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सलेम में भिंडी ₹5/किलो पर आई, 500 एकड़ के किसान फसल खेतों में छोड़ने को मजबूर

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सलेम में भिंडी ₹5/किलो पर आई, 500 एकड़ के किसान फसल खेतों में छोड़ने को मजबूर

सारांश

सलेम के संगागिरी क्षेत्र में भिंडी का बाज़ार भाव ₹5 प्रति किलो तक गिर गया है — उत्पादन लागत से भी कम। 500 एकड़ में खेती करने वाले किसान फसल काटना बंद कर चुके हैं और पकी सब्ज़ी खेतों में सड़ रही है। सरकारी हस्तक्षेप न हुआ तो नुकसान और गहरा होगा।

मुख्य बातें

तमिलनाडु के सलेम जिले में संगागिरी क्षेत्र में भिंडी की कीमत गिरकर ₹5 प्रति किलोग्राम पर आ गई है।
क्षेत्र में लगभग 500 एकड़ ज़मीन पर भिंडी की खेती होती है — थेवुर, अरसीरामनी, कुल्लम्पट्टी सहित सात गाँव प्रभावित।
फसल काटने और कलेक्शन पॉइंट तक पहुँचाने का मज़दूरी खर्च भी बिक्री से नहीं निकल रहा, जिससे किसानों ने कटाई बंद कर दी।
भिंडी तमिलनाडु और केरल के थोक बाज़ारों में सप्लाई होती है; एक सप्ताह में अचानक बाज़ार मंदी से कीमतें लुढ़कीं।
किसानों ने राज्य सरकार से मूल्य स्थिरीकरण और उचित लाभ सुनिश्चित करने के लिए तत्काल हस्तक्षेप की माँग की है।

तमिलनाडु के सलेम जिले में संगागिरी क्षेत्र के भिंडी उत्पादक किसान इस समय गहरे आर्थिक संकट में हैं — बाज़ार में कीमत ₹5 प्रति किलोग्राम तक गिर जाने से फसल काटना भी घाटे का सौदा बन गया है। 2 जून 2026 तक की स्थिति के अनुसार, सैकड़ों किसान परिवारों ने कटाई रोक दी है और पकी हुई सब्ज़ियाँ खेतों में ही सड़ने के लिए छोड़ दी हैं।

प्रभावित क्षेत्र और खेती का दायरा

संगागिरी के थेवुर, अरसीरामनी, कुल्लम्पट्टी, चेट्टिपट्टी, कुंजमपलयम, ओडासक्कराई और थन्नीदासनूर गाँवों में भिंडी की खेती होती है। इस पूरे क्षेत्र में लगभग 500 एकड़ ज़मीन पर भिंडी उगाई जाती है, जो बड़ी संख्या में किसान परिवारों की प्राथमिक आय का स्रोत है।

यहाँ की भिंडी खेतों से सीधे खरीदकर बड़े व्यापारियों को बेची जाती है, जो इसे तमिलनाडु और पड़ोसी राज्य केरल के थोक बाज़ारों तक पहुँचाते हैं।

मुख्य संकट: लागत से कम मिल रहा दाम

किसानों के अनुसार, पिछले एक सप्ताह में बाज़ार में अचानक मंदी आने से कीमतें तेज़ी से गिरी हैं। अभी भिंडी का बाज़ार भाव केवल ₹5 प्रति किलोग्राम के आसपास है, जो उत्पादन लागत से काफी नीचे है।

किसानों का कहना है कि बीज, खाद, सिंचाई, मज़दूरी और परिवहन की बढ़ती लागत को जोड़ने पर खेती का कुल खर्च इस भाव पर वसूल नहीं होता। स्थिति यह है कि फसल तोड़ने और उसे कलेक्शन पॉइंट तक पहुँचाने पर जितना मज़दूरी खर्च होता है, उतनी रकम भी सब्ज़ी बेचने से नहीं मिल पाती।

