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जकात मस्जिदों के लिए नहीं, गरीबों के लिए है — राशिद अल्वी और सैयद फरीद निजामी

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जकात मस्जिदों के लिए नहीं, गरीबों के लिए है — राशिद अल्वी और सैयद फरीद निजामी

सारांश

राम मंदिर चंदा विवाद के बाद कांग्रेस नेता राशिद अल्वी और हजरत निजामुद्दीन दरगाह के सैयद फरीद निजामी ने साफ कहा — जकात मस्जिदों के लिए नहीं, गरीबों का हक है। दरगाहें जकात स्वीकार नहीं करतीं और मदरसों में मिला दान छात्रों की शिक्षा पर खर्च होता है।

मुख्य बातें

कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने कहा कि जकात जरूरतमंदों के लिए है, मस्जिदों के संचालन के लिए नहीं।
सैयद फरीद अहमद निजामी ने स्पष्ट किया कि हजरत निजामुद्दीन दरगाह जैसी खानकाहें जकात का धन स्वीकार नहीं करतीं।
मदरसों में मिली जकात राशि छात्रों की शिक्षा, भोजन और आवास पर खर्च होती है।
अल्वी ने राम मंदिर चंदा मामले में एसआईटी जांच को 'केवल दिखावा' बताया।
निजामी ने AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के बयान पर कहा कि निर्दोष के साथ अन्याय और दोषी को बचाना — दोनों समान रूप से गलत हैं।

राम मंदिर चंदा विवाद के कथित मामले के बाद नई दिल्ली में धार्मिक संस्थानों के दान-प्रबंधन को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। कांग्रेस नेता राशिद अल्वी और हजरत निजामुद्दीन दरगाह कमेटी के सज्जादा नशीन एवं अध्यक्ष सैयद फरीद अहमद निजामी ने 1 जुलाई 2026 को मस्जिदों, मदरसों और दरगाहों में दान तथा जकात की व्यवस्था पर अपना स्पष्ट पक्ष रखा। दोनों ने एक स्वर में कहा कि जकात का धन जरूरतमंदों और गरीबों के लिए है, न कि मस्जिदों के संचालन के लिए।

राशिद अल्वी का पक्ष: मस्जिद और मंदिर की तुलना उचित नहीं

राशिद अल्वी ने कहा कि मस्जिदों में जकात नहीं दी जाती — जकात केवल जरूरतमंद और गरीब लोगों का हक है। उनके अनुसार, मस्जिदों का संचालन एक कमेटी के जरिये होता है जहाँ इमाम नमाज पढ़ाते हैं और नमाजियों के जाने के बाद परिसर खाली हो जाता है। अल्वी ने कहा कि मस्जिद की इस संरचना में दान की चोरी जैसा कोई सवाल ही नहीं उठता।

उन्होंने मंदिर और मस्जिद की तुलना को भी अनुचित बताया, यह तर्क देते हुए कि दोनों अलग-अलग आस्था के केंद्र हैं और उनकी प्रशासनिक संरचना भिन्न है। राम मंदिर चंदा मामले पर उन्होंने कहा कि यह करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं के साथ खिलवाड़ है और इस मामले में गठित एसआईटी की जांच उन्हें 'केवल दिखावा' प्रतीत होती है।

दरगाहों में दान की व्यवस्था

अल्वी ने स्पष्ट किया कि दरगाहों में मिलने वाले दान का उपयोग लंगर चलाने, भोजन तैयार करने और गरीबों की सहायता जैसे कार्यों में होता है। उन्होंने कहा कि इस्लाम में किसी मजार या खानकाह की पूजा की अनुमति नहीं है। श्रद्धालु जो चादर चढ़ाते हैं, वह बाद में जरूरतमंदों में बाँट दी जाती है और नकद राशि का उपयोग भी गरीबों के हित में होता है। उन्होंने कहा कि अब तक किसी दरगाह या खानकाह में दान की चोरी का कोई मामला सामने नहीं आया है।

सैयद फरीद निजामी: दरगाहें जकात स्वीकार नहीं करतीं

सैयद फरीद अहमद निजामी ने बताया कि मस्जिदों और मदरसों को मिलने वाली धनराशि नियमित रूप से उनके संचालन और विद्यार्थियों के कल्याण पर खर्च होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि दरगाहें जकात का पैसा स्वीकार नहीं करतीं। लोग जकात की राशि मदरसों को देते हैं जहाँ उसका उपयोग छात्रों की शिक्षा, भोजन और आवास पर किया जाता है।

