पेट्रोल-डीजल पर ₹27-30 की राहत: 2021 से 2026 तक सरकार ने खुद उठाया वैश्विक ऊर्जा संकट का बोझ

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पेट्रोल-डीजल पर ₹27-30 की राहत: 2021 से 2026 तक सरकार ने खुद उठाया वैश्विक ऊर्जा संकट का बोझ

सारांश

वैश्विक ऊर्जा उथल-पुथल के बीच भारत ने जो किया वह दुनिया की किसी और बड़ी अर्थव्यवस्था ने नहीं किया — रूस-यूक्रेन युद्ध और होर्मुज संकट दोनों में पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतें घटाईं। एक नई रिपोर्ट बताती है कि 2021 से 2026 के बीच ₹27-30 प्रति लीटर की राहत और ₹30,000 करोड़ का सरकारी बोझ इसकी असली कीमत था।

मुख्य बातें

रिपोर्ट के अनुसार, नवंबर 2021 से मार्च 2026 के बीच पेट्रोल पर ₹27 और डीजल पर ₹30 प्रति लीटर की कुल राहत दी गई।
27 मार्च 2026 को SAED कटौती से पेट्रोल-डीजल दोनों पर ₹10-₹10 प्रति लीटर की राहत; केंद्र पर ₹30,000 करोड़ का अतिरिक्त बोझ।
होर्मुज संकट के दौरान ब्रेंट क्रूड $126 प्रति बैरल पहुँचने पर भी भारत में कीमतें 12 सप्ताह तक स्थिर रहीं।
फरवरी 2022 से फरवरी 2026 के बीच दिल्ली में पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतों में 1% से कम बदलाव हुआ।
15 मई को पेट्रोल में ₹3.14 और डीजल में ₹3.11 की वृद्धि; 19 मई को फिर ~90 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोतरी।
रिपोर्ट में आरोप: केंद्र की एक्साइज ड्यूटी कटौती के बावजूद कई विपक्ष-शासित राज्यों ने वैट में कमी नहीं की ।

केंद्र सरकार ने नवंबर 2021 से मार्च 2026 के बीच पेट्रोल पर कुल ₹27 प्रति लीटर और डीजल पर ₹30 प्रति लीटर तक की राहत दी — यह दावा मंगलवार, 19 मई 2026 को जारी रिपोर्ट 'पेट्रोल और डीजल: उपभोक्ता संरक्षण की संरचना' में किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, रूस-यूक्रेन युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य संकट — दोनों वैश्विक ऊर्जा उथल-पुथल के दौरान खुदरा ईंधन कीमतों में कटौती करने वाला भारत दुनिया की इकलौती बड़ी अर्थव्यवस्था रहा।

राहत का कालक्रम: कब-कब घटे दाम

रिपोर्ट में दर्ज आँकड़ों के अनुसार, सरकार ने अलग-अलग चरणों में ईंधन पर राहत दी। 4 नवंबर 2021 को पेट्रोल पर ₹5 और डीजल पर ₹10 की कटौती हुई। 21 मई 2022 को पेट्रोल पर ₹8 और डीजल पर ₹6 की राहत दी गई। 14 मार्च 2024 को तेल कंपनियों ने दोनों ईंधनों पर ₹2-₹2 की कटौती की। अप्रैल 2025 में फिर दोनों पर ₹2-₹2 की राहत मिली। अंत में, 27 मार्च 2026 को स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी (SAED) में कटौती के ज़रिये पेट्रोल और डीजल दोनों पर ₹10-₹10 प्रति लीटर की राहत दी गई।

होर्मुज संकट और सरकार का वित्तीय बोझ

रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी 2026 में होर्मुज जलडमरूमध्य संकट शुरू होने के बाद दुनिया के कई देशों में ईंधन कीमतें 10 से 90 प्रतिशत तक बढ़ गईं, जबकि भारत में लगभग 12 सप्ताह तक कीमतें स्थिर रखी गईं। उस दौरान ब्रेंट क्रूड $126 प्रति बैरल तक पहुँच गया था। केवल मार्च 2026 की SAED कटौती से केंद्र सरकार पर लगभग ₹30,000 करोड़ का अतिरिक्त बोझ पड़ा। सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों ने भी अंडर-रिकवरी झेली ताकि उपभोक्ताओं को राहत मिलती रहे।

गौरतलब है कि फरवरी 2022 से फरवरी 2026 के बीच — यानी चार वर्षों में — नई दिल्ली में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में एक प्रतिशत से भी कम बदलाव हुआ, जबकि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें भारी उतार-चढ़ाव से गुज़रीं।

हालिया मूल्य वृद्धि और संदर्भ

यह ऐसे समय में आया है जब पश्चिम एशिया में जारी संघर्षों के चलते 15 मई 2026 को पेट्रोल में ₹3.14 और डीजल में ₹3.11 प्रति लीटर की वृद्धि की गई। इसके महज चार दिन बाद, 19 मई को फिर दोनों ईंधनों पर लगभग 90 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई। रिपोर्ट इन ताज़ा बढ़ोतरियों को वैश्विक कच्चे तेल के दबाव से जोड़ती है।

