उत्पाद शुल्क कटौती से पेट्रोल-डीजल महंगाई 4.4% तक सीमित, सरकार को ₹30,000 करोड़ का राजस्व नुकसान
सारांश
मुख्य बातें
केंद्र सरकार ने उत्पाद शुल्क में कटौती और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को हुए नुकसान की भरपाई के निर्देश देकर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि को 4.4 प्रतिशत तक सीमित रखने में सफलता पाई है। कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल से अधिक होने के बावजूद यह कदम उठाया गया, जिससे आम उपभोक्ताओं को वैश्विक बाज़ार की पूरी मार से बचाया जा सका।
कीमतों में कितनी हुई वृद्धि
भारत की तेल विपणन कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में दो चरणों में कुल ₹3.91 प्रति लीटर की वृद्धि की — पहले ₹3 और फिर 91 पैसे। इंडियन ऑयल के एक अधिकारी के अनुसार, यह वृद्धि सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों द्वारा 76 दिनों तक पूरी लागत स्वयं वहन करने के बाद लागू की गई।
गौरतलब है कि इस दौरान कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल पर ₹24,500 करोड़ की कम वसूली (अंडर-रिकवरी) को अपनी जेब से भरा, ताकि उपभोक्ताओं पर अचानक बोझ न पड़े।
सरकार और तेल कंपनियों को कितना नुकसान
एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के अनुसार, उत्पाद शुल्क में की गई कटौती के कारण केंद्र सरकार को ₹30,000 करोड़ के राजस्व का नुकसान उठाना पड़ा। इसके अतिरिक्त, तेल कंपनियों को पेट्रोल-डीजल पर ₹24,500 करोड़ और घरेलू उपभोक्ताओं के लिए एलपीजी की कीमत स्थिर रखने पर ₹40,000 करोड़ का अतिरिक्त नुकसान हुआ।
यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में अस्थिरता चरम पर है और कई देश अपने नागरिकों पर कच्चे तेल की बढ़ी लागत का पूरा बोझ डाल रहे हैं।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारत की स्थिति
आँकड़ों के अनुसार, दुनिया के अधिकांश देशों ने कच्चे तेल की बढ़ी कीमतों को समायोजित करने के लिए खुदरा ईंधन कीमतों में 10 से 90 प्रतिशत तक की वृद्धि की है। म्यांमार, मलेशिया, पाकिस्तान और संयुक्त अरब अमीरात में पेट्रोल की कीमतें युद्ध-पूर्व स्तर से आधे से अधिक बढ़ चुकी हैं। डीजल की कीमतें वैश्विक व्यापार और माल ढुलाई से गहरे जुड़ाव के कारण और भी तेज़ी से बढ़ी हैं।
इस तुलना में भारत की 4.4 प्रतिशत की वृद्धि उल्लेखनीय रूप से नियंत्रित मानी जा रही है।
राज्यवार कीमतों में अंतर क्यों
पेट्रोल और डीजल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क सभी राज्यों में एकसमान है। हालाँकि, प्रत्येक राज्य सरकार द्वारा लगाए जाने वाले मूल्य वर्धित कर (वैट) के कारण पंप कीमतों में राज्य-दर-राज्य अंतर बना रहता है।
सबसे अधिक पेट्रोल पंप कीमत वाले राज्यों में तेलंगाना, केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु शामिल हैं। वहीं, सबसे कम कीमत वाले राज्यों में गुजरात, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, गोवा और असम आते हैं।
आगे क्या
कच्चे तेल की वैश्विक कीमतें यदि 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी रहती हैं, तो तेल कंपनियों की अंडर-रिकवरी बढ़ती जाएगी और सरकार पर सब्सिडी का दबाव और गहरा हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि एलपीजी कीमतों को लंबे समय तक स्थिर रखना भी वित्तीय रूप से टिकाऊ नहीं है, और आने वाले महीनों में नीतिगत समीक्षा की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।