नेपाल की नई सरकार का बड़ा फैसला: चीन के साथ इन्फ्रास्ट्रक्चर समझौतों की होगी गहन जांच
सारांश
Key Takeaways
- नेपाल की नई सरकार ने चीन के साथ ओली काल में हुए सभी बुनियादी ढांचा समझौतों की गहन जांच के आदेश दिए हैं।
- समीक्षा पूरी होने तक बीजिंग के साथ कोई नया समझौता नहीं किया जाएगा — यह नई सरकार की आधिकारिक नीति है।
- बूढ़ी गंडकी जलविद्युत परियोजना २०२२ से ठप है; केरंग-काठमांडू रेलवे २०२६ तक भी अटकी है।
- बीआरआई के तहत २०१६-२०२० के बीच शुरू की गई अधिकांश परियोजनाएं या तो अधूरी हैं या बंद हो गई हैं।
- आईसीआरआर की रिपोर्ट के अनुसार चीन ने नेपाल में तिब्बत और ताइवान मुद्दों पर राजनयिक दबाव डाला।
- हुआवेई और जेडटीई से जुड़े डिजिटल विस्तार कार्यक्रमों पर भी साइबर सुरक्षा को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
काठमांडू, 26 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। नेपाल की नई सरकार ने चीन के साथ पूर्व प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली के कार्यकाल में हस्ताक्षरित बुनियादी ढांचा समझौतों की व्यापक जांच शुरू कर दी है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि जब तक इन परियोजनाओं की पूरी समीक्षा नहीं हो जाती, बीजिंग के साथ किसी भी नए करार पर विचार नहीं किया जाएगा। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब नेपाल में सत्ता परिवर्तन के बाद चीन की भूमिका और उसके इरादों पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
चीन का आर्थिक जाल और राजनीतिक हस्तक्षेप
दिल्ली स्थित थिंक टैंक इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट रिसर्च एंड रिजोल्यूशन (आईसीआरआर) द्वारा प्रकाशित एक विश्लेषण में कहा गया है कि हाल के वर्षों में नेपाल में चीन की भूमिका महज आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रही। यह रणनीतिक और राजनीतिक हस्तक्षेप के रूप में सामने आई है, जिसमें तिब्बत और ताइवान से जुड़े मुद्दों पर राजनयिक दबाव और नेपाल की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करने के प्रयास शामिल हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन ने नेपाल के साथ आर्थिक रिश्तों को हमेशा एक रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया — पहले निवेश का लालच दिखाया, फिर उसी के ज़रिए राजनीतिक दबाव बनाया। यह वही पैटर्न है जो श्रीलंका, पाकिस्तान और म्यांमार जैसे देशों में भी देखा गया है।
ओली काल की परियोजनाएं: वादे बड़े, नतीजे शून्य
२०१६ और २०१८ के बीच बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के तहत नेपाल और चीन के बीच कई महत्वाकांक्षी समझौते हुए। ओली सरकार ने इन्हें नेपाल को एक क्षेत्रीय कनेक्टिविटी केंद्र में बदलने का ऐतिहासिक मौका बताया था। लेकिन इन परियोजनाओं के पीछे न तो व्यावहारिक योजना थी और न ही वित्तीय पारदर्शिता।
अब जब नई सरकार इन फाइलों को खंगाल रही है, तो सामने आ रहा है कि अधिकांश परियोजनाएं या तो अटकी हैं, या बेहद धीमी गति से चल रही हैं, या फिर पूरी तरह ठप पड़ गई हैं।
अटकी परियोजनाओं की पूरी सूची
बूढ़ी गंडकी जलविद्युत परियोजना इस पूरे विवाद का केंद्र है। मई २०१७ में इसका ठेका चीन की गेझोउबा समूह कंपनी को दिया गया था। नवंबर २०१७ में इसे रद्द किया गया, २०१८ में फिर बहाल किया गया, लेकिन २०२२ से यह परियोजना प्रभावी रूप से ठप है।
२०१६-२०१७ में घोषित केरंग-काठमांडू रेलवे परियोजना आज भी तकनीकी चुनौतियों और वित्तीय अनिश्चितता के बीच फंसी है। २०२६ तक भी इसमें कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है।
ट्रांस-हिमालयी बहुआयामी कनेक्टिविटी नेटवर्क, जो २०१७-२०१८ में बीआरआई के तहत शुरू हुआ था, अभी भी केवल कागजों और बैठकों तक सीमित है। २०१८-२०२० के बीच चर्चित सीमा पार ट्रांसमिशन लाइन परियोजनाएं भी अब तक जमीन पर नहीं उतरी हैं।
रसुवागढ़ी-केरंग सीमा पर बुनियादी ढांचे का विकास, जो २०१७-२०२० के बीच शुरू हुआ, आधा-अधूरा और बेहद धीमी गति से चल रहा है। उत्तरी राजमार्ग कनेक्टिविटी परियोजनाएं भी २०१६-२०१८ के बाद से अधूरी पड़ी हैं।
इसके अलावा, २०१७ से हुआवेई और जेडटीई से जुड़े डिजिटल विस्तार के प्रयास भी असमान रूप से आगे बढ़े हैं, जिससे साइबर सुरक्षा और रणनीतिक निगरानी को लेकर गंभीर चिंताएं उठ रही हैं।
नई सरकार की रणनीति और आगे की राह
नेपाल की नई सरकार ने इन सभी परियोजनाओं की पारदर्शी समीक्षा का आदेश देकर एक स्पष्ट संकेत दिया है — अब काठमांडू अंधाधुंध समझौतों की बजाय राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देगा। यह भारत के लिए भी एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है, क्योंकि नेपाल में चीन के बढ़ते प्रभाव को दिल्ली हमेशा सतर्कता से देखती रही है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह जांच नेपाल-चीन संबंधों में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकती है। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नई सरकार इन समझौतों की समीक्षा के बाद किन परियोजनाओं को जारी रखती है, किन्हें रद्द करती है और क्या वह भारत तथा अन्य लोकतांत्रिक देशों के साथ नए साझेदारी समझौतों की दिशा में कदम बढ़ाती है।