30 जून 2026
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मध्य पूर्व संकट में कच्चे तेल की निर्बाध आपूर्ति: आपूर्तिकर्ता देश 20 से बढ़कर 41 हुए, पूर्व बीपीसीएल निदेशक ने बताई सफलता की वजह

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मध्य पूर्व संकट में कच्चे तेल की निर्बाध आपूर्ति: आपूर्तिकर्ता देश 20 से बढ़कर 41 हुए, पूर्व बीपीसीएल निदेशक ने बताई सफलता की वजह

सारांश

मध्य पूर्व संकट में जब दुनिया को भारत के ईंधन संकट की आशंका थी, तब देश की आपूर्ति अटूट रही। बीपीसीएल के पूर्व निदेशक राज कुमार दुबे के अनुसार, आपूर्तिकर्ता देशों की संख्या 20 से 41 करने और पीएमओ स्तर पर समन्वित निर्णयों ने यह सुनिश्चित किया।

मुख्य बातें

बीपीसीएल के पूर्व निदेशक राज कुमार दुबे ने 30 जून 2026 को कहा कि पिछले 6-7 वर्षों की ऊर्जा तैयारी ने मध्य पूर्व संकट में आपूर्ति बाधित होने से बचाया।
कच्चे तेल के आपूर्तिकर्ता देशों की संख्या 20 से बढ़ाकर 41 की गई, जो विविधीकरण का प्रमुख आधार बनी।
सरकार ने 'नागरिक सर्वोपरि' नीति के तहत घरेलू एलपीजी आपूर्ति को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।
एचपीसीएल के पूर्व एमडी एम.
सुराना ने कहा कि विश्लेषकों को गंभीर ईंधन संकट की आशंका थी, लेकिन आपूर्ति स्थिर रही।
वर्तिका शुक्ला (पूर्व चेयरमैन, इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड) के अनुसार, होर्मुज व्यवधान का खुदरा कीमतों पर प्रभाव न्यूनतम रहा।

भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) के पूर्व निदेशक (मानव संसाधन) राज कुमार दुबे ने 30 जून 2026 को कहा कि मध्य पूर्व संकट के दौरान देश में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति बाधित न होने के पीछे बीते छह-सात वर्षों में ऊर्जा क्षेत्र में की गई व्यवस्थित तैयारी निर्णायक रही। उन्होंने स्पष्ट किया कि संकट की शुरुआत में सबसे पहली चुनौती कीमत नहीं, बल्कि आपूर्ति की निरंतरता सुनिश्चित करना था।

आपूर्तिकर्ता देशों की संख्या में ऐतिहासिक विस्तार

दुबे के अनुसार, इस सफलता की सबसे ठोस मिसाल यह है कि कच्चे तेल के आपूर्तिकर्ता देशों की संख्या 20 से बढ़ाकर 41 कर दी गई। यह विविधीकरण किसी एक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता के जोखिम को कम करने की दिशा में उठाया गया सुनियोजित कदम था। गौरतलब है कि भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है, और होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाली शिपिंग में व्यवधान का सीधा असर देश की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता था।

कूटनीतिक चैनलों और बहु-एजेंसी समन्वय की भूमिका

दुबे ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कई देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने का सीधा लाभ संकट के दौरान कूटनीतिक चैनलों के प्रभावी उपयोग में दिखा। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों की पृष्ठभूमि ने अंतर-विभागीय समन्वय को सुगम बनाया।

उनके अनुसार, जब पाँच या छह एजेंसियाँ एक साझा उद्देश्य के साथ मिलकर काम करती हैं, तो देश किसी भी संकट का प्रभावी ढंग से सामना कर सकता है। यह पूरी प्रक्रिया प्रधानमंत्री कार्यालय के स्तर पर लिए गए स्पष्ट निर्णयों से संचालित हुई।

घरेलू एलपीजी को सर्वोच्च प्राथमिकता

दुबे ने बताया कि संकट के दौरान सरकार ने 'नागरिक सर्वोपरि' के सिद्धांत पर चलते हुए यह नीतिगत निर्णय लिया कि घरेलू एलपीजी की आपूर्ति में किसी भी स्थिति में कमी नहीं आनी चाहिए। इसके लिए, यदि आवश्यक हो, तो औद्योगिक और वाणिज्यिक उपभोक्ताओं को कुछ असुविधा सहन करनी पड़ सकती थी — लेकिन आम नागरिक के रसोई तक गैस की निर्बाध पहुँच को प्राथमिकता दी गई।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं

इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड की पूर्व चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक वर्तिका शुक्ला ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य से उत्पन्न चुनौतियों ने भारत के ऊर्जा क्षेत्र की आंतरिक मजबूती को उजागर किया। उन्होंने कहा कि आपूर्ति श्रृंखला में आई रुकावटों का खुदरा कीमतों पर प्रभाव न्यूनतम रहा, जिसका श्रेय समय पर किए गए स्रोत-विविधीकरण और ऊर्जा अवसंरचना में पर्याप्त निवेश को जाता है।

हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) के पूर्व चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक एम. के. सुराना ने स्वीकार किया कि पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने और होर्मुज जलडमरूमध्य में शिपिंग बाधित होने पर कई विश्लेषकों को आशंका थी कि आयातित कच्चे तेल पर अत्यधिक निर्भर भारत को गंभीर ईंधन संकट का सामना करना पड़ेगा — लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

आगे की राह

विशेषज्ञों का मानना है कि आपूर्तिकर्ता देशों के विस्तार और कूटनीतिक तैयारी का यह मॉडल भविष्य की ऊर्जा नीति के लिए एक संदर्भ बिंदु बन सकता है। भारत की ऊर्जा सुरक्षा रणनीति अब केवल मूल्य प्रबंधन तक सीमित नहीं, बल्कि आपूर्ति विविधीकरण और भू-राजनीतिक तैयारी को भी अपने केंद्र में रखती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

मूल्य-शर्तें और दीर्घकालिक अनुबंध कितने मजबूत हैं। संख्या बढ़ना विविधीकरण की शुरुआत है, पर्याप्तता नहीं। इसके अलावा, घरेलू एलपीजी को प्राथमिकता देने के लिए औद्योगिक उपभोक्ताओं पर डाला गया बोझ अभी तक सार्वजनिक रूप से आँका नहीं गया है — यह पारदर्शिता की कमी है जिसे नीति-विश्लेषकों को उठाना चाहिए। भारत की ऊर्जा सुरक्षा की असली परीक्षा तब होगी जब संकट लंबा खिंचे और वैकल्पिक स्रोत एक साथ दबाव में आएँ।
RashtraPress
30 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मध्य पूर्व संकट में भारत की कच्चे तेल की आपूर्ति कैसे निर्बाध रही?
बीपीसीएल के पूर्व निदेशक राज कुमार दुबे के अनुसार, पिछले 6-7 वर्षों में आपूर्तिकर्ता देशों की संख्या 20 से बढ़ाकर 41 करने और कूटनीतिक चैनलों के प्रभावी उपयोग ने आपूर्ति को बाधित होने से बचाया। प्रधानमंत्री कार्यालय स्तर पर समन्वित निर्णयों ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई।
होर्मुज जलडमरूमध्य संकट का भारत की ईंधन कीमतों पर क्या असर पड़ा?
इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड की पूर्व चेयरमैन वर्तिका शुक्ला के अनुसार, आपूर्ति श्रृंखला में आई रुकावटों का खुदरा कीमतों पर प्रभाव न्यूनतम रहा। इसका कारण समय पर किया गया स्रोत-विविधीकरण और ऊर्जा अवसंरचना में पर्याप्त निवेश था।
सरकार ने एलपीजी आपूर्ति को लेकर क्या नीतिगत निर्णय लिया?
सरकार ने 'नागरिक सर्वोपरि' के सिद्धांत पर घरेलू एलपीजी की आपूर्ति को सर्वोच्च प्राथमिकता देने का निर्णय लिया। इसके तहत यह सुनिश्चित किया गया कि घरेलू उपभोक्ताओं को गैस की कमी न हो, भले ही औद्योगिक और वाणिज्यिक उपभोक्ताओं को कुछ असुविधा सहनी पड़े।
भारत के कच्चे तेल आपूर्तिकर्ता देशों की संख्या कितनी हो गई है?
राज कुमार दुबे के अनुसार, भारत के कच्चे तेल आपूर्तिकर्ता देशों की संख्या 20 से बढ़कर 41 हो गई है। यह विस्तार किसी एक भौगोलिक क्षेत्र पर निर्भरता कम करने की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है।
एचपीसीएल के पूर्व प्रमुख ने मध्य पूर्व संकट पर क्या कहा?
एचपीसीएल के पूर्व चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक एम. के. सुराना ने कहा कि जब होर्मुज जलडमरूमध्य में शिपिंग बाधित हुई, तो कई विश्लेषकों को भारत में गंभीर ईंधन संकट की आशंका थी क्योंकि देश आयातित कच्चे तेल पर अत्यधिक निर्भर है। हालाँकि, वास्तविकता में आपूर्ति स्थिर बनी रही।
राष्ट्र प्रेस
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