RBI ने 44 महीने बाद रेपो रेट 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाया, उद्योग जगत ने बताया अपेक्षित कदम
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने 7 अक्टूबर 2026 को 44 महीने के अंतराल के बाद नीतिगत रेपो दर में 25 आधार अंक (बेसिस पॉइंट) की बढ़ोतरी कर दी, जिससे रेपो दर बढ़कर 5.5 प्रतिशत हो गई है। उद्योग संगठन पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (PHDCCI) ने इस फैसले को वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप बताते हुए कहा कि भविष्य में होने वाली किसी भी मौद्रिक सख्ती का आधार आर्थिक आँकड़े होने चाहिए।
दर वृद्धि का विवरण
MPC ने वैश्विक अनिश्चितताओं, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वित्तीय बाज़ारों में अस्थिरता के मद्देनज़र यह निर्णय लिया। स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी (SDF) दर 5.25 प्रतिशत पर बनी हुई है, जबकि मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी (MSF) और बैंक रेट अब 5.75 प्रतिशत पर हैं। साथ ही RBI ने मौद्रिक नीति का रुख 'न्यूट्रल' से बदलकर 'चरणबद्ध सख्ती' कर दिया है।
गौरतलब है कि यह फैसला ऐसे समय आया है जब वैश्विक आर्थिक वृद्धि मज़बूत होने के बावजूद उसमें गिरावट का रुझान बना हुआ है, और दुनिया भर के प्रमुख केंद्रीय बैंक भी दरें बढ़ाने की राह पर हैं।
उद्योग जगत की प्रतिक्रिया
PHDCCI के अध्यक्ष राजीव जुनेजा ने कहा, '44 महीने बाद नीतिगत दर में बढ़ोतरी वैश्विक परिस्थितियों और दुनिया भर के प्रमुख केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने के फैसलों को देखते हुए उद्योग की उम्मीदों के अनुरूप है।'
PHDCCI के सीईओ एवं महासचिव डॉ. रणजीत मेहता ने कहा कि वैश्विक ऊर्जा कीमतों, भू-राजनीतिक घटनाक्रमों और घरेलू खाद्य कीमतों पर दबाव के बीच मौद्रिक नीति के रुख को चरणबद्ध सख्ती की ओर ले जाने से महंगाई के रुझान को लेकर अनिश्चितता बढ़ रही है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
डॉ. मेहता ने स्पष्ट किया कि अब प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना होनी चाहिए कि 'मौद्रिक सख्ती आर्थिक आँकड़ों पर आधारित रहे और साथ ही उत्पादक क्षेत्रों के लिए पर्याप्त ऋण प्रवाह बना रहे।' उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि महंगाई पर काबू पाने के लिए मौद्रिक नीति के साथ-साथ आपूर्ति क्षमता, लॉजिस्टिक्स, खाद्य प्रबंधन और ऊर्जा सुरक्षा में तेज़ सुधार भी अनिवार्य होगा।
यह ऐसे समय में आया है जब उद्योग जगत पहले से ही उत्पादन लागत में बढ़ोतरी का सामना कर रहा है, और ऋण की ऊँची लागत निवेश चक्र को धीमा करने का जोखिम रखती है।
आर्थिक परिदृश्य
PHDCCI के बयान के अनुसार, देश की आर्थिक वृद्धि अभी भी मज़बूत बनी हुई है। इसे निजी खपत, मज़बूत निवेश गतिविधियों, लचीले निर्यात, अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC) की सुदृढ़ प्रणालीगत स्थिति तथा औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) एवं PMI जैसे उच्च-आवृत्ति संकेतकों से समर्थन मिल रहा है।
आने वाले महीनों में MPC के अगले फैसले मुद्रास्फीति के आँकड़ों और वैश्विक बाज़ारों की दिशा पर निर्भर करेंगे — जो यह तय करेंगे कि 'चरणबद्ध सख्ती' का यह सफर कितना लंबा और कितना तीव्र होगा।