रुपया ₹100/डॉलर पहुँचे तो न घबराएँ, वैश्विक अस्थिरता घटते ही होगी रिकवरी: अरविंद पनगढ़िया
सारांश
मुख्य बातें
अर्थशास्त्री और नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने 25 मई 2026 को स्पष्ट किया कि यदि डॉलर के मुकाबले रुपया ₹100 के स्तर तक पहुँचता है, तो इससे घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है — जैसे ही वैश्विक अस्थिरता का दौर थमेगा, रुपए में स्वाभाविक रूप से तेजी लौट आएगी। उन्होंने भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) से आग्रह किया कि वह मुद्रा बाजार में अत्यधिक हस्तक्षेप से बचे और विनिमय दर को बाजार के अनुसार समायोजित होने दे।
विनिमय दर पर पनगढ़िया का रुख
पनगढ़िया ने एक टीवी साक्षात्कार में कहा कि वैश्विक अनिश्चितता और भू-राजनीतिक तनाव के दौर में बाहरी झटकों को अवशोषित करने का काम विनिमय दर को करने देना चाहिए। उनके अनुसार, यदि RBI रुपए की गिरावट रोकने के लिए आक्रामक रूप से हस्तक्षेप करता है, तो देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर अनावश्यक दबाव बढ़ सकता है।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि चाहे मौजूदा वैश्विक संकट अस्थायी हो या दीर्घकालिक, मुद्रा का क्रमिक अवमूल्यन अर्थव्यवस्था को अधिक कुशलता से समायोजित करने में सहायक होता है।
ईंधन कीमतों पर सरकारी नीति
पनगढ़िया ने कच्चे तेल की बढ़ती वैश्विक कीमतों के संदर्भ में कहा कि इसका असर घरेलू ईंधन कीमतों पर धीरे-धीरे परिलक्षित होना चाहिए — कृत्रिम रूप से कीमतें दबाए रखना दीर्घकाल में नुकसानदेह होगा। उन्होंने सीधे शब्दों में कहा, 'सरकार किसी भी उत्पाद की निश्चित कीमत की गारंटी देने के लिए नहीं है।'
एनआरआई जमा योजनाओं पर आपत्ति
उच्च ब्याज दर वाली एनआरआई जमा योजनाओं के ज़रिए विदेशी मुद्रा प्रवाह आकर्षित करने के प्रस्तावों पर पनगढ़िया ने आपत्ति जताई। उनका मानना है कि ऐसे उपाय अल्पकाल में राहत दे सकते हैं, लेकिन अर्थव्यवस्था पर दीर्घकालिक वित्तीय बोझ बढ़ाते हैं।
मोदी की अपील पर समर्थन, अनिवार्य प्रतिबंध पर आगाह
पनगढ़िया ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उस अपील का समर्थन किया जिसमें नागरिकों से विवेकाधीन विदेशी मुद्रा खर्च कम करने का आग्रह किया गया था। हालाँकि, उन्होंने अनिवार्य प्रतिबंध लगाने के खिलाफ चेतावनी दी और कहा कि ऐसे कदम उल्टे पड़ सकते हैं।
गौरतलब है कि पनगढ़िया ने इससे पहले सोशल मीडिया पर भी यही रुख व्यक्त किया था कि नीति निर्माताओं को ₹100 प्रति डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर को मौद्रिक रणनीति का आधार नहीं बनने देना चाहिए। अस्थिर वैश्विक परिस्थितियों में बाजार-संचालित मुद्रा समायोजन अधिक टिकाऊ होते हैं — यह उनका केंद्रीय तर्क है।
यह बयान ऐसे समय में आया है जब रुपए पर दबाव और वैश्विक व्यापार अनिश्चितता को लेकर नीतिगत बहस तेज हो रही है। आने वाले हफ्तों में RBI की मौद्रिक नीति समिति की बैठक और वैश्विक बाजारों की दिशा इस चर्चा को और आकार देगी।