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सेमीकॉन 2.0 और एमपीएमएस से 3.6 लाख से अधिक रोज़गार का लक्ष्य, भारत बनेगा वैश्विक सेमीकंडक्टर हब

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सेमीकॉन 2.0 और एमपीएमएस से 3.6 लाख से अधिक रोज़गार का लक्ष्य, भारत बनेगा वैश्विक सेमीकंडक्टर हब

सारांश

सेमीकॉन 2.0 और एमपीएमएस — कुल मिलाकर ₹1.89 लाख करोड़ से अधिक की सरकारी प्रतिबद्धता — भारत को असेंबली की भूमिका से निकालकर पूर्ण सेमीकंडक्टर वैल्यू चेन में स्थापित करने का दाँव है। उद्योग जगत के अनुसार, 3.6 लाख से अधिक रोज़गार और ₹39 लाख करोड़ का उत्पादन लक्ष्य इसे भारत की अब तक की सबसे बड़ी इलेक्ट्रॉनिक्स नीतिगत पहल बनाता है।

मुख्य बातें

केंद्र सरकार ने सेमीकॉन 2.0 के लिए ₹1.27 लाख करोड़ और एमपीएमएस के लिए ₹62,500 करोड़ मंजूर किए हैं।
दोनों योजनाओं से मिलकर 3.6 लाख से अधिक नए रोज़गार सृजित होने का अनुमान है — जिसमें 2-3 लाख उच्च-कौशल और 60,000 प्रत्यक्ष नौकरियाँ शामिल हैं।
सेमीकॉन 2.0 के तहत 40 से 50 अरब डॉलर का नया निवेश आकर्षित होने की संभावना; सेमीकॉन 1.0 में पहले ही 20 अरब डॉलर से अधिक के प्रोजेक्ट घोषित।
एमपीएमएस से मोबाइल उत्पादन मूल्य ₹39 लाख करोड़ और निर्यात ₹15 लाख करोड़ तक पहुँचने का अनुमान।
वैश्विक सेमीकंडक्टर उपकरण खर्च 2028 तक 230 अरब डॉलर पहुँचने का अनुमान; उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार भारत इस अवसर के लिए तैयार।

केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में स्वीकृत सेमीकॉन 2.0 और मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (एमपीएमएस) को लेकर उद्योग जगत ने उत्साहजनक प्रतिक्रिया दी है। उद्योग संगठनों के अनुसार, ये दोनों योजनाएँ भारत को महज़ मोबाइल असेंबली केंद्र की भूमिका से ऊपर उठाकर संपूर्ण सेमीकंडक्टर वैल्यू चेन में स्थापित करेंगी और मिलकर 3.6 लाख से अधिक नए रोज़गार सृजित कर सकती हैं। नई दिल्ली से मिली जानकारी के अनुसार, यह घोषणा 16 जुलाई 2026 को सामने आई।

योजनाओं का आर्थिक खाका

उद्योग निकायों के अनुमान के मुताबिक, सेमीकॉन 2.0 के तहत 40 से 50 अरब डॉलर तक का नया निवेश आकर्षित होने की संभावना है, जिससे 2 से 3 लाख उच्च-कौशल रोज़गार पैदा हो सकते हैं। सरकार ने इस योजना के लिए ₹1.27 लाख करोड़ की मंजूरी दी है।

वहीं, एमपीएमएस के लिए ₹62,500 करोड़ आवंटित किए गए हैं। इस योजना से 60,000 अतिरिक्त प्रत्यक्ष नौकरियाँ बनने का अनुमान है। आँकड़ों के अनुसार, एमपीएमएस के ज़रिये मोबाइल उत्पादन का कुल मूल्य बढ़कर लगभग ₹39 लाख करोड़ और निर्यात बढ़कर करीब ₹15 लाख करोड़ तक पहुँच सकता है।

सेमीकॉन 2.0 में क्या नया है

इंडिया इलेक्ट्रॉनिक्स एंड सेमीकंडक्टर एसोसिएशन (आईईएसए) ने बताया कि सेमीकॉन 1.0 के अंतर्गत पहले ही 20 अरब डॉलर से अधिक के सेमीकंडक्टर प्रोजेक्ट घोषित हो चुके हैं। नए चरण में सेमीकंडक्टर फैब, एडवांस पैकेजिंग, चिप डिजाइन, अनुसंधान एवं विकास (आरएंडडी), स्किल डेवलपमेंट, मशीनरी और कच्चे माल पर विशेष बल दिया गया है।

आईईएसए और एसईएमआई इंडिया के अध्यक्ष अशोक चंदक ने कहा कि सेमीकॉन 2.0 भारत के लिए नीति निर्माण से बड़े पैमाने पर क्रियान्वयन की दिशा में निर्णायक कदम है। उनके अनुसार, 'पहले चरण ने भारत की विश्वसनीयता स्थापित की, जबकि दूसरा चरण देश की दीर्घकालिक क्षमता निर्माण पर केंद्रित है।' चंदक ने यह भी रेखांकित किया कि वैश्विक स्तर पर सेमीकंडक्टर निर्माण उपकरणों पर खर्च 2028 तक लगभग 230 अरब डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है और भारत इस अवसर का लाभ उठाने की मजबूत स्थिति में है।

उद्योग जगत की प्रतिक्रिया

इंडिया सेल्युलर एंड इलेक्ट्रॉनिक्स एसोसिएशन (आईसीईए) के चेयरमैन पंकज मोहिंद्रू ने कहा कि सरकार की यह नीतिगत निरंतरता भारत को सेमीकंडक्टर उद्योग में वैश्विक स्किल कैपिटल बनाने में सहायक होगी। उनके मुताबिक, डिजाइन, अनुसंधान, पूंजीगत उपकरण और कौशल विकास पर ज़ोर देकर यह योजना देश में मज़बूत सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम तैयार करेगी।

