मध्य पूर्व संकट में कच्चे तेल की निर्बाध आपूर्ति: आपूर्तिकर्ता देश 20 से बढ़कर 41 हुए, पूर्व बीपीसीएल निदेशक ने बताई सफलता की वजह
सारांश
मुख्य बातें
भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) के पूर्व निदेशक (मानव संसाधन) राज कुमार दुबे ने 30 जून 2026 को कहा कि मध्य पूर्व संकट के दौरान देश में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति बाधित न होने के पीछे बीते छह-सात वर्षों में ऊर्जा क्षेत्र में की गई व्यवस्थित तैयारी निर्णायक रही। उन्होंने स्पष्ट किया कि संकट की शुरुआत में सबसे पहली चुनौती कीमत नहीं, बल्कि आपूर्ति की निरंतरता सुनिश्चित करना था।
आपूर्तिकर्ता देशों की संख्या में ऐतिहासिक विस्तार
दुबे के अनुसार, इस सफलता की सबसे ठोस मिसाल यह है कि कच्चे तेल के आपूर्तिकर्ता देशों की संख्या 20 से बढ़ाकर 41 कर दी गई। यह विविधीकरण किसी एक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता के जोखिम को कम करने की दिशा में उठाया गया सुनियोजित कदम था। गौरतलब है कि भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है, और होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाली शिपिंग में व्यवधान का सीधा असर देश की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता था।
कूटनीतिक चैनलों और बहु-एजेंसी समन्वय की भूमिका
दुबे ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कई देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने का सीधा लाभ संकट के दौरान कूटनीतिक चैनलों के प्रभावी उपयोग में दिखा। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों की पृष्ठभूमि ने अंतर-विभागीय समन्वय को सुगम बनाया।
उनके अनुसार, जब पाँच या छह एजेंसियाँ एक साझा उद्देश्य के साथ मिलकर काम करती हैं, तो देश किसी भी संकट का प्रभावी ढंग से सामना कर सकता है। यह पूरी प्रक्रिया प्रधानमंत्री कार्यालय के स्तर पर लिए गए स्पष्ट निर्णयों से संचालित हुई।
घरेलू एलपीजी को सर्वोच्च प्राथमिकता
दुबे ने बताया कि संकट के दौरान सरकार ने 'नागरिक सर्वोपरि' के सिद्धांत पर चलते हुए यह नीतिगत निर्णय लिया कि घरेलू एलपीजी की आपूर्ति में किसी भी स्थिति में कमी नहीं आनी चाहिए। इसके लिए, यदि आवश्यक हो, तो औद्योगिक और वाणिज्यिक उपभोक्ताओं को कुछ असुविधा सहन करनी पड़ सकती थी — लेकिन आम नागरिक के रसोई तक गैस की निर्बाध पहुँच को प्राथमिकता दी गई।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड की पूर्व चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक वर्तिका शुक्ला ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य से उत्पन्न चुनौतियों ने भारत के ऊर्जा क्षेत्र की आंतरिक मजबूती को उजागर किया। उन्होंने कहा कि आपूर्ति श्रृंखला में आई रुकावटों का खुदरा कीमतों पर प्रभाव न्यूनतम रहा, जिसका श्रेय समय पर किए गए स्रोत-विविधीकरण और ऊर्जा अवसंरचना में पर्याप्त निवेश को जाता है।
हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) के पूर्व चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक एम. के. सुराना ने स्वीकार किया कि पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने और होर्मुज जलडमरूमध्य में शिपिंग बाधित होने पर कई विश्लेषकों को आशंका थी कि आयातित कच्चे तेल पर अत्यधिक निर्भर भारत को गंभीर ईंधन संकट का सामना करना पड़ेगा — लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
आगे की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि आपूर्तिकर्ता देशों के विस्तार और कूटनीतिक तैयारी का यह मॉडल भविष्य की ऊर्जा नीति के लिए एक संदर्भ बिंदु बन सकता है। भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति अब केवल मूल्य प्रबंधन तक सीमित नहीं, बल्कि आपूर्ति विविधीकरण और भू-राजनीतिक तैयारी को भी अपने केंद्र में रखती है।