डीआरआई ने पर्नो रिका इंडिया के परिसर का दौरा किया, स्कॉच व्हिस्की आयात शुल्क रियायत की जांच
सारांश
मुख्य बातें
राजस्व खुफिया निदेशालय (DRI) के अधिकारियों ने पर्नो रिका इंडिया के परिसर का दौरा किया है — कंपनी ने 22 अक्टूबर 2026 को इसकी आधिकारिक पुष्टि की। यह कार्रवाई उन रिपोर्टों के बीच सामने आई है जिनमें कहा गया है कि भारतीय कर अधिकारी यह जांच कर रहे हैं कि भारत-ब्रिटेन व्यापार समझौते के तहत कम किए गए सीमा शुल्क का लाभ उठाने वाले स्कॉच व्हिस्की के आयातों का सही वर्गीकरण किया गया था या नहीं।
कंपनी का बयान
पर्नो रिका इंडिया के प्रवक्ता ने कहा, 'हम पुष्टि करते हैं कि राजस्व खुफिया निदेशालय के अधिकारियों ने हमारे परिसर का दौरा किया। पर्नो रिका इंडिया अधिकारियों के साथ पूरा सहयोग कर रही है और मांगी गई सभी जानकारियां उपलब्ध करा रही हैं।' कंपनी ने यह भी कहा कि उसे अपने पक्ष पर पूरा भरोसा है और वह सभी सवालों का पारदर्शी एवं रचनात्मक तरीके से जवाब देने के लिए प्रतिबद्ध है।
कंपनी ने अपने सभी कामकाज में अनुपालन के उच्चतम मानकों को बनाए रखने का भी आश्वासन दिया। यह बयान ऐसे समय में आया है जब मीडिया रिपोर्टों में डियाजियो सहित अन्य शराब कंपनियों के नाम भी इसी जांच के संदर्भ में सामने आए हैं।
जांच का केंद्र: सीमा शुल्क वर्गीकरण विवाद
रिपोर्टों के अनुसार, अधिकारियों ने पिछले सप्ताह नई दिल्ली के पास स्थित पर्नो रिका इंडिया के मुख्यालय का दौरा किया और स्कॉच व्हिस्की के थोक आयात से संबंधित विवरण मांगे। जांच का मुख्य सवाल यह है कि क्या इन आयातों को भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौते के तहत शुल्क रियायत के लिए सही श्रेणी में रखा गया था।
गौरतलब है कि स्कॉच व्हिस्की पर आयात शुल्क भारत में ऐतिहासिक रूप से ऊँचा रहा है, और व्यापार समझौते के तहत मिलने वाली रियायतें शराब उद्योग के लिए बड़ी व्यावसायिक अहमियत रखती हैं। यदि वर्गीकरण में अनियमितता साबित होती है, तो कंपनी पर अतिरिक्त शुल्क और दंड का जोखिम हो सकता है।
दिल्ली हाईकोर्ट का पुराना फैसला
यह घटनाक्रम पर्नो रिका के लिए एक अन्य कानूनी झटके के बाद आया है। इस वर्ष की शुरुआत में दिल्ली उच्च न्यायालय ने फ्रांसीसी वाइन एवं स्पिरिट्स कंपनी की उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें थोक शराब लाइसेंस देने से इनकार किए जाने के फैसले को चुनौती दी गई थी।
न्यायमूर्ति पुरुषैंद्र कुमार कौरव ने अपने आदेश में कहा था कि दिल्ली आबकारी अधिनियम के तहत कंपनी की आपराधिक पृष्ठभूमि है, जिसके कारण वह एल-1 लाइसेंस पाने के लिए अयोग्य है। अदालत ने दिल्ली आबकारी नीति घोटाला मामले में कंपनी के खिलाफ लंबित अभियोजन को ध्यान में रखते हुए यह निष्कर्ष निकाला।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि दिल्ली आबकारी अधिनियम की धारा 13(1)(सी) के अंतर्गत आपराधिक पृष्ठभूमि होने की स्थिति में लाइसेंस आवेदन को अस्वीकार करना अधिकारियों के लिए उचित था।
आगे क्या होगा
DRI की जांच अभी प्रारंभिक चरण में बताई जा रही है और कोई आरोप-पत्र या नोटिस जारी होने की सूचना नहीं है। कंपनी ने संकेत दिया है कि वह सहयोगात्मक रवैया बनाए रखेगी। यह मामला भारत-ब्रिटेन व्यापार समझौते के क्रियान्वयन और शुल्क रियायतों के अनुपालन को लेकर व्यापक जांच का हिस्सा प्रतीत होता है, जो भविष्य में उद्योग के अन्य खिलाड़ियों को भी प्रभावित कर सकता है।