उत्पाद शुल्क कटौती से पेट्रोल-डीजल महंगाई 4.4% तक सीमित, सरकार को ₹30,000 करोड़ का राजस्व नुकसान

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उत्पाद शुल्क कटौती से पेट्रोल-डीजल महंगाई 4.4% तक सीमित, सरकार को ₹30,000 करोड़ का राजस्व नुकसान

सारांश

कच्चे तेल के 100 डॉलर प्रति बैरल पार करने के बावजूद भारत में पेट्रोल-डीजल सिर्फ ₹3.91/लीटर महंगा हुआ — यह संभव हुआ ₹30,000 करोड़ की उत्पाद शुल्क कटौती और तेल कंपनियों की ₹24,500 करोड़ की अंडर-रिकवरी से। जहाँ दुनिया में ईंधन 10-90% महंगा हुआ, वहाँ भारत ने वृद्धि 4.4% पर रोकी।

मुख्य बातें

केंद्र सरकार ने उत्पाद शुल्क कटौती से पेट्रोल-डीजल की कीमत वृद्धि 4.4 प्रतिशत तक सीमित रखी।
तेल विपणन कंपनियों ने दो किस्तों में कुल ₹3.91 प्रति लीटर की वृद्धि की, 76 दिनों तक पूरी लागत स्वयं वहन करने के बाद।
सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को पेट्रोल-डीजल पर ₹24,500 करोड़ और एलपीजी पर ₹40,000 करोड़ की अंडर-रिकवरी हुई।
उत्पाद शुल्क कटौती से सरकार को ₹30,000 करोड़ के राजस्व का नुकसान उठाना पड़ा।
वैश्विक स्तर पर अन्य देशों ने ईंधन कीमतों में 10 से 90 प्रतिशत तक की वृद्धि की है।
तेलंगाना, केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु में पेट्रोल सबसे महंगा; गुजरात, दिल्ली, गोवा में सबसे सस्ता — वैट के कारण।

केंद्र सरकार ने उत्पाद शुल्क में कटौती और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को हुए नुकसान की भरपाई के निर्देश देकर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि को 4.4 प्रतिशत तक सीमित रखने में सफलता पाई है। कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से अधिक होने के बावजूद यह कदम उठाया गया, जिससे आम उपभोक्ताओं को वैश्विक बाज़ार की पूरी मार से बचाया जा सका।

कीमतों में कितनी हुई वृद्धि

भारत की तेल विपणन कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में दो चरणों में कुल ₹3.91 प्रति लीटर की वृद्धि की — पहले ₹3 और फिर 91 पैसे। इंडियन ऑयल के एक अधिकारी के अनुसार, यह वृद्धि सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों द्वारा 76 दिनों तक पूरी लागत स्वयं वहन करने के बाद लागू की गई।

गौरतलब है कि इस दौरान कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल पर ₹24,500 करोड़ की कम वसूली (अंडर-रिकवरी) को अपनी जेब से भरा, ताकि उपभोक्ताओं पर अचानक बोझ न पड़े।

सरकार और तेल कंपनियों को कितना नुकसान

एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के अनुसार, उत्पाद शुल्क में की गई कटौती के कारण केंद्र सरकार को ₹30,000 करोड़ के राजस्व का नुकसान उठाना पड़ा। इसके अतिरिक्त, तेल कंपनियों को पेट्रोल-डीजल पर ₹24,500 करोड़ और घरेलू उपभोक्ताओं के लिए एलपीजी की कीमत स्थिर रखने पर ₹40,000 करोड़ का अतिरिक्त नुकसान हुआ।

यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में अस्थिरता चरम पर है और कई देश अपने नागरिकों पर कच्चे तेल की बढ़ी लागत का पूरा बोझ डाल रहे हैं।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारत की स्थिति

आँकड़ों के अनुसार, दुनिया के अधिकांश देशों ने कच्चे तेल की बढ़ी कीमतों को समायोजित करने के लिए खुदरा ईंधन कीमतों में 10 से 90 प्रतिशत तक की वृद्धि की है। म्यांमार, मलेशिया, पाकिस्तान और संयुक्त अरब अमीरात में पेट्रोल की कीमतें युद्ध-पूर्व स्तर से आधे से अधिक बढ़ चुकी हैं। डीजल की कीमतें वैश्विक व्यापार और माल ढुलाई से गहरे जुड़ाव के कारण और भी तेज़ी से बढ़ी हैं।

