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पुरानी कारों को ऑटो एलपीजी में बदलने की राष्ट्रीय रेट्रोफिट नीति की माँग, इंडस्ट्री ने गिनाए फायदे

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पुरानी कारों को ऑटो एलपीजी में बदलने की राष्ट्रीय रेट्रोफिट नीति की माँग, इंडस्ट्री ने गिनाए फायदे

सारांश

भारत में हर साल 60 लाख पुरानी कारें बिकती हैं — और इंडस्ट्री का कहना है कि इन्हें ₹30,000 में ऑटो एलपीजी में बदलकर वायु प्रदूषण में 50% तक कमी लाई जा सकती है। IAC ने सरकार से राष्ट्रीय रेट्रोफिट नीति की माँग की है, जिसे इलेक्ट्रिक और हाइड्रोजन तकनीक तक के संक्रमण-काल का व्यावहारिक पुल बताया गया है।

मुख्य बातें

IAC ने 5 अगस्त 2026 को सरकार से पुराने पेट्रोल-डीजल वाहनों को ऑटो एलपीजी में बदलने की राष्ट्रीय रेट्रोफिट नीति की माँग की।
भारत में हर साल लगभग 60 लाख सेकेंड-हैंड कारें बिकती हैं; यह संख्या 2030 तक 1 करोड़ से अधिक होने का अनुमान है।
वाहन को ऑटो एलपीजी में रेट्रोफिट कराने की लागत करीब ₹30,000 — इलेक्ट्रिक वाहन की तुलना में कहीं कम।
ऑटो एलपीजी पेट्रोल से 40–45% सस्ता और कार्बन मोनोऑक्साइड व हाइड्रोकार्बन उत्सर्जन में 50% तक कमी संभव।
दिल्ली-एनसीआर सहित प्रदूषण-प्रभावित शहरों में वायु गुणवत्ता सुधारने का सबसे त्वरित समाधान बताया गया।

भारत के तेज़ी से फैलते सेकेंड-हैंड वाहन बाज़ार को शहरी वायु प्रदूषण घटाने के एक ठोस अवसर के रूप में देखते हुए, उद्योग जगत ने 5 अगस्त 2026 को सरकार से माँग की कि मौजूदा पेट्रोल और डीजल वाहनों को ऑटो एलपीजी में बदलने के लिए एक समयबद्ध राष्ट्रीय रेट्रोफिट नीति तत्काल लागू की जाए। यह माँग ऑटो एलपीजी को बढ़ावा देने वाली प्रमुख संस्था इंडियन ऑटो एलपीजी कोएलिशन (IAC) की ओर से उठाई गई है।

सेकेंड-हैंड बाज़ार की रफ़्तार और रेट्रोफिट की ज़रूरत

आईएसी के अनुसार, भारत में हर वर्ष लगभग 60 लाख सेकेंड-हैंड कारें बिकती हैं — और यह संख्या लगातार बढ़ रही है। उद्योग के अनुमानों के मुताबिक, वर्ष 2023 में हुए लगभग 46 लाख पुराने वाहनों के लेन-देन का आँकड़ा 2030 तक 1 करोड़ से ऊपर पहुँच सकता है। इस अवधि में वार्षिक औसत वृद्धि दर (CAGR) 12–13 प्रतिशत रहने का अनुमान है। उल्लेखनीय है कि भारत में हर नई कार की बिक्री पर एक से अधिक पुरानी गाड़ी का स्वामित्व बदलता है।

प्रदूषण पर असर और पर्यावरणीय लाभ

संगठन का दावा है कि एलपीजी से चलने वाले वाहन पेट्रोल वाहनों की तुलना में कार्बन मोनोऑक्साइड और कुल हाइड्रोकार्बन उत्सर्जन में लगभग 50 प्रतिशत तक की कमी ला सकते हैं। साथ ही नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) का उत्सर्जन भी बीएस-VI मानकों की निर्धारित सीमा से नीचे रहता है। यदि सड़कों पर चल रहे करोड़ों वाहनों में से एक हिस्से को भी ऑटो एलपीजी में बदला जाए, तो दिल्ली-एनसीआर और अन्य प्रदूषण-प्रभावित शहरों में वायु गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार संभव है।

लागत का पक्ष: पेट्रोल से 40–45% सस्ता

प्रति किलोमीटर संचालन लागत के आधार पर ऑटो एलपीजी पेट्रोल से लगभग 40–45 प्रतिशत सस्ता पड़ता है। किसी वाहन को ऑटो एलपीजी में रेट्रोफिट कराने की लागत करीब ₹30,000 है — जो इलेक्ट्रिक वाहन अपनाने में लगने वाले कई लाख रुपये के खर्च की तुलना में बेहद कम है। यह आर्थिक पहलू उन मध्यवर्गीय परिवारों के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है जो पुरानी कारें खरीदते हैं।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं

