भारत की सेवा निर्यात और रेमिटेंस से तेल संकट का आर्थिक प्रभाव कम हो सकता है: रिपोर्ट
सारांश
Key Takeaways
- भारत के सेवा निर्यात और रेमिटेंस से कच्चे तेल की कीमतों का असर कम हो सकता है।
- भारत की दैनिक कच्चे तेल की खपत लगभग 5.3 से 5.5 मिलियन बैरल है।
- कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की वृद्धि से भारत के आयात बिल में 12 से 15 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ बढ़ता है।
- भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत तेल आयात करना पड़ता है।
- वैश्विक राजनीतिक स्थिति कच्चे तेल की कीमतों को प्रभावित कर रही है।
नई दिल्ली, 11 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। एक नई रिपोर्ट के अनुसार, भारत के मजबूत सेवा निर्यात और विदेशों से मिल रही रेमिटेंस कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के आर्थिक प्रभाव को काफी हद तक कम कर सकते हैं। इसके बावजूद, भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए अभी भी बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है।
डीएसपी नेत्र की रिपोर्ट में यह बताया गया है कि कच्चा तेल भारत की आर्थिक स्थिरता के लिए एक प्रमुख कारक बना हुआ है। हाल के दिनों में वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में वृद्धि ने भारतीय रुपया को कमजोर कर दिया है, जिससे चिंता बढ़ी है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत प्रतिदिन लगभग 5.3 से 5.5 मिलियन बैरल कच्चे तेल की खपत करता है, जबकि देश का घरेलू उत्पादन केवल 0.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन है। इस प्रकार, भारत को अपनी आवश्यकताओं का लगभग 85 प्रतिशत तेल आयात करना पड़ता है।
भारत के कुल आयात में पेट्रोलियम उत्पादों का हिस्सा लगभग 25 से 30 प्रतिशत है। इसलिए, तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव राष्ट्रीय विदेशी व्यापार संतुलन (एक्सटर्नल बैलेंस) को काफी प्रभावित करता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की वृद्धि से भारत के सालाना आयात बिल में लगभग 12 से 15 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ बढ़ता है।
विश्लेषकों के अनुसार, यदि कच्चे तेल की कीमत 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच जाती है और वित्त वर्ष 2027 तक उच्च बनी रहती है, तो भारत का तेल व्यापार घाटा बढ़कर लगभग 220 अरब डॉलर तक पहुँच सकता है। इससे करंट अकाउंट डेफिसिट (सीएडी) भी जीडीपी के 3.1 प्रतिशत से ऊपर जा सकता है।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि ऐसे हालात में रुपया 10 प्रतिशत से अधिक गिर सकता है, महंगाई बढ़ सकती है, और बाजार में नकदी की कमी जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।
हालांकि, हाल के वर्षों में भारत के विदेशी क्षेत्र की संरचना में एक महत्वपूर्ण बदलाव आया है। मजबूत सेवा निर्यात और विदेशों से मिलने वाली रेमिटेंस अब कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि के प्रभाव को कुछ हद तक संतुलित करने में मदद कर रही हैं।
इस कारण से, रिपोर्ट का मानना है कि भले ही तेल की कीमतों में वृद्धि अभी भी अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा जोखिम है, लेकिन करंट अकाउंट बैलेंस पर इसका प्रभाव पहले की तुलना में कम हो सकता है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि वैश्विक राजनीतिक तनाव और आपूर्ति से संबंधित परिस्थितियों के कारण कच्चे तेल की कीमतें अभी भी काफी अस्थिर बनी हुई हैं। इसलिए, आने वाले महीनों में बाजार इस बात पर ध्यान केंद्रित करेगा कि क्या तेल की कीमतें एक बार फिर रुपया, महंगाई, और पूंजी प्रवाह को प्रभावित करने वाला मुख्य कारक बनती हैं या नहीं।