इस तुलना में भारत की 4.4 प्रतिशत की वृद्धि उल्लेखनीय रूप से नियंत्रित मानी जा रही है।

राज्यवार कीमतों में अंतर क्यों

पेट्रोल और डीजल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क सभी राज्यों में एकसमान है। हालाँकि, प्रत्येक राज्य सरकार द्वारा लगाए जाने वाले मूल्य वर्धित कर (वैट) के कारण पंप कीमतों में राज्य-दर-राज्य अंतर बना रहता है।

सबसे अधिक पेट्रोल पंप कीमत वाले राज्यों में तेलंगाना, केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु शामिल हैं। वहीं, सबसे कम कीमत वाले राज्यों में गुजरात, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, गोवा और असम आते हैं।

आगे क्या

कच्चे तेल की वैश्विक कीमतें यदि 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी रहती हैं, तो तेल कंपनियों की अंडर-रिकवरी बढ़ती जाएगी और सरकार पर सब्सिडी का दबाव और गहरा हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि एलपीजी कीमतों को लंबे समय तक स्थिर रखना भी वित्तीय रूप से टिकाऊ नहीं है, और आने वाले महीनों में नीतिगत समीक्षा की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन वित्तीय दृष्टि से यह एक महंगा संतुलन है — ₹30,000 करोड़ का राजस्व घाटा और तेल कंपनियों पर ₹64,500 करोड़ से अधिक का संचित बोझ दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ नहीं है। असली सवाल यह है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी रहती हैं, तो सरकार कब तक इस 'बफर नीति' को जारी रख सकती है। एलपीजी पर ₹40,000 करोड़ की अंडर-रिकवरी बताती है कि घरेलू ऊर्जा सब्सिडी का बोझ तेज़ी से बढ़ रहा है। मुख्यधारा की कवरेज जो अक्सर चूक जाती है, वह यह है कि इस राहत की असली कीमत अंततः या तो भावी कर वृद्धि के रूप में या तेल कंपनियों के कमज़ोर बैलेंस शीट के रूप में सामने आएगी।
RashtraPress
20 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सरकार ने पेट्रोल-डीजल की कीमत वृद्धि 4.4% तक कैसे सीमित की?
सरकार ने उत्पाद शुल्क में कटौती कर ₹30,000 करोड़ का राजस्व त्याग किया और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को ₹24,500 करोड़ की अंडर-रिकवरी स्वयं वहन करने के निर्देश दिए। इस दोहरी रणनीति से कच्चे तेल की ऊँची कीमतों का पूरा बोझ उपभोक्ताओं पर नहीं पड़ा।
पेट्रोल और डीजल कितना महंगा हुआ?
तेल विपणन कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल में दो चरणों में कुल ₹3.91 प्रति लीटर की वृद्धि की — पहले ₹3 और फिर 91 पैसे। यह वृद्धि 76 दिनों तक कंपनियों द्वारा पूरी लागत स्वयं वहन करने के बाद लागू की गई।
एलपीजी की कीमत क्यों नहीं बढ़ाई गई और इसका क्या असर हुआ?
सरकार ने घरेलू उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए एलपीजी की कीमत स्थिर रखी, जिसके कारण तेल कंपनियों को ₹40,000 करोड़ का नुकसान हुआ। यह निर्णय आम परिवारों पर महंगाई के असर को कम करने के लिए लिया गया।
अलग-अलग राज्यों में पेट्रोल की कीमत अलग क्यों होती है?
केंद्रीय उत्पाद शुल्क सभी राज्यों में समान है, लेकिन प्रत्येक राज्य सरकार अपना मूल्य वर्धित कर (वैट) अलग दर से लगाती है। इसीलिए तेलंगाना, केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु में पेट्रोल सबसे महंगा है, जबकि गुजरात, दिल्ली और गोवा में सबसे सस्ता।
भारत की ईंधन कीमत वृद्धि वैश्विक स्तर पर कैसी है?
भारत में जहाँ वृद्धि 4.4 प्रतिशत तक सीमित रही, वहीं म्यांमार, मलेशिया, पाकिस्तान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में पेट्रोल की कीमतें युद्ध-पूर्व स्तर से आधे से अधिक बढ़ चुकी हैं। वैश्विक औसत वृद्धि 10 से 90 प्रतिशत के बीच रही है।
राष्ट्र प्रेस
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