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रुपया 94.40 पर स्थिर, कोरियाई-ताइवानी बाजारों की उठापटक से भारत में FPI वापसी के संकेत

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रुपया 94.40 पर स्थिर, कोरियाई-ताइवानी बाजारों की उठापटक से भारत में FPI वापसी के संकेत

सारांश

रुपया 96.96 के निचले स्तर से उबरकर 94.40 पर आया, कच्चा तेल 73 डॉलर से नीचे — और दक्षिण कोरिया व ताइवान की बाजार अस्थिरता ने FPI को भारत की ओर मोड़ना शुरू किया है। लगातार बिकवाली का दौर थमता दिख रहा है, लेकिन स्थायी खरीदारी में अभी वक्त लग सकता है।

मुख्य बातें

15 जून से 25 जून के बीच नौ ट्रेडिंग सत्रों में FII ने पाँच दिन कैश मार्केट में खरीदारी की।
रुपया 15 मई के 96.96 के निचले स्तर से मजबूत होकर अब 94.40 के करीब है।
कच्चे तेल की कीमत 73 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आने से भारत के भुगतान संतुलन पर दबाव कम हुआ।
दक्षिण कोरिया का बाजार एक दिन में 8 प्रतिशत गिरा, जिससे ट्रेडिंग रोकनी पड़ी और FPI भारत की ओर रुख कर रहे हैं।
भारत-अमेरिका संभावित ट्रेड एग्रीमेंट की उम्मीदों ने भी निवेशकों का भरोसा बढ़ाया।

भारतीय शेयर बाजार की धारणा में उल्लेखनीय सुधार देखा जा रहा है, क्योंकि कच्चे तेल की कीमतें 73 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गई हैं और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की ओर से चुनिंदा खरीदारी लौटने लगी है। विश्लेषकों के अनुसार, रुपए की स्थिरता और दक्षिण कोरियाताइवान के बाजारों में भारी उतार-चढ़ाव ने मिलकर विदेशी निवेशकों का रुख भारत की ओर मोड़ना शुरू किया है।

एफपीआई गतिविधि में बदलाव

15 जून से 25 जून के बीच के नौ ट्रेडिंग सत्रों में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने कैश मार्केट में पाँच दिन खरीदारी की। हालाँकि यह खरीदारी सीमित मात्रा में रही, लेकिन इसने यह संकेत दिया कि लगातार चली आ रही भारी बिकवाली का दौर अब समाप्ति की ओर है।

जियोजित इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड के मुख्य निवेश रणनीतिकार डॉ. वी.के. विजयकुमार ने कहा, 'एफपीआई की गतिविधियों में यह बदलाव दो प्रमुख कारणों से आया है। पहला, रुपया स्थिर हो गया है और 15 मई को डॉलर के मुकाबले 96.96 के निचले स्तर से मजबूत होकर अब 94.40 के करीब आ गया है। जब रुपया मजबूत हो रहा हो, तो एफपीआई के लिए बिकवाली करना समझदारी नहीं है।'

कोरियाई और ताइवानी बाजारों की भूमिका

विजयकुमार के अनुसार दूसरा बड़ा कारण दक्षिण कोरिया और ताइवान के बाजारों में भारी अस्थिरता है। उन्होंने बताया, 'एक दिन दक्षिण कोरियाई बाजार 8 प्रतिशत गिर गया, जिससे ट्रेडिंग रोकनी पड़ी। भारी मुनाफा कमाने वाले एफपीआई अब दक्षिण कोरिया और ताइवान में बिकवाली कर रहे हैं, जिससे वे भारत में कम रिटर्न के बावजूद पुनः निवेश पर विचार करने के लिए प्रेरित हो रहे हैं।'

