर्क दिया कि भारतीय परंपराओं में मातृभूमि को 'भारत माता' के रूप में मानवीकृत करना किसी सांप्रदायिक देवी की अवधारणा नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति सांस्कृतिक और भावनात्मक अभिव्यक्ति है। मालवीय ने अंतरराष्ट्रीय उदाहरण भी दिए — 'ब्रिटानिया' ब्रिटेन का, 'मैरिएन' फ्रांस का और 'मां रूस' रूस का प्रतिनिधित्व करती है। उन्होंने कहा कि भारत के सांस्कृतिक प्रतीकवाद को चुनिंदा रूप से अवैध नहीं ठहराया जा सकता।
बंकिम चंद्र पर बचाव
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को लेकर मालवीय ने कहा कि उनके कथित विचारों तक उन्हें सीमित कर देना वैचारिक संशोधनवाद का प्रयास है। उन्होंने याद दिलाया कि 'वंदे मातरम' भारत के उपनिवेश-विरोधी आंदोलन का मुख्य नारा बना था और अनगिनत स्वतंत्रता सेनानी इस उद्घोष के साथ फांसी के फंदे तक गए। विभिन्न क्षेत्रों के क्रांतिकारियों, सुधारकों और देशभक्तों ने इसे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में अपनाया।
धर्म और राष्ट्र की बहस
ओवैसी के 'धर्म और राष्ट्र एक नहीं' वाले तर्क पर मालवीय ने कहा कि भारतीय संदर्भ में यह एक गलत द्वंद्व है। भारत न तो धर्म-शासित राज्य है और न ही यहाँ का राष्ट्रवाद किसी एक धर्म पर निर्भर करता है। लेकिन भारत एक ऐसी सभ्यता है जिसे हजारों वर्षों के भारतीय चिंतन, परंपराओं और दर्शन ने आकार दिया है। मालवीय ने यह भी कहा कि भारत में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ कभी भी स्वदेशी परंपराओं के प्रति शत्रुता या सार्वजनिक जीवन से बहुसंख्यक सांस्कृतिक प्रतीकों को मिटाना नहीं रहा। 'वंदे मातरम' का सम्मान करने से भारत न कम संवैधानिक होता है, न कम लोकतांत्रिक और न कम समावेशी — यह उस सांस्कृतिक आत्मा को स्वीकार करना है जिसने स्वतंत्रता संग्राम को प्राण दिए।