MP वक्फ बोर्ड पुनर्गठन को चुनौती का कोई आधार नहीं — हिंदू सदस्य अनिमेष भार्गव का आरिफ मसूद को करारा जवाब
सारांश
मुख्य बातें
मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड के हिंदू सदस्य अनिमेष भार्गव ने मंगलवार, 7 जुलाई 2026 को कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद की उस घोषणा को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें मसूद ने बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने की बात कही थी। भार्गव ने स्पष्ट किया कि ये नियुक्तियाँ वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 के प्रावधानों के तहत पूरी तरह वैध हैं और किसी भी कानूनी आपत्ति का कोई ठोस आधार नहीं है।
मुख्य घटनाक्रम
भार्गव ने कहा, 'यह भारत के संविधान के अनुसार किया गया है। संशोधित वक्फ कानून वक्फ बोर्ड में गड़बड़ियों को खत्म करने और वित्तीय नुकसान को रोकने के लिए लाया गया था। हमें उसी कानून के प्रावधानों के तहत नियुक्त किया गया है।' उनका यह बयान भोपाल सेंट्रल के विधायक मसूद द्वारा सोमवार को की गई घोषणा के ठीक एक दिन बाद आया।
मसूद ने आरोप लगाया था कि बोर्ड में गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करना मुसलमानों के धार्मिक मामलों में अनुचित हस्तक्षेप है। उल्लेखनीय है कि वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 पहले से ही सर्वोच्च न्यायालय के विचाराधीन है।
पारदर्शिता और संपत्ति प्रबंधन
भार्गव ने गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति के पीछे के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा कि सरकार का मकसद बोर्ड में पारदर्शिता लाना है। उन्होंने आरोप लगाया कि 16,000 से अधिक वक्फ संपत्तियों — जिनमें मस्जिदें, दरगाहें, कब्रिस्तान, शैक्षणिक संस्थान और व्यावसायिक परिसर शामिल हैं — का सही उपयोग नहीं हो रहा और इमारतों पर कब्जा करने के बावजूद उचित किराया नहीं चुकाया जा रहा, जिससे बोर्ड को पर्याप्त आमदनी नहीं हो रही।
भार्गव ने यह भी कहा, 'कुछ लोग लंबे समय से इन संपत्तियों पर कब्जा जमाए हुए हैं और शायद इसीलिए वे इसका विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि भविष्य में ज़्यादा पारदर्शिता आने से सब कुछ सबके सामने आ जाएगा।' उन्होंने कानूनी चुनौती देने वालों पर सीधा निशाना साधते हुए कहा कि ऐसे लोग वही हैं जो वर्षों से वक्फ संपत्तियों का दुरुपयोग करते रहे हैं।
संयुक्त संसदीय समिति और कानून की पृष्ठभूमि
भार्गव ने बताया कि जब यह संशोधन प्रस्तावित किया गया था, तब केंद्र सरकार ने जगदंबिका पाल की अध्यक्षता में एक संयुक्त संसदीय समिति (JPC) गठित की थी। समिति ने देशभर का दौरा किया, वक्फ समितियों और मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधियों से ऑनलाइन व व्यक्तिगत रूप से फीडबैक लिया और उसके बाद विधेयक का मसौदा तैयार किया गया। यह प्रक्रिया दर्शाती है कि कानून में व्यापक विचार-विमर्श किया गया था।
राजनीतिक प्रतिक्रिया और विरोध
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस / INC) और कई मुस्लिम संगठनों ने बोर्ड में हिंदू सदस्यों को शामिल किए जाने का विरोध किया है और इस कदम की वैधता पर सवाल उठाए हैं। आलोचकों का कहना है कि यह अल्पसंख्यक समुदाय के धार्मिक संस्थानों की स्वायत्तता पर असर डालता है।
गौरतलब है कि मध्य प्रदेश संशोधित वक्फ अधिनियम 2025 के तहत नया बोर्ड गठित करने वाला देश का पहला राज्य बन गया है — यह एक ऐसी नज़ीर है जिसे अन्य राज्य भी देख रहे हैं।
आगे क्या होगा
यह विवाद ऐसे समय में और गहरा हो गया है जब वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 की संवैधानिक वैधता पर सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई जारी है। मसूद की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में अलग याचिका दाखिल करने की तैयारी है, जो मामले को और जटिल बना सकती है। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड राज्य भर में 16,000 से अधिक वक्फ संपत्तियों का प्रबंधन करता है।