आईएसी के महानिदेशक सुयश गुप्ता ने कहा, 'यदि भारत ऐसे ईंधन का उपयोग करता है जो पेट्रोल की तुलना में लगभग 40 प्रतिशत सस्ता है और पार्टिकुलेट मैटर, हाइड्रोकार्बन तथा नाइट्रोजन ऑक्साइड का उत्सर्जन भी काफ़ी कम करता है, तो सड़कों पर चल रहे मौजूदा वाहनों से होने वाले प्रदूषण को तेज़ी से कम किया जा सकता है। इससे लाखों लोगों को बेहतर स्वास्थ्य और स्वच्छ हवा का लाभ मिलेगा, जबकि इलेक्ट्रिक और हाइड्रोजन जैसे दीर्घकालिक विकल्प भी समानांतर रूप से आगे बढ़ते रहेंगे।'

इलेक्ट्रिक और हाइड्रोजन तक का पुल

रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि इलेक्ट्रिक वाहनों और हाइड्रोजन जैसी दीर्घकालिक तकनीकों के व्यापक स्तर पर अपनाए जाने तक, रेट्रोफिटमेंट उत्सर्जन घटाने का सबसे तेज़ और व्यावहारिक समाधान साबित हो सकता है। यह ऐसे समय में आया है जब देश के प्रमुख महानगर वायु प्रदूषण के गंभीर स्तरों से जूझ रहे हैं और नीति-निर्माताओं पर त्वरित कार्रवाई का दबाव बढ़ रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसकी सफलता नीति के क्रियान्वयन की गति पर निर्भर करेगी। भारत में एलपीजी इन्फ्रास्ट्रक्चर का विस्तार अभी भी असमान है और ग्रामीण व अर्ध-शहरी क्षेत्रों में ऑटो एलपीजी स्टेशनों की कमी एक बड़ी बाधा है। इंडस्ट्री की माँग वाजिब है, परंतु बिना सब्सिडी ढाँचे, सुरक्षा मानकों के कड़े प्रवर्तन और अधिकृत रेट्रोफिट केंद्रों के नेटवर्क के, यह नीति कागज़ पर ही रह सकती है। सवाल यह है कि क्या सरकार इसे इलेक्ट्रिक वाहन नीति के समानांतर प्राथमिकता देने को तैयार है।
RashtraPress
6 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ऑटो एलपीजी रेट्रोफिट नीति क्या है और इसकी माँग क्यों हो रही है?
ऑटो एलपीजी रेट्रोफिट नीति के तहत मौजूदा पेट्रोल और डीजल वाहनों को ऑटो एलपीजी ईंधन पर चलाने के लिए तकनीकी रूप से बदला जाता है। IAC ने यह माँग इसलिए उठाई है क्योंकि भारत में सेकेंड-हैंड कार बाज़ार तेज़ी से बढ़ रहा है और यह प्रदूषण घटाने का एक त्वरित व किफ़ायती अवसर है।
पुरानी कार को ऑटो एलपीजी में बदलने में कितना खर्च आता है?
किसी वाहन को ऑटो एलपीजी में रेट्रोफिट कराने की लागत लगभग ₹30,000 है। यह इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने में लगने वाले कई लाख रुपये की तुलना में काफ़ी कम है, जिससे यह मध्यवर्गीय उपभोक्ताओं के लिए एक व्यावहारिक विकल्प बनता है।
ऑटो एलपीजी से प्रदूषण में कितनी कमी आती है?
IAC के अनुसार, एलपीजी से चलने वाले वाहन पेट्रोल वाहनों की तुलना में कार्बन मोनोऑक्साइड और कुल हाइड्रोकार्बन उत्सर्जन में लगभग 50 प्रतिशत तक कमी ला सकते हैं। नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) का उत्सर्जन भी बीएस-VI मानकों की सीमा से नीचे रहता है।
2030 तक भारत में सेकेंड-हैंड वाहन बाज़ार कितना बड़ा होगा?
उद्योग के अनुमानों के अनुसार, 2023 में लगभग 46 लाख सेकेंड-हैंड वाहनों के लेन-देन का आँकड़ा 2030 तक 1 करोड़ से अधिक पहुँच सकता है। इस अवधि में वार्षिक औसत वृद्धि दर (CAGR) 12–13 प्रतिशत रहने का अनुमान है।
क्या ऑटो एलपीजी इलेक्ट्रिक वाहनों का विकल्प है?
नहीं, IAC के अनुसार ऑटो एलपीजी इलेक्ट्रिक या हाइड्रोजन वाहनों का स्थायी विकल्प नहीं, बल्कि एक संक्रमणकालीन समाधान है। जब तक ये दीर्घकालिक तकनीकें व्यापक पैमाने पर उपलब्ध नहीं हो जातीं, तब तक रेट्रोफिटमेंट उत्सर्जन घटाने का सबसे तेज़ और व्यावहारिक रास्ता हो सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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