कच्चे तेल और भुगतान संतुलन का असर

कच्चे तेल की कीमतों का 73 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आना भारत के लिए सकारात्मक संकेत है। विश्लेषकों का कहना है कि भारत जिस 'बैलेंस ऑफ पेमेंट्स' दबाव का सामना कर रहा था, वह अब काफी हद तक कम हो गया है। इससे यह कहा जा सकता है कि लगातार एफपीआई बिकवाली का दौर खत्म हो गया है, हालाँकि विदेशी निवेशकों को भारत में स्थायी खरीदार बनने में अभी कुछ समय लग सकता है।

भारत-अमेरिका ट्रेड एग्रीमेंट की उम्मीद

भारत और अमेरिका के बीच संभावित व्यापार समझौते (Trade Agreement) को लेकर बढ़ती उम्मीदों ने भी निवेशकों के भरोसे को मजबूत किया है। रेलिगेयर ब्रोकिंग लिमिटेड के रिसर्च एसवीपी अजीत मिश्रा ने कहा कि व्यापक घरेलू आर्थिक संकेतों में सुस्ती और वैश्विक मौद्रिक नीति को लेकर बनी अनिश्चितता के बीच निवेश का एक अनुशासित और शेयर-विशिष्ट तरीका अपनाना जरूरी है।

आगे क्या देखें

मिश्रा के अनुसार, वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों का रुझान, पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक अस्थिरता और एफआईआई के निवेश का प्रवाह — ये तीनों कारक बाजार की धारणा को आकार देते रहेंगे। भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता की प्रगति पर भी बाजार की नजर बनी रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह 'पुश फैक्टर' अधिक है — यानी कोरिया और ताइवान से बाहर निकलने की मजबूरी — न कि भारत के प्रति कोई नई आस्था। रुपए की मजबूती और कच्चे तेल की गिरावट अस्थायी वैश्विक कारकों पर टिकी है। घरेलू आर्थिक संकेतों में सुस्ती और वैश्विक मौद्रिक अनिश्चितता बनी हुई है, जो किसी भी समय इस रुझान को पलट सकती है। असली परीक्षा तब होगी जब FPI बिना किसी बाहरी दबाव के भारत को प्राथमिकता देना शुरू करें।
RashtraPress
28 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

FPI भारत में वापसी क्यों कर रहे हैं?
दक्षिण कोरिया और ताइवान के बाजारों में भारी उतार-चढ़ाव के कारण FPI वहाँ बिकवाली कर रहे हैं और भारत में पुनः निवेश पर विचार कर रहे हैं। इसके साथ ही रुपए की स्थिरता और कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट ने भारत को अपेक्षाकृत आकर्षक बनाया है।
रुपया अभी किस स्तर पर है और यह FPI के लिए क्यों मायने रखता है?
रुपया 15 मई के 96.96 के निचले स्तर से मजबूत होकर अब लगभग 94.40 प्रति डॉलर पर है। जब रुपया मजबूत होता है तो FPI के लिए भारतीय संपत्तियों से बिकवाली करना नुकसानदेह होता है, इसलिए वे बिकवाली रोकते हैं।
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का भारत पर क्या असर है?
कच्चे तेल की कीमतें 73 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आने से भारत का आयात बिल घटता है और भुगतान संतुलन (Balance of Payments) पर दबाव कम होता है। विश्लेषकों के अनुसार इससे भारत की समग्र आर्थिक स्थिरता बेहतर हुई है।
क्या FPI की वापसी टिकाऊ होगी?
विश्लेषकों का कहना है कि FPI को भारत में स्थायी खरीदार बनने में अभी कुछ समय लग सकता है। वैश्विक मौद्रिक नीति की अनिश्चितता और घरेलू आर्थिक संकेतों में सुस्ती अभी भी चुनौती बनी हुई है।
भारत-अमेरिका ट्रेड एग्रीमेंट का बाजार पर क्या प्रभाव है?
भारत और अमेरिका के बीच संभावित व्यापार समझौते को लेकर बढ़ती उम्मीदों ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है। रेलिगेयर ब्रोकिंग के अजीत मिश्रा के अनुसार, इस वार्ता की प्रगति आने वाले समय में बाजार की धारणा को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में से एक रहेगी।
राष्ट्र प्रेस
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