पुरानी कारों को ऑटो एलपीजी में बदलने की राष्ट्रीय रेट्रोफिट नीति की माँग, इंडस्ट्री ने गिनाए फायदे
सारांश
मुख्य बातें
भारत के तेज़ी से फैलते सेकेंड-हैंड वाहन बाज़ार को शहरी वायु प्रदूषण घटाने के एक ठोस अवसर के रूप में देखते हुए, उद्योग जगत ने 5 अगस्त 2026 को सरकार से माँग की कि मौजूदा पेट्रोल और डीजल वाहनों को ऑटो एलपीजी में बदलने के लिए एक समयबद्ध राष्ट्रीय रेट्रोफिट नीति तत्काल लागू की जाए। यह माँग ऑटो एलपीजी को बढ़ावा देने वाली प्रमुख संस्था इंडियन ऑटो एलपीजी कोएलिशन (IAC) की ओर से उठाई गई है।
सेकेंड-हैंड बाज़ार की रफ़्तार और रेट्रोफिट की ज़रूरत
आईएसी के अनुसार, भारत में हर वर्ष लगभग 60 लाख सेकेंड-हैंड कारें बिकती हैं — और यह संख्या लगातार बढ़ रही है। उद्योग के अनुमानों के मुताबिक, वर्ष 2023 में हुए लगभग 46 लाख पुराने वाहनों के लेन-देन का आँकड़ा 2030 तक 1 करोड़ से ऊपर पहुँच सकता है। इस अवधि में वार्षिक औसत वृद्धि दर (CAGR) 12–13 प्रतिशत रहने का अनुमान है। उल्लेखनीय है कि भारत में हर नई कार की बिक्री पर एक से अधिक पुरानी गाड़ी का स्वामित्व बदलता है।
प्रदूषण पर असर और पर्यावरणीय लाभ
संगठन का दावा है कि एलपीजी से चलने वाले वाहन पेट्रोल वाहनों की तुलना में कार्बन मोनोऑक्साइड और कुल हाइड्रोकार्बन उत्सर्जन में लगभग 50 प्रतिशत तक की कमी ला सकते हैं। साथ ही नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) का उत्सर्जन भी बीएस-VI मानकों की निर्धारित सीमा से नीचे रहता है। यदि सड़कों पर चल रहे करोड़ों वाहनों में से एक हिस्से को भी ऑटो एलपीजी में बदला जाए, तो दिल्ली-एनसीआर और अन्य प्रदूषण-प्रभावित शहरों में वायु गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार संभव है।
लागत का पक्ष: पेट्रोल से 40–45% सस्ता
प्रति किलोमीटर संचालन लागत के आधार पर ऑटो एलपीजी पेट्रोल से लगभग 40–45 प्रतिशत सस्ता पड़ता है। किसी वाहन को ऑटो एलपीजी में रेट्रोफिट कराने की लागत करीब ₹30,000 है — जो इलेक्ट्रिक वाहन अपनाने में लगने वाले कई लाख रुपये के खर्च की तुलना में बेहद कम है। यह आर्थिक पहलू उन मध्यवर्गीय परिवारों के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है जो पुरानी कारें खरीदते हैं।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
आईएसी के महानिदेशक सुयश गुप्ता ने कहा, 'यदि भारत ऐसे ईंधन का उपयोग करता है जो पेट्रोल की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत सस्ता है और पार्टिकुलेट मैटर, हाइड्रोकार्बन तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड का उत्सर्जन भी काफ़ी कम करता है, तो सड़कों पर चल रहे मौजूदा वाहनों से होने वाले प्रदूषण को तेज़ी से कम किया जा सकता है। इससे लाखों लोगों को बेहतर स्वास्थ्य और स्वच्छ हवा का लाभ मिलेगा, जबकि इलेक्ट्रिक और हाइड्रोजन जैसे दीर्घकालिक विकल्प भी समानांतर रूप से आगे बढ़ते रहेंगे।'
इलेक्ट्रिक और हाइड्रोजन तक का पुल
रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि इलेक्ट्रिक वाहनों और हाइड्रोजन जैसी दीर्घकालिक तकनीकों के व्यापक स्तर पर अपनाए जाने तक, रेट्रोफिटमेंट उत्सर्जन घटाने का सबसे तेज़ और व्यावहारिक समाधान साबित हो सकता है। यह ऐसे समय में आया है जब देश के प्रमुख महानगर वायु प्रदूषण के गंभीर स्तरों से जूझ रहे हैं और नीति-निर्माताओं पर त्वरित कार्रवाई का दबाव बढ़ रहा है।