16 सितंबर 2026
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यूपीआई पर मामूली शुल्क से डिजिटल भुगतान होगा आत्मनिर्भर: नीति आयोग के अशोक कुमार लाहिड़ी

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यूपीआई पर मामूली शुल्क से डिजिटल भुगतान होगा आत्मनिर्भर: नीति आयोग के अशोक कुमार लाहिड़ी

सारांश

नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक कुमार लाहिड़ी ने 16 सितंबर को यूपीआई को आत्मनिर्भर बनाने के लिए ₹2,000 से अधिक के लेनदेन पर मामूली शुल्क लगाने की वकालत की। बिलडेस्क के सह संस्थापक ने बताया कि 50 करोड़ यूपीआई उपयोगकर्ताओं वाले भारत के पास वैश्विक खुदरा डिजिटल भुगतान का आधे से अधिक हिस्सा है।

मुख्य बातें

नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक कुमार लाहिड़ी ने 16 सितंबर 2026 को कहा कि यूपीआई पर मामूली शुल्क लगाने से डिजिटल भुगतान व्यवस्था आत्मनिर्भर बन सकती है।
प्रस्तावित शुल्क केवल ₹2,000 से अधिक के लेनदेन पर लागू होगा; आम उपभोक्ता और छोटे व्यापारी लेनदेन इससे मुक्त रहेंगे।
बिजली पानी बिल, सरकारी कर, बीमा प्रीमियम और ईंधन भुगतान पर रियायती शुल्क का प्रावधान प्रस्तावित।
बिलडेस्क के सह संस्थापक श्रीनिवासु एमएन ने बताया कि यूपीआई उपयोगकर्ताओं की संख्या 50 करोड़ पार कर चुकी है।
भारत की वैश्विक खुदरा डिजिटल लेनदेन में आधे से अधिक हिस्सेदारी; एमडीआर फंड से छोटे व्यापारियों को प्रोत्साहन देने का सुझाव।
यूपीआई शुल्क अभी नीतिगत विचार विमर्श के स्तर पर; सरकार का कोई औपचारिक निर्णय नहीं।

नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक कुमार लाहिड़ी ने बुधवार, 16 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में कहा कि कुछ यूपीआई (UPI) लेनदेन पर मामूली शुल्क लगाने से देश की डिजिटल भुगतान व्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने में सहायता मिल सकती है। उनका ज़ोर इस बात पर रहा कि यह शुल्क यथासंभव कम रखा जाए ताकि आम उपभोक्ताओं पर कोई अतिरिक्त आर्थिक बोझ न पड़े।

यूजर पे सिद्धांत पर लाहिड़ी का तर्क

लाहिड़ी ने यूपीआई के लिए 'यूजर पे सिद्धांत' अपनाने की वकालत की। उनका कहना था कि व्यापारी वर्ग भी डिजिटल भुगतान से उतना ही लाभान्वित होता है जितना उपभोक्ता, क्योंकि इससे चेक जमा करने और नकदी प्रबंधन की लागत एवं जटिलता से बचाव होता है। जब उनसे पूछा गया कि ₹2,000 से अधिक के यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाने से डिजिटल भुगतान की वृद्धि प्रभावित हो सकती है, तो उन्होंने कहा, "इसे जितना संभव हो उतना कम रखें, लेकिन कृपया इसे लागू करें ताकि यूपीआई एक आत्मनिर्भर व्यवसाय बन सके।"

यह बयान ऐसे समय में आया है जब यूपीआई की वित्तीय स्थिरता को लेकर नीति निर्माताओं और उद्योग विशेषज्ञों के बीच लंबे समय से बहस जारी है। गौरतलब है कि सरकार ने अब तक शून्य शुल्क (zero MDR) नीति बनाए रखी है, जो बैंकों और भुगतान सेवा प्रदाताओं के राजस्व पर दबाव डालती रही है।

बिलडेस्क सह संस्थापक ने रेखांकित की यूपीआई की व्यापकता

बिलडेस्क के निदेशक और सह संस्थापक श्रीनिवासु एमएन ने इस अवसर पर कहा कि यूपीआई अब रोज़मर्रा के भुगतान के लिए करोड़ों भारतीयों की जीवनरेखा बन चुका है। उन्होंने बताया कि भारत में यूपीआई उपयोगकर्ताओं की संख्या 50 करोड़ को पार कर चुकी है और इस मंच के विस्तार के साथ धोखाधड़ी रोकथाम, साइबर सुरक्षा और उपभोक्ता जागरूकता जैसे क्षेत्रों में अतिरिक्त निवेश की माँग बढ़ेगी।

श्रीनिवासु ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावित शुल्क आम उपभोक्ताओं या छोटे मूल्य के व्यापारिक लेनदेन पर लागू नहीं होगा — यह केवल ₹2,000 से अधिक के सीमित लेनदेन तक ही सीमित रहेगा। इसके अलावा, बिजली पानी के बिल, सरकारी कर भुगतान, बीमा प्रीमियम और ईंधन भुगतान जैसे नियमित लेनदेन पर रियायती शुल्क का प्रावधान रखने की भी बात कही गई।

एमडीआर फंड से छोटे व्यापारियों को बढ़ावा

श्रीनिवासु ने यह भी सुझाव दिया कि मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) से प्राप्त राशि का एक हिस्सा एक विशेष कोष में डाला जाए, जिसका उपयोग विशेष रूप से छोटे व्यापारियों के बीच यूपीआई लेनदेन को प्रोत्साहित करने के लिए किया जा सके। यह प्रस्ताव भुगतान इकोसिस्टम में संतुलन बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

