मोदी का यूएई दौरा: 3 करोड़ बैरल तेल समझौता, भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मिला ठोस आधार
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) यात्रा रणनीतिक दृष्टि से निर्णायक साबित हुई, जहाँ ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर कई अहम समझौतों पर हस्ताक्षर हुए — ठीक उस समय जब पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव चरम पर है और वैश्विक तेल बाज़ार में अस्थिरता बनी हुई है। यह यात्रा मोदी के पाँच देशों के दौरे का पहला पड़ाव थी, जिसके बाद वे नीदरलैंड, स्वीडन, नॉर्वे और इटली रवाना हुए।
मुख्य समझौते और उनका महत्व
सरकारी जानकारी के अनुसार, इंडियन स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिज़र्व लिमिटेड और अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (ADNOC) के बीच एक रणनीतिक करार हुआ, जिसके तहत यूएई भारत के सामरिक तेल भंडार के लिए 3 करोड़ बैरल कच्चा तेल उपलब्ध कराएगा। इसके अतिरिक्त, इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC) और ADNOC के बीच एलपीजी की दीर्घकालिक आपूर्ति के लिए भी समझौता हुआ।
दोनों देशों ने भारत में गैस के सामरिक भंडार स्थापित करने की संभावना पर भी सहमति जताई है, जो भविष्य में किसी भी आपूर्ति संकट के विरुद्ध एक अतिरिक्त सुरक्षा कवच का काम करेगा।
यूएई का ओपेक से बाहर निकलना — भारत के लिए अवसर
इस दौरे का समय इसलिए भी विशेष माना जा रहा है क्योंकि हाल ही में यूएई ने पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (OPEC) से बाहर निकलने का निर्णय लिया है। इससे यूएई अब अपनी निर्धारित उत्पादन सीमा से परे जाकर अधिक तेल उत्पादन करने में सक्षम होगा। विशेषज्ञों के अनुसार, यह स्थिति भारत के लिए अनुकूल है क्योंकि भारत अपनी कुल कच्चे तेल की ज़रूरतों का लगभग दसवाँ हिस्सा यूएई से आयात करता है और वह यूएई का सबसे बड़ा एलएनजी ग्राहक भी है।
निवेश और द्विपक्षीय व्यापार
ऊर्जा समझौतों के अलावा, यूएई ने भारत में 5 अरब डॉलर के नए निवेश की प्रतिबद्धता जताई है। वर्तमान में दोनों देशों के बीच सालाना लगभग 85 अरब डॉलर का व्यापार होता है, जो इस साझेदारी की गहराई को रेखांकित करता है।
खाड़ी में बढ़ती अस्थिरता की पृष्ठभूमि
यह समझौते ऐसे नाज़ुक समय में हुए हैं जब क्षेत्रीय सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। रविवार को यूएई और सऊदी अरब में ड्रोन हमलों की खबरों ने खाड़ी क्षेत्र की ऊर्जा अवसंरचना की संवेदनशीलता को एक बार फिर उजागर किया। यह ऐसे समय में आया है जब पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक दबाव लगातार बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों की राय
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत-यूएई ऊर्जा साझेदारी भारत को वैश्विक बाज़ार में संभावित आपूर्ति व्यवधानों और मूल्य उतार-चढ़ाव से बचाने की दिशा में एक व्यावहारिक और दूरदर्शी कदम है। यह दौरा भारत की उस दीर्घकालिक रणनीति का अंग है जिसके तहत वह अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए विविध और भरोसेमंद स्रोत सुनिश्चित करना चाहता है। आने वाले महीनों में इन समझौतों के क्रियान्वयन की रफ़्तार यह तय करेगी कि यह कूटनीतिक सफलता ज़मीन पर कितनी कारगर साबित होती है।