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अमजद अली खान बोले: 'सरोद के ज़रिए गाता हूं', ग्वालियर के 'सरोज घर' में सहेजी है पीढ़ियों की विरासत

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अमजद अली खान बोले: 'सरोद के ज़रिए गाता हूं', ग्वालियर के 'सरोज घर' में सहेजी है पीढ़ियों की विरासत

सारांश

अमजद अली खान का कहना है कि वे सरोद 'बजाते' नहीं, उसके ज़रिए 'गाते' हैं — यही उनके संगीत की आत्मा है। ग्वालियर के 'सरोज घर' म्यूजियम में पीढ़ियों की विरासत सहेजी गई है और दुनियाभर में 500 सरोद वादकों के साथ इस वाद्ययंत्र का भविष्य उज्ज्वल दिखता है।

मुख्य बातें

अमजद अली खान ने ग्वालियर स्थित अपने पुश्तैनी घर को 'सरोज घर' नाम के म्यूजियम में तब्दील कराया है।
इस म्यूजियम में उनके बचपन का सरोद, उनके पूर्वजों और भारत के कई महान संगीतकारों के वाद्ययंत्र संग्रहीत हैं।
खान ने बताया कि वे सिर्फ सरोद नहीं बजाते, बल्कि वाद्ययंत्र के ज़रिए गाते हैं — यह उनके संगीत की विशिष्ट पहचान है।
उन्होंने बेटों अमान अली बंगश और अयान अली बंगश सहित हर कलाकार की अपनी अलग शैली पर ज़ोर दिया।
दुनियाभर में आज करीब 500 सरोद वादक हैं — खान ने इसे सरोद के उज्ज्वल भविष्य का संकेत बताया।

मशहूर सरोद वादक अमजद अली खान ने 18 अक्टूबर 2026 को ग्वालियर में अपनी संगीत यात्रा और पारिवारिक विरासत पर खुलकर बात की। उन्होंने बताया कि जिस घर में उनका जन्म हुआ, उसे अब 'सरोज घर' नाम के म्यूजियम में तब्दील कर दिया गया है, जहाँ उनके पूर्वजों सहित भारत के कई महान संगीतकारों के वाद्ययंत्र सुरक्षित रखे गए हैं।

सरोज घर: एक जीवित संगीत संग्रहालय

अमजद अली खान ने बताया, 'ग्वालियर में हमारे पुश्तैनी घर को म्यूजियम में बदल दिया गया है। इसका नाम 'सरोज घर' है। यहाँ मेरे शुरुआती दिनों का सरोद भी रखा गया है, साथ ही मेरे पूर्वजों और भारत के दूसरे महान संगीतकारों के सभी वाद्ययंत्र भी मौजूद हैं।' उन्होंने यह भी बताया कि कई बड़े संगीतकारों ने अपने वाद्ययंत्र स्वेच्छा से इस म्यूजियम को दान किए हैं।

यह म्यूजियम केवल पुरानी यादों का संग्रह नहीं, बल्कि भारतीय शास्त्रीय संगीत की कई पीढ़ियों की जीवंत थाती है। गौरतलब है कि ग्वालियर का भारतीय शास्त्रीय संगीत में ऐतिहासिक महत्त्व रहा है और यह घराना-परंपरा का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है।

हर कलाकार की अपनी पहचान

खान साहब ने बताया कि हर सरोद वादक का अपना अलग संगीत-संसार होता है। उन्होंने कहा, 'हर कलाकार अपने अंदाज़ में सरोद बजाता है और उसकी धुन में उसकी अपनी पहचान झलकती है।' उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि उनके पिता के सरोद और उनके बेटों — अमान अली बंगश और अयान अली बंगश — के संगीत में स्पष्ट अंतर है।

यह टिप्पणी भारतीय शास्त्रीय संगीत की उस गहरी परंपरा की ओर इशारा करती है जिसमें गुरु-शिष्य परंपरा के साथ-साथ हर कलाकार अपनी व्यक्तिगत अभिव्यक्ति विकसित करता है।

