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भारत की गिग इंटरनेट वर्कफोर्स 2030 तक तीन गुना होकर 2.1 करोड़ तक पहुँच सकती है: रेडसीर रिपोर्ट

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भारत की गिग इंटरनेट वर्कफोर्स 2030 तक तीन गुना होकर 2.1 करोड़ तक पहुँच सकती है: रेडसीर रिपोर्ट

सारांश

रेडसीर की रिपोर्ट बताती है कि भारत की गिग इंटरनेट वर्कफोर्स 2030 तक 60 लाख से बढ़कर 2.1 करोड़ तक पहुँच सकती है — यानी हर साल पैदा होने वाली 70% गैर-कृषि नौकरियों की माँग अकेले गिग सेक्टर पूरी कर सकता है। यह भारत के श्रम बाज़ार का सबसे बड़ा संरचनात्मक बदलाव हो सकता है।

मुख्य बातें

भारत की गिग इंटरनेट वर्कफोर्स 2030 तक 1.7 करोड़ से 2.1 करोड़ मासिक सक्रिय श्रमिकों तक पहुँच सकती है — अभी यह संख्या 60 लाख है।
वृद्धि दर 24–29% CAGR अनुमानित; राइड-हेलिंग में सर्वाधिक 1.2–1.4 करोड़ वर्कर्स होंगे।
गिग सेक्टर 2030 तक हर साल पैदा होने वाली 80 लाख गैर-कृषि नौकरियों में से 70% की माँग पूरी कर सकता है।
फुल-टाइम गिग वर्कर्स की आय औपचारिक/अनौपचारिक समकक्षों से ढाई गुना अधिक — औसत ₹138 प्रति घंटा बनाम ₹54 प्रति घंटा ।
54% मौजूदा गिग वर्कर्स प्लेटफॉर्म से जुड़ने से पहले किसी वेतनभोगी नौकरी में नहीं थे।
यह रिपोर्ट 2,250 गिग वर्कर्स पर किए गए सर्वेक्षण पर आधारित है।

रेडसीर स्ट्रैटेजी कंसल्टेंट्स की एक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, भारत की गिग इंटरनेट वर्कफोर्स वर्ष 2030 तक लगभग तीन गुना बढ़कर 1.7 करोड़ से 2.1 करोड़ मासिक सक्रिय श्रमिकों तक पहुँच सकती है। फिलहाल देश में करीब 60 लाख लोग गिग इंटरनेट प्लेटफॉर्म के ज़रिए आजीविका कमा रहे हैं, और यह संख्या 24 से 29 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) से बढ़ने का अनुमान है।

किस क्षेत्र में कितने वर्कर्स

रिपोर्ट के अनुमानों के अनुसार, 2030 तक राइड-हेलिंग (कैब सेवाएँ) क्षेत्र में सर्वाधिक 1.2 करोड़ से 1.4 करोड़ गिग वर्कर्स होंगे। डिलीवरी सेक्टर में यह संख्या 50 से 70 लाख और होम सर्विसेज में 20,000 से 30,000 तक रहने का अनुमान है। यह रिपोर्ट 2,250 गिग वर्कर्स पर किए गए सर्वेक्षण के आधार पर तैयार की गई है।

रोज़गार बाज़ार पर असर

रिपोर्ट के मुताबिक, डिलीवरी, राइड-हेलिंग और होम सर्विसेज से जुड़ा गिग वर्कफोर्स वर्ष 2030 तक देश में हर साल पैदा होने वाली लगभग 80 लाख गैर-कृषि नौकरियों में से करीब 70 प्रतिशत रोज़गार की ज़रूरत को पूरा कर सकता है। गौरतलब है कि अनुमानित गिग वर्कफोर्स में 30 प्रतिशत से अधिक लोग पहली बार रोज़गार बाज़ार में प्रवेश करने वाले हो सकते हैं। सर्वेक्षण में शामिल मौजूदा गिग वर्कर्स में से करीब 54 प्रतिशत ने बताया कि गिग प्लेटफॉर्म से जुड़ने से पहले वे किसी भी प्रकार की वेतनभोगी नौकरी में नहीं थे।

आय का तुलनात्मक चित्र

रिपोर्ट के अनुसार, फुल-टाइम गिग वर्कर्स की आय समान प्रकार की औपचारिक और अनौपचारिक नौकरियों की तुलना में ढाई गुना तक अधिक है। गिग वर्कर्स की औसत कमाई ₹138 प्रति घंटा रही, जबकि समान कार्य करने वाले औपचारिक और अनौपचारिक कर्मचारियों की औसत आय ₹54 प्रति घंटा दर्ज की गई। मासिक शुद्ध आय के मामले में होम सर्विसेज से जुड़े गिग वर्कर्स सबसे आगे रहे, जिनकी औसत कमाई ₹70,000 से ₹80,000 प्रति माह रही। राइड-हेलिंग ड्राइवरों की मासिक आय ₹37,000 से ₹39,000 और डिलीवरी वर्कर्स की औसत आय ₹22,000 से ₹23,000 प्रति माह रही।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं

रेडसीर स्ट्रैटेजी कंसल्टेंट्स के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी अनिल कुमार ने कहा कि पिछले एक दशक में गिग इंटरनेट भारत के कार्यबल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनकर उभरा है। उन्होंने कहा, 'इन प्लेटफॉर्म्स ने लाखों लोगों को लचीले और माँग-आधारित रोज़गार के अवसर उपलब्ध कराए हैं, जिससे औपचारिक और अनौपचारिक दोनों तरह के कार्यबल के लिए आजीविका का नया रास्ता खुला है।' रिपोर्ट के अनुसार, सर्वेक्षण में शामिल लगभग 70 प्रतिशत गिग वर्कर्स का मानना है कि इस क्षेत्र में काम करने से उनके भविष्य के रोज़गार के अवसर बेहतर हुए हैं, और इन प्लेटफॉर्म्स के ज़रिए उन्हें ग्राहक प्रबंधन, नेविगेशन और वित्तीय योजना जैसी उपयोगी कौशल सीखने का मौका भी मिला है।

आगे की राह

यह ऐसे समय में आया है जब भारत सरकार गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा ढाँचे पर विचार कर रही है। यदि वृद्धि के ये अनुमान साकार होते हैं, तो गिग इकॉनमी भारत की श्रम नीति की धुरी बन सकती है — हालाँकि वर्कर्स के अधिकार, बीमा कवर और आय स्थिरता जैसे मुद्दे अभी भी नीतिगत बहस के केंद्र में हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इनकी एक सीमा है — ये वृद्धि के अनुमान उसी उद्योग की ओर से आ रहे हैं जो प्लेटफॉर्म इकॉनमी को परामर्श सेवाएँ देता है। असली सवाल यह है कि क्या 'अधिक आय' का यह दावा सामाजिक सुरक्षा, बीमा और नौकरी की स्थिरता की अनुपस्थिति को ध्यान में रखकर किया गया है। होम सर्विसेज वर्कर्स की ₹70,000–80,000 मासिक आय आकर्षक लगती है, पर यह छोटे और असमान नमूने पर आधारित हो सकती है। भारत में गिग वर्कर्स के लिए कोई संहिताबद्ध श्रम सुरक्षा अभी भी लागू नहीं है — और जब तक यह खाई नहीं भरती, 'रोज़गार क्रांति' का दावा अधूरा रहेगा।
RashtraPress
28 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत की गिग इंटरनेट वर्कफोर्स 2030 तक कितनी हो जाएगी?
रेडसीर स्ट्रैटेजी कंसल्टेंट्स की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की गिग इंटरनेट वर्कफोर्स 2030 तक 1.7 करोड़ से 2.1 करोड़ मासिक सक्रिय श्रमिकों तक पहुँच सकती है। अभी यह संख्या करीब 60 लाख है और 24–29% CAGR से बढ़ने का अनुमान है।
गिग वर्कर्स की आय औपचारिक नौकरियों से कितनी अधिक है?
रिपोर्ट के अनुसार, फुल-टाइम गिग वर्कर्स की औसत आय ₹138 प्रति घंटा है, जबकि समान कार्य करने वाले औपचारिक और अनौपचारिक कर्मचारियों की औसत आय ₹54 प्रति घंटा है — यानी गिग वर्कर्स की आय ढाई गुना अधिक है।
2030 तक किस गिग सेक्टर में सबसे ज़्यादा नौकरियाँ होंगी?
रेडसीर रिपोर्ट के अनुसार, राइड-हेलिंग (कैब सेवाएँ) क्षेत्र में सबसे अधिक 1.2 करोड़ से 1.4 करोड़ गिग वर्कर्स होंगे। इसके बाद डिलीवरी सेक्टर में 50–70 लाख और होम सर्विसेज में 20,000–30,000 वर्कर्स का अनुमान है।
क्या गिग प्लेटफॉर्म पहली बार नौकरी करने वालों के लिए फायदेमंद है?
रिपोर्ट के अनुसार, अनुमानित गिग वर्कफोर्स में 30% से अधिक लोग पहली बार रोज़गार बाज़ार में प्रवेश करने वाले हो सकते हैं। सर्वेक्षण में शामिल 54% मौजूदा गिग वर्कर्स ने बताया कि प्लेटफॉर्म से जुड़ने से पहले वे किसी वेतनभोगी नौकरी में नहीं थे।
यह रिपोर्ट किस आधार पर तैयार की गई है?
यह रिपोर्ट रेडसीर स्ट्रैटेजी कंसल्टेंट्स ने 2,250 गिग वर्कर्स पर किए गए सर्वेक्षण के आधार पर तैयार की है। इसमें डिलीवरी, राइड-हेलिंग और होम सर्विसेज क्षेत्रों के वर्कर्स की आय, रोज़गार पृष्ठभूमि और भविष्य की संभावनाओं का विश्लेषण किया गया है।
राष्ट्र प्रेस
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