10 अक्टूबर 2026
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चुनाव आयोग की छवि खराब करना लोकतंत्र के हित में नहीं: वेंकैया नायडू का सीईसी विवाद पर बड़ा बयान

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चुनाव आयोग की छवि खराब करना लोकतंत्र के हित में नहीं: वेंकैया नायडू का सीईसी विवाद पर बड़ा बयान

सारांश

पूर्व उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने जंतर-मंतर पर CEC के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के बीच साफ कहा — रैलियों से इस्तीफे की माँग करना लोकतंत्र को कमज़ोर करता है। उनका यह बयान उस बहस के केंद्र में है जो संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा और राजनीतिक आलोचना की सीमाओं पर सवाल उठाती है।

मुख्य बातें

पूर्व उपराष्ट्रपति एम.
वेंकैया नायडू ने 10 अक्टूबर 2026 को CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सार्वजनिक रैलियों के ज़रिए इस्तीफे की माँग को 'उचित नहीं' करार दिया।
सिटीज़न्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) ने जंतर-मंतर, नई दिल्ली पर विरोध प्रदर्शन किया, जिसमें SIR के दौरान मतदाताओं के नाम हटाने का मुद्दा उठाया गया।
नायडू ने कहा कि चुनाव जीतने पर आयोग की तारीफ और हारने पर आलोचना करना राजनीतिक दोगलापन है।
उन्होंने बिहार चुनाव का उदाहरण देते हुए कहा कि एक भी मतदाता ने नाम हटने की शिकायत नहीं की।
नायडू ने शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को स्वीकार किया, परंतु हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने का विरोध किया।

पूर्व उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने शनिवार, 10 अक्टूबर 2026 को कुछ राजनीतिक दलों द्वारा भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की साख पर सवाल उठाने और सार्वजनिक रैलियों के ज़रिए मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग करने की प्रवृत्ति की कड़ी आलोचना की। नायडू ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ऐसी हरकतें न देश के हित में हैं और न ही लोकतंत्र की मज़बूती के लिए उचित।

विरोध प्रदर्शन की पृष्ठभूमि

नायडू का यह बयान उस दिन आया जब सिटीज़न्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) के बैनर तले नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर CEC ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध एक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया। प्रदर्शन का मुख्य मुद्दा वोटर लिस्ट के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) के दौरान मतदाताओं के नाम हटाने और कथित तौर पर 'वोट चोरी' के आरोप थे।

गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब किसी राजनीतिक समूह ने चुनाव आयोग को निशाना बनाया हो। विशेषज्ञों के अनुसार, चुनावी हार के बाद ईवीएम और मतदाता सूची पर सवाल उठाने का सिलसिला वर्षों से जारी है।

नायडू के मुख्य तर्क

नायडू ने कहा, 'चुनाव आयोग एक वैधानिक संस्था है। चुनाव आयुक्त पर महाभियोग चलाने के जो भी तरीके और साधन हैं, लेकिन उन पर आरोप लगाना, उन्हें बुरा-भला कहना, उनके नाम को विवादों में घसीटना और फिर सार्वजनिक रैलियों के ज़रिए उनके इस्तीफे की माँग करना उचित नहीं है।'

उन्होंने यह भी कहा कि राजनीतिक दलों का रवैया चुनावी नतीजों पर निर्भर करता है — 'अगर वे चुनाव जीतते हैं, तो चुनाव आयोग अच्छा है। अगर वे हारते हैं, तो ईवीएम खराब, दोषपूर्ण और सरकार के पक्ष में होती हैं।'

मतदाता सूची पर नायडू का पक्ष

बिहार के हालिया चुनावों का उदाहरण देते हुए नायडू ने कहा कि 'एक भी मतदाता ने यह शिकायत नहीं की कि उसका नाम हटाया गया।' उनके अनुसार, मतदाता सूची की निगरानी करना, घर-घर जाकर जाँच करना और किसी भी चूक की शिकायत करना राजनीतिक दलों, उनके एजेंटों और कार्यकर्ताओं की प्राथमिक ज़िम्मेदारी है।

उन्होंने कहा कि यदि कोई वास्तविक खामी हो, तो उसके लिए कानूनी और संवैधानिक रास्ते उपलब्ध हैं — 'आपके पास आगे अपील करने का अधिकार है।'