वाद्ययंत्र नहीं, आवाज़ — खान का दर्शन

अमजद अली खान ने अपने संगीत की विशेषता को एक वाक्य में समेटा: 'भगवान की कृपा से मैं सिर्फ सरोद नहीं बजाता, बल्कि अपने इंस्ट्रूमेंट के ज़रिए गाता हूं।' उनके अनुसार संगीत में सबसे ज़रूरी यह है कि वाद्ययंत्र के माध्यम से भावनाओं को किस तरह सामने लाया जाता है।

उन्होंने कहा, 'सरोद से निकलने वाली धुन में गायकी का अहसास होना मेरे लिए बहुत अहम है। यही बात मेरे संगीत को खास बनाती है।' यह दृष्टिकोण उन्हें परंपरागत वादकों से अलग पहचान देता है, जहाँ वाद्ययंत्र केवल एक तकनीकी उपकरण नहीं, बल्कि भावनाओं की वाणी बन जाता है।

सरोद का भविष्य: उम्मीद की नई सुरलहरें

नई पीढ़ी के कलाकारों पर बात करते हुए अमजद अली खान ने संतोष व्यक्त किया। उन्होंने बताया कि आज दुनियाभर में करीब 500 सरोद वादक हैं, जो इस वाद्ययंत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत है। उन्होंने कहा, 'सितार, तबला, गायकी और नृत्य समेत भारतीय संगीत की अलग-अलग विधाओं में नई पीढ़ी के प्रतिभाशाली कलाकार सामने आ रहे हैं।'

यह ऐसे समय में आया है जब भारतीय शास्त्रीय संगीत को वैश्विक मंचों पर नई पहचान मिल रही है और युवा श्रोताओं में पारंपरिक कलाओं के प्रति रुचि बढ़ी है। खान ने विश्वास जताया कि 'आने वाले समय में सरोद की पहचान और मज़बूत होगी।'

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह सवाल बनता है कि भारत सरकार और संगीत संस्थाएँ ऐसी विरासत के संरक्षण में किस हद तक भागीदार हैं। यह ऐसे समय में महत्त्वपूर्ण है जब शास्त्रीय संगीत की कई विधाएँ राज्य संरक्षण के अभाव में सिमटती जा रही हैं। 500 सरोद वादकों का आँकड़ा उत्साहजनक है, लेकिन बिना संस्थागत ढाँचे के यह संख्या स्थायी नहीं होगी।
RashtraPress
18 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अमजद अली खान का 'सरोज घर' क्या है?
'सरोज घर' ग्वालियर में स्थित अमजद अली खान के पुश्तैनी घर को तब्दील करके बनाया गया एक संगीत संग्रहालय है। इसमें खान के बचपन का सरोद, उनके पूर्वजों और भारत के कई महान संगीतकारों के वाद्ययंत्र सहेजकर रखे गए हैं।
अमजद अली खान अपने संगीत को खास क्यों मानते हैं?
अमजद अली खान के अनुसार वे केवल सरोद वादन नहीं करते, बल्कि अपने वाद्ययंत्र के ज़रिए गाते हैं। उनके लिए सरोद की धुन में गायकी का भाव होना ही उनके संगीत को दूसरों से अलग और विशिष्ट बनाता है।
क्या अमजद अली खान के बेटे भी सरोद बजाते हैं?
हाँ, उनके दोनों बेटे अमान अली बंगश और अयान अली बंगश भी सरोद वादक हैं। अमजद अली खान ने स्वयं कहा कि उनके पिता, उनके और उनके बेटों के संगीत में स्पष्ट अंतर है, जो हर पीढ़ी की अपनी पहचान को दर्शाता है।
दुनियाभर में कितने सरोद वादक हैं?
अमजद अली खान के अनुसार आज दुनियाभर में करीब 500 सरोद वादक हैं। उन्होंने इसे सरोद और भारतीय शास्त्रीय संगीत के उज्ज्वल भविष्य के लिए एक सकारात्मक संकेत बताया।
सरोज घर म्यूजियम में क्या-क्या रखा गया है?
सरोज घर में अमजद अली खान के शुरुआती दिनों का सरोद, उनके पूर्वजों के वाद्ययंत्र और भारत के कई महान संगीतकारों द्वारा दान किए गए वाद्ययंत्र रखे गए हैं। यह म्यूजियम ग्वालियर के पारंपरिक संगीत घराने की बहुपीढ़ी विरासत का जीवंत प्रमाण है।
राष्ट्र प्रेस
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