वंदे मातरम असंवैधानिक नहीं, भारत की सभ्यतागत विरासत का हिस्सा — ओवैसी पर अमित मालवीय का पलटवार

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वंदे मातरम असंवैधानिक नहीं, भारत की सभ्यतागत विरासत का हिस्सा — ओवैसी पर अमित मालवीय का पलटवार

सारांश

ओवैसी ने 'वंदे मातरम' को देवी-स्तुति बताकर राष्ट्रगान के बराबर दर्जे का विरोध किया — और BJP की आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने संविधान सभा के 24 जनवरी 1950 के फैसले का हवाला देते हुए इसे तथ्यात्मक रूप से गलत करार दिया। यह बहस भारत की सभ्यतागत पहचान और धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा को फिर से केंद्र में ले आई है।

मुख्य बातें

अमित मालवीय ने 8 मई 2026 को ' वंदे मातरम ' को असंवैधानिक बताने के ओवैसी के दावे को तथ्यात्मक रूप से गलत करार दिया।
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने ' जन-गण-मन ' के साथ-साथ ' वंदे मातरम ' को राष्ट्रगीत के रूप में समान सम्मान और दर्जा दिया था।
ओवैसी ने दावा किया कि गीत के रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ब्रिटिश समर्थक थे और बोस, गांधी, नेहरू, टैगोर ने इसे अस्वीकार किया था।
मालवीय ने 'ब्रिटानिया', 'मैरिएन' और 'मां रूस' जैसे अंतरराष्ट्रीय उदाहरण देते हुए भारत के सांस्कृतिक प्रतीकवाद का बचाव किया।
मालवीय के अनुसार, भारत में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ स्वदेशी सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति शत्रुता नहीं है।

भारतीय जनता पार्टी (BJP) की आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने 8 मई 2026 को ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख और सांसद असदुद्दीन ओवैसी को कड़ा जवाब दिया, जिन्होंने राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' को राष्ट्रगान के समकक्ष दर्जा दिए जाने का विरोध किया था। मालवीय ने स्पष्ट कहा कि 'वंदे मातरम' को असंवैधानिक ठहराने का प्रयास बौद्धिक रूप से बेईमान और ऐतिहासिक रूप से चयनात्मक है।

ओवैसी ने क्या कहा था

सांसद ओवैसी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर पोस्ट करते हुए तर्क दिया कि 'वंदे मातरम' एक देवी की स्तुति है और इसे 'जन-गण-मन' के बराबर नहीं माना जा सकता, क्योंकि जन-गण-मन भारत और उसके नागरिकों का गुणगान करता है, किसी खास धर्म का नहीं। उन्होंने यह भी दावा किया कि गीत के रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ब्रिटिश राज के प्रति सहानुभूति रखते थे और मुसलमानों से नफरत करते थे। ओवैसी के अनुसार, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और रवींद्रनाथ टैगोर — सभी ने इस गीत को अस्वीकार कर दिया था।

मालवीय का संवैधानिक तर्क

अमित मालवीय ने 'एक्स' पर विस्तृत जवाब देते हुए कहा कि संविधान सभा ने 'वंदे मातरम' को कभी अस्वीकार नहीं किया। उन्होंने लिखा कि 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने 'जन-गण-मन' को राष्ट्रगान के रूप में अपनाने के साथ-साथ भारत के स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका के कारण 'वंदे मातरम' को राष्ट्रगीत के रूप में समान सम्मान और दर्जा दिया। मालवीय के अनुसार, यह कहना कि संविधान निर्माताओं ने इसे अस्वीकार किया, तथ्यात्मक रूप से गलत है।

सभ्यतागत विरासत और सांस्कृतिक प्रतीकवाद

ओवैसी के इस तर्क पर कि 'वंदे मातरम' सिर्फ एक देवी की स्तुति है, मालवीय ने कहा कि यह दृष्टिकोण भारत के सभ्यतागत संदर्भ को जानबूझकर नजरअंदाज करता है। उन्होंने तर्क दिया कि भारतीय परंपराओं में मातृभूमि को 'भारत माता' के रूप में मानवीकृत करना किसी सांप्रदायिक देवी की अवधारणा नहीं, बल्कि राष्ट्र के प्रति सांस्कृतिक और भावनात्मक अभिव्यक्ति है। मालवीय ने अंतरराष्ट्रीय उदाहरण भी दिए — 'ब्रिटानिया' ब्रिटेन का, 'मैरिएन' फ्रांस का और 'मां रूस' रूस का प्रतिनिधित्व करती है। उन्होंने कहा कि भारत के सांस्कृतिक प्रतीकवाद को चुनिंदा रूप से अवैध नहीं ठहराया जा सकता।

