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तिरुपुर निटवियर उद्योग को राहत: सूती धागे की कीमतों में ₹10 प्रति किलो की गिरावट

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तिरुपुर निटवियर उद्योग को राहत: सूती धागे की कीमतों में ₹10 प्रति किलो की गिरावट

सारांश

महीनों की महंगाई के बाद तिरुपुर के निटवियर निर्माताओं को राहत मिली है। केंद्र की कपास आयात शुल्क छूट के बाद सूती धागा ₹10 प्रति किलो सस्ता हुआ और कपास ₹69,000 से गिरकर ₹63,000 प्रति कैंडी पर आ गया। हालाँकि उद्योग इसे स्थायी समाधान नहीं, अस्थायी राहत मान रहा है।

मुख्य बातें

सूती धागे की कीमतों में ₹10 प्रति किलोग्राम तक की गिरावट, इस साल पहली बड़ी कमी।
केंद्र ने जून से अक्टूबर तक कपास आयात पर कस्टम ड्यूटी छूट दी।
कपास की कीमत ₹69,000 से घटकर लगभग ₹63,000 प्रति कैंडी (356 किग्रा)।
जनवरी–मई के बीच धागे की दरें ₹65–70 प्रति किग्रा तक बढ़ी थीं।
तिरुपुर क्लस्टर भारत के सबसे बड़े टेक्सटाइल निर्यात केंद्रों में से एक है।

तमिलनाडु के तिरुपुर स्थित निटवियर और कपड़ा उद्योग को महीनों की महंगाई के बाद बड़ी राहत मिली है, क्योंकि सूती धागे की कीमतों में इस साल पहली बार उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। उद्योग सूत्रों के अनुसार, अलग-अलग काउंट्स में धागे की दरें लगभग ₹10 प्रति किलोग्राम तक घटी हैं, जो कपास की कीमतों में आई तेज़ नरमी का सीधा असर है।

शुल्क छूट से बदली तस्वीर

यह गिरावट केंद्र सरकार के उस फैसले के बाद आई है, जिसमें जून से अक्टूबर के बीच कपास के आयात को कस्टम ड्यूटी से अस्थायी छूट दी गई है। इस कदम का उद्देश्य घरेलू बाज़ार में आपूर्ति बढ़ाना और कच्चे माल की कीमतों को स्थिर करना है। घोषणा से पहले कपास की कीमत लगभग ₹69,000 प्रति कैंडी (356 किलोग्राम) थी, जो अब घटकर लगभग ₹63,000 प्रति कैंडी रह गई है।

महीनों के दबाव के बाद ठंडक

जनवरी से मई के बीच धागे की कीमतें लगभग ₹65 से ₹70 प्रति किलोग्राम तक बढ़ गई थीं, जिससे स्पिनिंग मिलों, निर्माताओं और निर्यातकों की उत्पादन लागत में भारी इज़ाफा हुआ था। साल की शुरुआत में कपास लगभग ₹54,000 प्रति कैंडी पर बिक रहा था, लेकिन आपूर्ति में कमी और वैश्विक कीमतों में तेज़ी के चलते यह तेज़ी से चढ़ा। बढ़ती लागत ने कई निर्यातकों को अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा और घटते मार्जिन को लेकर चिंतित कर दिया था।

तिरुपुर क्लस्टर पर असर

तिरुपुर निटवियर क्लस्टर भारत के सबसे बड़े टेक्सटाइल और परिधान निर्यात केंद्रों में से एक है, और कच्चे माल की महंगाई ने इस क्लस्टर पर सीधा दबाव डाला था। ताज़ा गिरावट से स्पिनिंग और निटिंग यूनिट्स से लेकर निर्यातकों और खुदरा विक्रेताओं तक — पूरी टेक्सटाइल वैल्यू चेन को राहत मिलने की संभावना है।

आगे क्या

उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शुल्क छूट की अवधि में कपास का आयात बढ़ता है और बाज़ार में आपूर्ति सुधरती है, तो आने वाले हफ्तों में कीमतों में नरमी का यह सिलसिला जारी रह सकता है। हालाँकि उद्योग इसे स्थायी समाधान के बजाय एक अस्थायी राहत के रूप में देख रहा है, क्योंकि वैश्विक माँग की अनिश्चितता और बाज़ार की चुनौतियाँ अभी बरकरार हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

पर यह संरचनात्मक समाधान नहीं — सिर्फ़ एक मौसमी पैच है। भारत का कपास उत्पादन पिछले कुछ वर्षों में स्थिर रहा है, जबकि वैश्विक कीमतों पर हमारी निर्भरता बढ़ी है, और यही असली कमज़ोरी है। तिरुपुर जैसे निर्यात-केंद्रित क्लस्टरों को बांग्लादेश और वियतनाम से कड़ी प्रतिस्पर्धा मिल रही है, जहाँ इनपुट लागत पहले से नियंत्रित है। अक्टूबर के बाद यदि घरेलू कपास उत्पादन और MSP नीति पर ठोस कदम नहीं उठे, तो यह राहत अल्पकालिक साबित होगी।
RashtraPress
19 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तिरुपुर में सूती धागे की कीमतें क्यों गिरी हैं?
केंद्र सरकार द्वारा जून से अक्टूबर तक कपास आयात पर कस्टम ड्यूटी छूट देने के बाद घरेलू बाज़ार में आपूर्ति बढ़ी और कपास की कीमतें नरम हुईं। इसका सीधा असर धागे की दरों पर पड़ा, जो लगभग ₹10 प्रति किलोग्राम तक घटी हैं।
कपास की मौजूदा कीमत क्या है?
कपास की कीमत गिरकर लगभग ₹63,000 प्रति कैंडी (356 किलोग्राम) हो गई है। शुल्क छूट की घोषणा से पहले यह लगभग ₹69,000 प्रति कैंडी थी।
कपास आयात शुल्क छूट कब तक लागू रहेगी?
केंद्र सरकार ने जून से अक्टूबर के बीच कपास आयात पर कस्टम ड्यूटी से अस्थायी छूट दी है। इस अवधि में आपूर्ति बढ़ने और कीमतों में और नरमी आने की उम्मीद है।
इस गिरावट से किसे फायदा होगा?
पूरी टेक्सटाइल वैल्यू चेन को राहत मिलने की संभावना है — स्पिनिंग मिलों, निटिंग यूनिट्स, कपड़ा निर्माताओं, निर्यातकों और खुदरा विक्रेताओं तक। तिरुपुर निटवियर क्लस्टर, जो भारत के सबसे बड़े निर्यात केंद्रों में से एक है, को सबसे अधिक लाभ होगा।
क्या यह राहत स्थायी है?
उद्योग इसे स्थायी समाधान नहीं, बल्कि अस्थायी राहत के रूप में देख रहा है। वैश्विक माँग की अनिश्चितता और बाज़ार की मुश्किल परिस्थितियाँ अभी बनी हुई हैं।
राष्ट्र प्रेस
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