कांग्रेस के आरोपों पर रिपोर्ट का जवाब

रिपोर्ट में कांग्रेस के 'ओवर टैक्सेशन' के आरोपों का भी खंडन किया गया है। इसमें कहा गया है कि यूपीए सरकार के कार्यकाल में तेल कंपनियों को राहत देने के लिए ऑयल बॉन्ड जारी किए गए थे, जिनका वित्तीय बोझ बाद की सरकारों और भविष्य की पीढ़ियों पर डाला गया। इसके विपरीत, रिपोर्ट का दावा है कि मौजूदा सरकार ने एक्साइज ड्यूटी घटाकर सीधी राहत दी, जिससे उपभोक्ताओं को तत्काल लाभ मिला और भविष्य पर कोई अतिरिक्त वित्तीय दायित्व नहीं बना।

राज्यों में कीमतों का अंतर और वैट विवाद

रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी पूरे देश में समान है, लेकिन राज्यों की वैट दरें अलग-अलग होने के कारण खुदरा कीमतों में फ़र्क दिखता है। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल जैसे राज्यों में पेट्रोल ₹107 प्रति लीटर से ऊपर है, क्योंकि वहाँ वैट अधिक है। वहीं गुजरात, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, गोवा और असम में कीमतें अपेक्षाकृत कम हैं। रिपोर्ट में यह भी आरोप लगाया गया है कि केंद्र द्वारा एक्साइज ड्यूटी घटाने के बावजूद कई विपक्ष-शासित राज्यों ने अपने वैट में कोई कटौती नहीं की।

आने वाले समय में वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों की दिशा और पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक स्थिरता यह तय करेगी कि सरकार उपभोक्ता राहत की यह नीति कितने समय तक जारी रख सकती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

राजनीतिक रूप से सुविधाजनक है — लेकिन इसे स्वतंत्र तुलनात्मक डेटा से परखा जाना ज़रूरी है। ₹30,000 करोड़ के राजकोषीय बोझ और तेल कंपनियों की अंडर-रिकवरी की असली कीमत अंततः करदाताओं और सार्वजनिक उद्यमों की बैलेंस शीट पर पड़ती है। विपक्ष-शासित राज्यों पर वैट न घटाने का आरोप आंशिक रूप से सही हो सकता है, लेकिन यह इस तथ्य को नहीं छुपाता कि 15 और 19 मई की ताज़ा बढ़ोतरियाँ बताती हैं कि यह 'उपभोक्ता संरक्षण' टिकाऊ नहीं है — यह वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों पर निर्भर एक अस्थायी राहत है।
RashtraPress
19 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

2021 से 2026 के बीच पेट्रोल-डीजल पर कितनी राहत दी गई?
रिपोर्ट के अनुसार, नवंबर 2021 से मार्च 2026 के बीच पेट्रोल पर कुल ₹27 प्रति लीटर और डीजल पर ₹30 प्रति लीटर की राहत दी गई। यह राहत एक्साइज ड्यूटी कटौती और SAED में बदलाव के ज़रिये अलग-अलग चरणों में दी गई।
27 मार्च 2026 की SAED कटौती क्या थी और इसका असर क्या पड़ा?
27 मार्च 2026 को स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी (SAED) में कटौती के ज़रिये पेट्रोल और डीजल दोनों पर ₹10-₹10 प्रति लीटर की राहत दी गई। इस एकल कदम से केंद्र सरकार पर लगभग ₹30,000 करोड़ का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ा।
होर्मुज जलडमरूमध्य संकट के दौरान भारत में ईंधन कीमतों का क्या हुआ?
रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी 2026 में संकट शुरू होने के बाद भारत में लगभग 12 सप्ताह तक ईंधन कीमतें स्थिर रखी गईं, जबकि दुनिया के अन्य देशों में 10 से 90 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई। ब्रेंट क्रूड $126 प्रति बैरल तक पहुँचने के बावजूद सरकार और सार्वजनिक तेल कंपनियों ने नुकसान सहकर कीमतें स्थिर रखीं।
अलग-अलग राज्यों में पेट्रोल की कीमतें अलग क्यों हैं?
केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी पूरे देश में एक समान है, लेकिन राज्यों की वैट दरें अलग-अलग होने से खुदरा कीमतों में अंतर आता है। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल में पेट्रोल ₹107 प्रति लीटर से ऊपर है, जबकि दिल्ली, गुजरात और उत्तर प्रदेश में कीमतें कम हैं।
कांग्रेस के 'ओवर टैक्सेशन' के आरोपों पर रिपोर्ट क्या कहती है?
रिपोर्ट में कहा गया है कि यूपीए सरकार ने तेल कंपनियों को राहत देने के लिए ऑयल बॉन्ड जारी किए थे, जिनका बोझ बाद की सरकारों पर आया। मौजूदा सरकार ने एक्साइज ड्यूटी सीधे घटाकर राहत दी, जिससे उपभोक्ताओं को तत्काल फायदा मिला और भविष्य पर कोई अतिरिक्त दायित्व नहीं बना — यह रिपोर्ट का दावा है।
राष्ट्र प्रेस
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