निजामी ने यह भी कहा कि जिन खानकाहों से सादात और सैय्यद परिवार जुड़े हैं, वहाँ धार्मिक मान्यता के अनुसार जकात लेना वर्जित है। कब्रिस्तानों और मस्जिदों के लिए मिला दान संबंधित कार्यों में ही खर्च होता है और लंगर के लिए दिया गया धन उसी उद्देश्य में लगाया जाता है।

ओवैसी के बयान पर निजामी की प्रतिक्रिया

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कथित तौर पर कहा था कि यदि राम मंदिर ट्रस्ट में कोई मुस्लिम होता तो उसका एनकाउंटर कर दिया जाता। इस बयान पर निजामी ने कहा कि वे किसी की नीयत पर टिप्पणी नहीं करना चाहते। उन्होंने कहा कि यदि किसी निर्दोष के साथ अन्याय हो या उसका घर बिना उचित कारण तोड़ा जाए तो यह गंभीर अन्याय है — और यदि कोई दोषी होते हुए भी जानबूझकर बचाया जाए तो वह भी उतना ही बड़ा अन्याय है।

आगे क्या

यह ऐसे समय में आया है जब राम मंदिर चंदा विवाद की एसआईटी जांच जारी है और धार्मिक संस्थानों की वित्तीय पारदर्शिता पर राष्ट्रीय बहस तेज हो रही है। गौरतलब है कि विभिन्न धर्मों के धार्मिक न्यासों में दान-प्रबंधन के मानकीकरण की माँग समय-समय पर उठती रही है। इस विषय पर विभिन्न पक्षों के बयान आने वाले दिनों में इस बहस को और गहरा कर सकते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि स्पष्टीकरण देने वाले हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस यह नहीं पूछ रही कि इन संस्थानों का स्वतंत्र ऑडिट होता है या नहीं। जब तक धार्मिक न्यासों — चाहे वे किसी भी धर्म के हों — में सत्यापन-योग्य वित्तीय पारदर्शिता नहीं होगी, तब तक ऐसी बहसें हर विवाद के बाद दोहराई जाती रहेंगी। यह बयानबाजी से आगे जाकर संस्थागत जवाबदेही की माँग करने का समय है।
RashtraPress
1 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

जकात क्या है और इसे कहाँ दिया जाना चाहिए?
जकात इस्लाम के पाँच स्तंभों में से एक है, जिसमें सक्षम मुसलमान अपनी संपत्ति का एक निश्चित हिस्सा जरूरतमंदों को देते हैं। राशिद अल्वी के अनुसार, जकात गरीब और जरूरतमंद लोगों के लिए है — मस्जिदों के संचालन के लिए नहीं।
क्या दरगाहें जकात का पैसा स्वीकार करती हैं?
सैयद फरीद अहमद निजामी के अनुसार, दरगाहें जकात का पैसा स्वीकार नहीं करतीं। विशेष रूप से जिन खानकाहों से सादात और सैय्यद परिवार जुड़े हैं, वहाँ धार्मिक मान्यता के अनुसार जकात लेना वर्जित है।
मदरसों में मिली जकात का उपयोग कैसे होता है?
निजामी के अनुसार, लोग जकात की राशि मदरसों को देते हैं जहाँ उसका उपयोग छात्रों की शिक्षा, भोजन और रहने की व्यवस्था पर किया जाता है। मस्जिदों और मदरसों को मिलने वाली धनराशि नियमित रूप से उनके संचालन और विद्यार्थियों के कल्याण पर खर्च होती है।
राम मंदिर चंदा विवाद से यह बहस कैसे जुड़ी है?
राम मंदिर चंदा विवाद के कथित मामले के बाद धार्मिक संस्थानों में दान-प्रबंधन की पारदर्शिता पर राष्ट्रीय बहस शुरू हुई। इसी संदर्भ में अल्वी और निजामी ने मुस्लिम धार्मिक संस्थानों की दान-व्यवस्था स्पष्ट की और मंदिर-मस्जिद की तुलना को अनुचित बताया।
AIMIM प्रमुख ओवैसी के बयान पर निजामी ने क्या कहा?
ओवैसी के उस कथित बयान पर — कि यदि ट्रस्ट में कोई मुस्लिम होता तो उसका एनकाउंटर होता — निजामी ने कहा कि वे किसी की नीयत पर टिप्पणी नहीं करना चाहते। उन्होंने कहा कि निर्दोष के साथ अन्याय और दोषी को जानबूझकर बचाना — दोनों समान रूप से गंभीर अन्याय हैं।
राष्ट्र प्रेस
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