Q1 FY2026-27: केंद्र सरकार की शुद्ध प्राप्तियां ₹10.49 लाख करोड़, वार्षिक लक्ष्य का 28.7% हासिल
सारांश
मुख्य बातें
केंद्र सरकार ने चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून 2026) में राजकोषीय अनुशासन की राह पर मजबूत कदम बनाए रखे हैं। 5 अगस्त 2026 को जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, जून 2026 तक केंद्र की कुल शुद्ध प्राप्तियां ₹10,49,243 करोड़ रहीं — जो पूरे वित्त वर्ष के बजट अनुमान (बीई) का 28.7 प्रतिशत है और पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 11.5 प्रतिशत अधिक है। यह वृद्धि दर्शाती है कि राजस्व संग्रह की रफ्तार बजट अनुमानों के अनुरूप बनी हुई है।
प्राप्तियों और व्यय का ब्यौरा
पहली तिमाही में सरकार को ₹6,36,576 करोड़ का शुद्ध कर राजस्व प्राप्त हुआ। इसके अतिरिक्त ₹3,77,664 करोड़ गैर-कर राजस्व के रूप में और ₹35,003 करोड़ गैर-ऋण पूंजीगत प्राप्तियों के रूप में मिले। वहीं, कुल सरकारी व्यय ₹13,57,076 करोड़ रहा, जो वित्त वर्ष 2026-27 के बजटीय अनुमान का 25.4 प्रतिशत है।
राज्यों को करों में उनके हिस्से के रूप में ₹2,63,336 करोड़ हस्तांतरित किए गए। हालांकि यह राशि पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में ₹63,605 करोड़ कम रही, जो राज्यों के वित्त पर असर डाल सकती है।
पूंजीगत व्यय में उल्लेखनीय बढ़ोतरी
बुनियादी ढांचे पर सरकार का खर्च इस तिमाही में तेज़ी से बढ़ा है। राजमार्ग, रेलवे और बंदरगाह जैसी प्रमुख परियोजनाओं पर पूंजीगत व्यय (कैपेक्स) 23.7 प्रतिशत की वृद्धि के साथ ₹3,40,258 करोड़ पर पहुंच गया, जबकि वित्त वर्ष 2025-26 की इसी अवधि में यह लगभग ₹2.75 लाख करोड़ था। यह सरकार की 'इन्फ्रास्ट्रक्चर-लेड ग्रोथ' की नीति के अनुरूप है।
राजस्व व्यय के मोर्चे पर ₹3,46,414 करोड़ ब्याज भुगतान पर खर्च हुए, जो कुल व्यय का बड़ा हिस्सा है। इसके अलावा एलपीजी और उर्वरक सब्सिडी जैसी प्रमुख सब्सिडियों पर ₹1,14,812 करोड़ का व्यय किया गया।
राजकोषीय घाटे की स्थिति
आंकड़ों के अनुसार, पहली तिमाही में देश का राजकोषीय घाटा लगभग ₹3.1 लाख करोड़ रहा, जो पूरे वित्त वर्ष के बजट अनुमान का 18.2 प्रतिशत है। गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 में राजकोषीय घाटे का लक्ष्य जीडीपी का 4.4 प्रतिशत हासिल कर लिया था। चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए इसे और घटाकर जीडीपी के 4.3 प्रतिशत पर लाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर ब्याज दरें ऊंची बनी हुई हैं और कई अर्थव्यवस्थाएं राजकोषीय दबाव में हैं — ऐसे में भारत का नियंत्रित घाटा एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
विशेषज्ञों की राय और आगे की राह
विशेषज्ञों के अनुसार, राजकोषीय घाटे में क्रमिक कमी अर्थव्यवस्था की बुनियाद को सुदृढ़ बनाती है और मूल्य स्थिरता के साथ-साथ दीर्घकालिक विकास का मार्ग प्रशस्त करती है। उनका कहना है कि सरकारी उधारी घटने से बैंकिंग प्रणाली में कॉरपोरेट और उपभोक्ताओं के लिए ऋण की उपलब्धता बढ़ती है, जिससे निवेश, मांग और आर्थिक विकास को गति मिलती है। दूसरी तिमाही के आंकड़े यह तय करेंगे कि सरकार वार्षिक राजकोषीय लक्ष्यों की पटरी पर बनी रहती है या नहीं।