सलेम में भिंडी ₹5/किलो पर आई, 500 एकड़ के किसान फसल खेतों में छोड़ने को मजबूर
सारांश
मुख्य बातें
तमिलनाडु के सलेम जिले में संगागिरी क्षेत्र के भिंडी उत्पादक किसान इस समय गहरे आर्थिक संकट में हैं — बाज़ार में कीमत ₹5 प्रति किलोग्राम तक गिर जाने से फसल काटना भी घाटे का सौदा बन गया है। 2 जून 2026 तक की स्थिति के अनुसार, सैकड़ों किसान परिवारों ने कटाई रोक दी है और पकी हुई सब्ज़ियाँ खेतों में ही सड़ने के लिए छोड़ दी हैं।
प्रभावित क्षेत्र और खेती का दायरा
संगागिरी के थेवुर, अरसीरामनी, कुल्लम्पट्टी, चेट्टिपट्टी, कुंजमपलयम, ओडासक्कराई और थन्नीदासनूर गाँवों में भिंडी की खेती होती है। इस पूरे क्षेत्र में लगभग 500 एकड़ ज़मीन पर भिंडी उगाई जाती है, जो बड़ी संख्या में किसान परिवारों की प्राथमिक आय का स्रोत है।
यहाँ की भिंडी खेतों से सीधे खरीदकर बड़े व्यापारियों को बेची जाती है, जो इसे तमिलनाडु और पड़ोसी राज्य केरल के थोक बाज़ारों तक पहुँचाते हैं।
मुख्य संकट: लागत से कम मिल रहा दाम
किसानों के अनुसार, पिछले एक सप्ताह में बाज़ार में अचानक मंदी आने से कीमतें तेज़ी से गिरी हैं। अभी भिंडी का बाज़ार भाव केवल ₹5 प्रति किलोग्राम के आसपास है, जो उत्पादन लागत से काफी नीचे है।
किसानों का कहना है कि बीज, खाद, सिंचाई, मज़दूरी और परिवहन की बढ़ती लागत को जोड़ने पर खेती का कुल खर्च इस भाव पर वसूल नहीं होता। स्थिति यह है कि फसल तोड़ने और उसे कलेक्शन पॉइंट तक पहुँचाने पर जितना मज़दूरी खर्च होता है, उतनी रकम भी सब्ज़ी बेचने से नहीं मिल पाती।
किसानों की प्रतिक्रिया
आर्थिक नुकसान को देखते हुए कई किसानों ने फसल की कटाई पूरी तरह बंद कर दी है। पकी हुई भिंडी पौधों पर ही छोड़ दी गई है, जो धीरे-धीरे खराब हो रही है। किसानों ने बताया कि यह स्थिति न केवल इस सीज़न की मेहनत को बर्बाद कर रही है, बल्कि अगली फसल के लिए निवेश की क्षमता भी कमज़ोर कर रही है।
सरकार से हस्तक्षेप की माँग
प्रभावित किसानों ने राज्य सरकार से अपील की है कि वह बाज़ार की स्थिति पर बारीकी से नज़र रखे और तत्काल हस्तक्षेप करे। किसानों की माँग है कि भिंडी जैसी सब्ज़ियों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) या मूल्य स्थिरीकरण तंत्र लागू किया जाए, ताकि उत्पादकों को उचित लाभ सुनिश्चित हो सके।
गौरतलब है कि सब्ज़ी उत्पादक किसानों को अनाज फसलों की तरह सरकारी मूल्य समर्थन का लाभ नहीं मिलता, जिससे वे बाज़ार की अस्थिरता के प्रति अधिक संवेदनशील रहते हैं। यदि सरकारी हस्तक्षेप नहीं हुआ तो आने वाले हफ्तों में और किसान खेती से मुँह मोड़ सकते हैं।