सामूहिक निर्णय और संस्थागत गरिमा

नायडू ने यह भी रेखांकित किया कि चुनाव आयोग के भीतर सभी निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाते हैं। उन्होंने कहा, 'कभी-कभी विचारों में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन अंततः फैसले सामूहिक रूप से लिए जाते हैं। इसलिए किसी एक व्यक्ति को निशाना बनाना और फिर उसे बदनाम करना सही नहीं है।'

उन्होंने यह स्पष्ट किया कि चुनावी प्रक्रिया को लेकर कोई वास्तविक चिंता हो तो उसे सार्थक संवाद से उठाया जाना चाहिए, किसी संवैधानिक संस्था की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचाकर नहीं।

शांतिपूर्ण विरोध पर संतुलित रुख

नायडू ने लोगों के विरोध करने के अधिकार को भी स्वीकार किया, किंतु इसके साथ स्पष्ट शर्त भी रखी। उनके शब्दों में, 'लोगों को शांतिपूर्ण ढंग से विरोध करना चाहिए और किसी को भी हिंसा नहीं करनी चाहिए या सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट नहीं करना चाहिए।' साथ ही उन्होंने सरकारों से भी अपेक्षा की कि वे शांतिपूर्ण प्रदर्शनों को अनुमति दें।

इस तरह नायडू ने एक संतुलित राष्ट्रवादी दृष्टिकोण रखा — जो न तो प्रदर्शनकारियों को पूरी तरह खारिज करता है और न ही संस्थाओं पर राजनीतिक हमले को उचित ठहराता है। आने वाले दिनों में यह बहस और तेज़ होने की संभावना है, जब SIR प्रक्रिया के परिणाम सामने आएँगे।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो जनाक्रोश को केवल 'संस्था-विरोधी' कहकर खारिज करना लोकतंत्र की असली परीक्षा से बचना होगा।
RashtraPress
10 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

वेंकैया नायडू ने CEC के इस्तीफे की माँग पर क्या कहा?
पूर्व उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने 10 अक्टूबर 2026 को कहा कि सार्वजनिक रैलियों के ज़रिए CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग करना उचित नहीं है। उनके अनुसार, चुनाव आयोग एक वैधानिक संस्था है और इसकी छवि खराब करना न देश के हित में है और न ही लोकतंत्र के लिए।
जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन किस मुद्दे पर हुआ?
CJP (सिटीज़न्स फॉर जस्टिस एंड पीस) ने नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर CEC ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध प्रदर्शन किया। इसमें वोटर लिस्ट के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) के दौरान मतदाताओं के नाम हटाने और कथित 'वोट चोरी' के आरोप उठाए गए।
मतदाता सूची में गड़बड़ी की शिकायत किसे करें?
नायडू के अनुसार, मतदाता सूची की जाँच करना और किसी भी गड़बड़ी की शिकायत दर्ज कराना राजनीतिक दलों, उनके एजेंटों और कार्यकर्ताओं की ज़िम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि इसके लिए कानूनी और अपील के रास्ते भी उपलब्ध हैं।
क्या नायडू ने विरोध प्रदर्शन के अधिकार को खारिज किया?
नहीं, नायडू ने शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को मान्यता दी। उन्होंने कहा कि लोगों को प्रदर्शन का अधिकार है, परंतु हिंसा या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान नहीं पहुँचाया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने सरकारों से भी शांतिपूर्ण प्रदर्शनों की अनुमति देने की अपेक्षा रखी।
SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिविजन) क्या है और इसपर विवाद क्यों है?
SIR चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों की गहन समीक्षा की प्रक्रिया है, जिसमें अपात्र या डुप्लीकेट नाम हटाए जाते हैं। विपक्षी दलों का कथित आरोप है कि इस प्रक्रिया में वैध मतदाताओं के नाम भी हटाए गए, जबकि नायडू जैसे नेताओं का कहना है कि इस पर संस्थागत माध्यमों से आपत्ति दर्ज करानी चाहिए, न कि आयोग को सार्वजनिक रूप से बदनाम करके।
राष्ट्र प्रेस
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