उन्होंने यह भी बताया कि भारत आज वैश्विक खुदरा डिजिटल भुगतान में अग्रणी स्थान पर है — दुनिया के कुल खुदरा डिजिटल लेनदेन में आधे से अधिक हिस्सेदारी भारत की है। इस उपलब्धि के पीछे बैंकों, वित्तीय संस्थानों और पूरे भुगतान इकोसिस्टम का दीर्घकालिक निवेश रहा है।

निर्यात बाज़ारों पर लाहिड़ी की सलाह

लाहिड़ी ने वैश्विक व्यापार के संदर्भ में भी टिप्पणी करते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में बढ़ती अनिश्चितता के बीच भारतीय कंपनियों को नए निर्यात बाज़ारों की पहचान स्वयं करनी चाहिए। उन्होंने यह ज़िम्मेदारी सरकार के बजाय निजी क्षेत्र पर डालते हुए कहा, "दुनिया बहुत बड़ी है।" उन्होंने अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, पूर्वी एशिया और ऑस्ट्रेलिया में मौजूद व्यापार अवसरों का उल्लेख किया, हालाँकि उन्होंने कहा कि किसी एक विशेष बाज़ार को नाम देना कठिन है।

आगे क्या होगा

यूपीआई शुल्क का प्रश्न अभी नीतिगत विचार विमर्श के स्तर पर है और सरकार ने इस पर कोई औपचारिक निर्णय नहीं लिया है। आलोचकों का कहना है कि किसी भी शुल्क ढाँचे को लागू करने से पहले सूक्ष्म उद्यमों और निम्न आय उपभोक्ताओं पर पड़ने वाले प्रभाव का गहन आकलन ज़रूरी है। आने वाले महीनों में भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI) और वित्त मंत्रालय का रुख इस दिशा में निर्णायक होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह बहस उतनी सरल नहीं जितनी दिखती है — सरकार ने जब 2020 में शून्य MDR नीति लागू की थी, तो उसका लक्ष्य समावेशिता था, जिसने यूपीआई को 50 करोड़ उपयोगकर्ताओं तक पहुँचाया। अब शुल्क लगाना उसी समावेशिता को जोखिम में डाल सकता है, खासकर अर्ध शहरी और ग्रामीण उपयोगकर्ताओं के लिए जो ₹2,000 से थोड़े अधिक के लेनदेन भी रोज़ करते हैं। मुख्यधारा की कवरेज यह भी नहीं पूछती कि MDR से एकत्र राशि का प्रशासन कौन करेगा और पारदर्शिता कैसे सुनिश्चित होगी। असली परीक्षा यही है — क्या यह शुल्क इकोसिस्टम को टिकाऊ बनाएगा या डिजिटल भुगतान की गति को धीमा करेगा?
RashtraPress
16 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यूपीआई पर प्रस्तावित शुल्क क्या है और किस पर लागू होगा?
नीति आयोग के उपाध्यक्ष अशोक कुमार लाहिड़ी के अनुसार, यह शुल्क केवल ₹2,000 से अधिक के यूपीआई लेनदेन पर लागू होगा। आम उपभोक्ताओं और छोटे मूल्य के व्यापारी लेनदेन इससे मुक्त रहेंगे, जबकि बिजली पानी बिल और सरकारी कर जैसे नियमित भुगतान पर रियायती शुल्क का प्रावधान होगा।
यूपीआई को आत्मनिर्भर बनाने की ज़रूरत क्यों है?
बिलडेस्क सह संस्थापक श्रीनिवासु एमएन के अनुसार, यूपीआई के विस्तार के साथ धोखाधड़ी रोकथाम, साइबर सुरक्षा और उपभोक्ता जागरूकता जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ाना ज़रूरी है। अभी तक शून्य MDR नीति के कारण बैंकों और भुगतान सेवा प्रदाताओं को इस निवेश की भरपाई का कोई स्रोत नहीं है।
क्या यूपीआई शुल्क लागू करने का कोई सरकारी निर्णय हो चुका है?
नहीं, अभी तक यह केवल नीतिगत विचार विमर्श के स्तर पर है। लाहिड़ी और श्रीनिवासु जैसे विशेषज्ञों ने इसकी वकालत की है, लेकिन सरकार या भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (NPCI) की ओर से कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है।
भारत में यूपीआई के कितने उपयोगकर्ता हैं और वैश्विक स्थिति क्या है?
भारत में यूपीआई उपयोगकर्ताओं की संख्या 50 करोड़ पार कर चुकी है। इसके अलावा, दुनिया के कुल खुदरा डिजिटल लेनदेन में भारत की हिस्सेदारी आधे से अधिक है, जो इसे वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ा खुदरा डिजिटल भुगतान बाज़ार बनाती है।
एमडीआर फंड का उपयोग किस तरह किया जाएगा?
श्रीनिवासु एमएन ने सुझाव दिया है कि मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) से एकत्र राशि का एक हिस्सा एक विशेष कोष में जाए, जिसका उपयोग विशेष रूप से छोटे व्यापारियों के बीच यूपीआई लेनदेन को प्रोत्साहित करने के लिए किया जाए। यह एक पुनर्वितरण तंत्र के रूप में काम करेगा।
राष्ट्र प्रेस
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