ऑप्टीमस इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (ओईएल) के चेयरमैन अशोक गुप्ता ने एमपीएमएस को 'ऐतिहासिक कदम' बताते हुए कहा कि यह योजना प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) स्कीम की सफलता को आगे बढ़ाएगी। गुप्ता के अनुसार, यह नीति दीर्घकालिक निवेशक विश्वास, स्वदेशी प्रौद्योगिकी विकास और भारत को उन्नत मोबाइल फोन निर्माण के वैश्विक पसंदीदा केंद्र के रूप में स्थापित करने में मदद करेगी।

आम जनता और अर्थव्यवस्था पर असर

यह ऐसे समय में आया है जब भारत वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स सप्लाई चेन में चीन के विकल्प के रूप में उभरने की कोशिश कर रहा है। उद्योग संगठनों का मानना है कि इन योजनाओं से घरेलू वैल्यू एडिशन में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी। गौरतलब है कि भारत अब तक मुख्यतः असेंबली-स्तर के मोबाइल निर्माण तक सीमित रहा है; नई योजनाएँ इस ढाँचे को बदलने का लक्ष्य रखती हैं।

आने वाले महीनों में क्रियान्वयन की गति और निवेशकों की वास्तविक प्रतिबद्धता यह तय करेगी कि भारत सेमीकंडक्टर क्षेत्र में वैश्विक हब बनने के अपने लक्ष्य को कितनी तेज़ी से हासिल कर पाता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली कसौटी क्रियान्वयन की है — न कि घोषणा की। सेमीकॉन 1.0 के तहत 20 अरब डॉलर के प्रोजेक्ट घोषित हुए, परंतु फैब-स्तर उत्पादन अभी भी सीमित है। रोज़गार के आँकड़े उद्योग संगठनों के अनुमान हैं, सरकारी सत्यापित डेटा नहीं — यह अंतर महत्वपूर्ण है। चीन-प्लस-वन रणनीति के तहत वैश्विक निवेशकों की रुचि वास्तविक है, लेकिन भारत को भूमि अधिग्रहण, बिजली आपूर्ति और कुशल जनशक्ति की कमी जैसी संरचनात्मक बाधाओं से पार पाना होगा। बिना पारदर्शी मापन ढाँचे और समयबद्ध मील के पत्थरों के, ये आँकड़े महत्वाकांक्षी लक्ष्यों की लंबी सूची में जुड़ सकते हैं।
RashtraPress
16 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सेमीकॉन 2.0 क्या है और इसके लिए कितना बजट मंजूर किया गया है?
सेमीकॉन 2.0 केंद्र सरकार की नई सेमीकंडक्टर प्रोत्साहन योजना है, जिसके लिए ₹1.27 लाख करोड़ मंजूर किए गए हैं। यह योजना सेमीकंडक्टर फैब, एडवांस पैकेजिंग, चिप डिजाइन, आरएंडडी और स्किल डेवलपमेंट पर केंद्रित है और 40 से 50 अरब डॉलर का नया निवेश आकर्षित करने का लक्ष्य रखती है।
मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (एमपीएमएस) से क्या फ़ायदा होगा?
एमपीएमएस के लिए सरकार ने ₹62,500 करोड़ मंजूर किए हैं। इससे 60,000 अतिरिक्त प्रत्यक्ष नौकरियाँ बनने, मोबाइल उत्पादन मूल्य ₹39 लाख करोड़ और निर्यात ₹15 लाख करोड़ तक पहुँचने का अनुमान है।
सेमीकॉन 2.0 और एमपीएमएस मिलकर कितने रोज़गार पैदा करेंगे?
उद्योग संगठनों के अनुमान के अनुसार, दोनों योजनाओं से मिलकर 3.6 लाख से अधिक नए रोज़गार सृजित हो सकते हैं — जिसमें सेमीकॉन 2.0 से 2 से 3 लाख उच्च-कौशल और एमपीएमएस से 60,000 प्रत्यक्ष नौकरियाँ शामिल हैं। ये आँकड़े उद्योग निकायों के अनुमान हैं।
सेमीकॉन 1.0 की तुलना में सेमीकॉन 2.0 में क्या नया है?
सेमीकॉन 1.0 के तहत 20 अरब डॉलर से अधिक के प्रोजेक्ट घोषित हो चुके हैं और भारत की विश्वसनीयता स्थापित हुई। सेमीकॉन 2.0 में एडवांस पैकेजिंग, चिप डिजाइन, मशीनरी, कच्चे माल और कौशल विकास पर अधिक ज़ोर दिया गया है, जिससे भारत संपूर्ण वैल्यू चेन में भागीदार बन सके।
इन योजनाओं से भारत की वैश्विक सेमीकंडक्टर बाज़ार में क्या स्थिति बनेगी?
आईईएसए और एसईएमआई इंडिया के अध्यक्ष अशोक चंदक के अनुसार, वैश्विक सेमीकंडक्टर उपकरण खर्च 2028 तक लगभग 230 अरब डॉलर पहुँचने का अनुमान है और भारत इस अवसर का लाभ उठाने की मज़बूत स्थिति में है। उद्योग संगठनों का मानना है कि ये योजनाएँ भारत को वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स सप्लाई चेन में एक भरोसेमंद साझेदार के रूप में स्थापित करेंगी।
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