जून में भारत का कंपोजिट पीएमआई 57.4 पर, वैश्विक उथल-पुथल के बावजूद निजी क्षेत्र मजबूत
सारांश
मुख्य बातें
एचएसबीसी फ्लैश इंडिया पीएमआई कंपोजिट आउटपुट इंडेक्स जून में 57.4 पर रहा — जो मई के 59.3 से कम है, लेकिन 50 के विस्तार-संकुचन सीमारेखा से काफी ऊपर है। 23 जून 2026 को जारी इस फ्लैश डेटा के अनुसार, वैश्विक अनिश्चितता के माहौल में भी भारत के निजी क्षेत्र की गतिविधियाँ मज़बूत बनी हुई हैं और नए ऑर्डर्स में वृद्धि जारी है।
मुख्य घटनाक्रम
पीएमआई पैमाने पर 50 से ऊपर का कोई भी अंक आर्थिक गतिविधियों में विस्तार का संकेत देता है। जून का 57.4 का स्तर यह दर्शाता है कि भले ही रफ़्तार मई की तुलना में कुछ धीमी हुई हो, भारतीय निजी क्षेत्र की बुनियाद अभी भी ठोस है। डेटा के अनुसार, मांग में हल्की कमी और इन्वेंट्री निर्माण की धीमी गति ने मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट की वृद्धि पर दबाव डाला।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
एचएसबीसी में भारत की मुख्य अर्थशास्त्री प्रांजुल भंडारी ने कहा, 'जून में निजी क्षेत्र की गतिविधियों में थोड़ी नरमी आई। नए निर्यात ऑर्डर मज़बूत बने रहे और ऑर्डर-टू-इन्वेंट्री रेश्यो में बढ़ोतरी हुई, जो आगे भी मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियों के मज़बूत रहने का संकेत है। प्राइवेट सेक्टर में इनपुट लागत बढ़ी, लेकिन यह बढ़ोतरी पिछले पाँच महीनों में सबसे धीमी रही।'
लागत दबाव और महंगाई
पीएमआई सर्वेक्षण में शामिल निजी क्षेत्र की कंपनियों ने लगातार हर महीने परिचालन लागत में वृद्धि दर्ज की है। इसकी मुख्य वजह केमिकल, खाद्य पदार्थ, ईंधन, गैस, धातु और यूटिलिटी सेवाओं की बढ़ती कीमतें बताई गई हैं। गौरतलब है कि सर्विस सेक्टर की तुलना में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में लागत का दबाव अधिक रहा। हालाँकि, एक राहत की बात यह है कि समग्र महंगाई दर लगातार तीसरे महीने घटी और जनवरी 2026 के बाद सबसे निचले स्तर पर आ गई।
निर्यात और सेक्टर-वार प्रदर्शन
जून में निर्यात के रुझान मिले-जुले रहे। सेवा क्षेत्र में निर्यात ऑर्डर्स में तेज़ बढ़ोतरी दर्ज हुई, जबकि मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में निर्यात वृद्धि मार्च 2023 के बाद सबसे कम रही। यह अंतर दर्शाता है कि वैश्विक माँग का दबाव दोनों क्षेत्रों पर अलग-अलग तरीके से असर डाल रहा है।
आगे की संभावनाएँ
सर्वेक्षण में शामिल कंपनियों ने अगले 12 महीनों में उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि का भरोसा जताया है। मज़बूत ऑर्डर-टू-इन्वेंट्री रेश्यो और स्थिर निर्यात माँग इस आशावाद की नींव हैं। आँकड़ों के अनुसार, जब तक वैश्विक माँग में कोई बड़ा झटका नहीं आता, भारतीय निजी क्षेत्र की गतिविधियाँ विस्तार की राह पर बनी रहेंगी।