बंकिम चंद्र पर बचाव

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को लेकर मालवीय ने कहा कि उनके कथित विचारों तक उन्हें सीमित कर देना वैचारिक संशोधनवाद का प्रयास है। उन्होंने याद दिलाया कि 'वंदे मातरम' भारत के उपनिवेश-विरोधी आंदोलन का मुख्य नारा बना था और अनगिनत स्वतंत्रता सेनानी इस उद्घोष के साथ फांसी के फंदे तक गए। विभिन्न क्षेत्रों के क्रांतिकारियों, सुधारकों और देशभक्तों ने इसे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में अपनाया।

धर्म और राष्ट्र की बहस

ओवैसी के 'धर्म और राष्ट्र एक नहीं' वाले तर्क पर मालवीय ने कहा कि भारतीय संदर्भ में यह एक गलत द्वंद्व है। भारत न तो धर्म-शासित राज्य है और न ही यहाँ का राष्ट्रवाद किसी एक धर्म पर निर्भर करता है। लेकिन भारत एक ऐसी सभ्यता है जिसे हजारों वर्षों के भारतीय चिंतन, परंपराओं और दर्शन ने आकार दिया है। मालवीय ने यह भी कहा कि भारत में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ कभी भी स्वदेशी परंपराओं के प्रति शत्रुता या सार्वजनिक जीवन से बहुसंख्यक सांस्कृतिक प्रतीकों को मिटाना नहीं रहा। 'वंदे मातरम' का सम्मान करने से भारत न कम संवैधानिक होता है, न कम लोकतांत्रिक और न कम समावेशी — यह उस सांस्कृतिक आत्मा को स्वीकार करना है जिसने स्वतंत्रता संग्राम को प्राण दिए।

संपादकीय दृष्टिकोण

साझी विरासत का माध्यम बनाया जाए।
RashtraPress
13 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वंदे मातरम को संवैधानिक दर्जा कब और कैसे मिला?
24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने 'जन-गण-मन' को राष्ट्रगान और 'वंदे मातरम' को राष्ट्रगीत के रूप में समान सम्मान दिया। यह निर्णय भारत के स्वतंत्रता संग्राम में गीत की ऐतिहासिक भूमिका को देखते हुए लिया गया था।
ओवैसी ने वंदे मातरम का विरोध क्यों किया?
AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने तर्क दिया कि 'वंदे मातरम' एक देवी की स्तुति है और इसे 'जन-गण-मन' के बराबर दर्जा नहीं दिया जा सकता। उन्होंने यह भी दावा किया कि रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ब्रिटिश समर्थक थे और गांधी, नेहरू सहित प्रमुख नेताओं ने इसे अस्वीकार किया था।
अमित मालवीय ने ओवैसी को क्या जवाब दिया?
BJP आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने कहा कि 'वंदे मातरम' को असंवैधानिक बताना तथ्यात्मक रूप से गलत है क्योंकि संविधान सभा ने इसे 1950 में राष्ट्रगीत का दर्जा दिया था। उन्होंने यह भी कहा कि भारत का सांस्कृतिक प्रतीकवाद अन्य देशों जैसे ब्रिटेन, फ्रांस और रूस से अलग नहीं है।
वंदे मातरम और जन-गण-मन में क्या अंतर है?
'जन-गण-मन' भारत का राष्ट्रगान है जबकि 'वंदे मातरम' राष्ट्रगीत है — दोनों को संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को समान सम्मान दिया। राष्ट्रगान सरकारी समारोहों में अनिवार्य रूप से गाया जाता है, जबकि राष्ट्रगीत को समान आदर दिया जाता है।
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने वंदे मातरम कब लिखा था?
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 'वंदे मातरम' को अपने उपन्यास 'आनंदमठ' (1882) में लिखा था। यह गीत भारत के उपनिवेश-विरोधी आंदोलन का प्रमुख नारा बना और स्वतंत्रता सेनानियों ने इसे ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में अपनाया।
राष्ट्र प्रेस
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