किसानों की प्रतिक्रिया

आर्थिक नुकसान को देखते हुए कई किसानों ने फसल की कटाई पूरी तरह बंद कर दी है। पकी हुई भिंडी पौधों पर ही छोड़ दी गई है, जो धीरे-धीरे खराब हो रही है। किसानों ने बताया कि यह स्थिति न केवल इस सीज़न की मेहनत को बर्बाद कर रही है, बल्कि अगली फसल के लिए निवेश की क्षमता भी कमज़ोर कर रही है।

सरकार से हस्तक्षेप की माँग

प्रभावित किसानों ने राज्य सरकार से अपील की है कि वह बाज़ार की स्थिति पर बारीकी से नज़र रखे और तत्काल हस्तक्षेप करे। किसानों की माँग है कि भिंडी जैसी सब्ज़ियों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) या मूल्य स्थिरीकरण तंत्र लागू किया जाए, ताकि उत्पादकों को उचित लाभ सुनिश्चित हो सके।

गौरतलब है कि सब्ज़ी उत्पादक किसानों को अनाज फसलों की तरह सरकारी मूल्य समर्थन का लाभ नहीं मिलता, जिससे वे बाज़ार की अस्थिरता के प्रति अधिक संवेदनशील रहते हैं। यदि सरकारी हस्तक्षेप नहीं हुआ तो आने वाले हफ्तों में और किसान खेती से मुँह मोड़ सकते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

टमाटर और प्याज़ जैसी नकदी सब्ज़ियाँ पूरी तरह बाज़ार की अनिश्चितता पर निर्भर हैं। संगागिरी की यह घटना अकेली नहीं है — हर साल किसी न किसी राज्य में किसी न किसी सब्ज़ी की कीमत धराशायी होती है और किसान फसल सड़ते देखते हैं। जब तक सब्ज़ी उत्पादकों के लिए कोई संस्थागत मूल्य समर्थन या बाज़ार हस्तक्षेप तंत्र नहीं बनता, ये संकट बार-बार दोहराते रहेंगे।
RashtraPress
21 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सलेम में भिंडी की कीमत इतनी क्यों गिर गई?
किसानों के अनुसार, पिछले एक सप्ताह में बाज़ार में अचानक मंदी आने से कीमतें तेज़ी से गिरकर ₹5 प्रति किलोग्राम तक पहुँच गई हैं। भिंडी मुख्यतः तमिलनाडु और केरल के थोक बाज़ारों में जाती है, और माँग में कमी का सीधा असर खेत-स्तर की कीमतों पर पड़ा है।
संगागिरी में कितने किसान और कितनी ज़मीन प्रभावित है?
संगागिरी और आस-पास के सात गाँवों — थेवुर, अरसीरामनी, कुल्लम्पट्टी, चेट्टिपट्टी, कुंजमपलयम, ओडासक्कराई और थन्नीदासनूर — में लगभग 500 एकड़ ज़मीन पर भिंडी की खेती होती है। यह बड़ी संख्या में किसान परिवारों की मुख्य आय का स्रोत है।
किसानों ने फसल काटना क्यों बंद कर दिया?
₹5 प्रति किलो के भाव पर फसल काटने और कलेक्शन पॉइंट तक पहुँचाने का मज़दूरी खर्च भी नहीं निकलता। ऐसे में कटाई करना और भी घाटे का सौदा बन जाता है, इसलिए किसानों ने पकी भिंडी को खेतों में ही छोड़ दिया है।
किसानों ने सरकार से क्या माँग की है?
किसानों ने राज्य सरकार से बाज़ार की स्थिति पर नज़र रखने और तत्काल हस्तक्षेप करने की अपील की है। उनकी माँग है कि भिंडी जैसी सब्ज़ियों के लिए मूल्य स्थिरीकरण तंत्र लागू किया जाए ताकि उत्पादन लागत पर उचित लाभ सुनिश्चित हो सके।
क्या सब्ज़ी उत्पादक किसानों को MSP का लाभ मिलता है?
नहीं। भारत में न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का ढाँचा मुख्यतः गेहूँ, धान जैसी अनाज फसलों तक सीमित है। भिंडी जैसी सब्ज़ियाँ इस सुरक्षा जाल से बाहर हैं, जिससे किसान बाज़ार की अस्थिरता के प्रति अधिक संवेदनशील रहते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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