हॉर्मुज स्ट्रेट खुलने के बाद भी इनपुट लागत ऊंची रहेगी, खुदरा महंगाई पर दबाव बरकरार: क्रिसिल
सारांश
मुख्य बातें
क्रिसिल की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, हॉर्मुज स्ट्रेट के दोबारा खुलने के बावजूद इस वर्ष इनपुट लागत ऊंचे स्तर पर बनी रहने की आशंका है, जिससे मैन्युफैक्चरर्स पर वित्तीय दबाव जारी रहेगा। रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि आने वाले महीनों में खुदरा महंगाई भी ऊपर की ओर जा सकती है।
इनपुट-आउटपुट अनुपात का खतरनाक संकेत
थोक मूल्य सूचकांक (WPI) पर आधारित क्रिसिल का इनपुट-आउटपुट अनुपात अप्रैल में 1.0 के पार पहुंच गया — यह स्तर लगातार 44 महीनों से नीचे था। इससे पहले यह अनुपात मार्च 2022 में रूस-यूक्रेन संघर्ष के बाद 1.0 से ऊपर गया था और पाँच महीनों तक उसी स्तर पर टिका रहा था। यह आँकड़ा संकेत देता है कि उत्पादन लागत, बिक्री मूल्यों की तुलना में तेज़ी से बढ़ रही है।
किन सामग्रियों की कीमतें सबसे अधिक बढ़ीं
रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल में WPI श्रेणियों के आधार पर तांबे की कीमतों में 17.3%, एल्युमीनियम में 20.6%, कच्चे तेल से संबंधित कीमतों में 49.3% और गैस से जुड़ी कीमतों में 19.1% की वृद्धि दर्ज की गई।
वित्त वर्ष 2026 में भी यह दबाव बना रहा — तांबे की कीमतें औसतन 8.7% बढ़ीं, जो उनके दशकीय औसत 7.8% से अधिक है। एल्युमीनियम में 6.5% की वृद्धि हुई, जो दशकीय औसत 5.4% से ऊपर है।
पश्चिम एशिया संकट का व्यापक असर
क्रिसिल की रिपोर्ट में कहा गया है कि 'पश्चिम एशिया संघर्ष ने दुनिया को अब तक का सबसे बड़ा तेल संकट दिया है।' हॉर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से केवल तेल ही नहीं, बल्कि अन्य इनपुट श्रेणियों पर भी असर पड़ा, जबकि निर्माता पहले से ही तांबा और एल्युमीनियम जैसी महत्वपूर्ण सामग्रियों की बढ़ती लागत से जूझ रहे थे।
ऊर्जा की ऊंची कीमतों — विशेष रूप से कच्चे पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और खनिज तेलों — के साथ-साथ इस्पात, बुनियादी रसायनों, उर्वरकों, प्लास्टिक, सिंथेटिक रबर, मानव निर्मित फाइबर और अलौह धातुओं की मैन्युफैक्चरिंग लागत में भी तेज़ बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
थोक और खुदरा महंगाई पर प्रभाव
रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि महंगाई का दबाव सबसे पहले WPI में दिखेगा, लेकिन बढ़ती इनपुट लागत का असर जल्द ही उपभोक्ता कीमतों (CPI) पर भी परिलक्षित होने की आशंका है। गौरतलब है कि वित्त वर्ष 2026 में थोक महंगाई दर मात्र 0.7% थी, जबकि गैर-खाद्य पदार्थों में यह 1.1% रही — यानी आधार प्रभाव अब उलटा पड़ सकता है।
आम जनता और उद्योग पर असर
राहत की बात यह है कि घरेलू बाज़ार में मांग अभी मज़बूत बनी हुई है, जिससे मैन्युफैक्चरर्स को कुछ हद तक बढ़ी हुई लागत ग्राहकों पर डालने की गुंजाइश मिलती है। हालांकि, यदि यह सिलसिला जारी रहा, तो उपभोक्ताओं को रोज़मर्रा की वस्तुओं — विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक्स, वाहन, पैकेज्ड उत्पाद और निर्माण सामग्री — में मूल्य वृद्धि झेलनी पड़ सकती है। आने वाले महीनों में RBI की मौद्रिक नीति पर भी इसका असर पड़ सकता है।