अमजद अली खान बोले: 'सरोद के ज़रिए गाता हूं', ग्वालियर के 'सरोज घर' में सहेजी है पीढ़ियों की विरासत
सारांश
मुख्य बातें
मशहूर सरोद वादक अमजद अली खान ने 18 अक्टूबर 2026 को ग्वालियर में अपनी संगीत यात्रा और पारिवारिक विरासत पर खुलकर बात की। उन्होंने बताया कि जिस घर में उनका जन्म हुआ, उसे अब 'सरोज घर' नाम के म्यूजियम में तब्दील कर दिया गया है, जहाँ उनके पूर्वजों सहित भारत के कई महान संगीतकारों के वाद्ययंत्र सुरक्षित रखे गए हैं।
सरोज घर: एक जीवित संगीत संग्रहालय
अमजद अली खान ने बताया, 'ग्वालियर में हमारे पुश्तैनी घर को म्यूजियम में बदल दिया गया है। इसका नाम 'सरोज घर' है। यहाँ मेरे शुरुआती दिनों का सरोद भी रखा गया है, साथ ही मेरे पूर्वजों और भारत के दूसरे महान संगीतकारों के सभी वाद्ययंत्र भी मौजूद हैं।' उन्होंने यह भी बताया कि कई बड़े संगीतकारों ने अपने वाद्ययंत्र स्वेच्छा से इस म्यूजियम को दान किए हैं।
यह म्यूजियम केवल पुरानी यादों का संग्रह नहीं, बल्कि भारतीय शास्त्रीय संगीत की कई पीढ़ियों की जीवंत थाती है। गौरतलब है कि ग्वालियर का भारतीय शास्त्रीय संगीत में ऐतिहासिक महत्त्व रहा है और यह घराना-परंपरा का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है।
हर कलाकार की अपनी पहचान
खान साहब ने बताया कि हर सरोद वादक का अपना अलग संगीत-संसार होता है। उन्होंने कहा, 'हर कलाकार अपने अंदाज़ में सरोद बजाता है और उसकी धुन में उसकी अपनी पहचान झलकती है।' उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि उनके पिता के सरोद और उनके बेटों — अमान अली बंगश और अयान अली बंगश — के संगीत में स्पष्ट अंतर है।
यह टिप्पणी भारतीय शास्त्रीय संगीत की उस गहरी परंपरा की ओर इशारा करती है जिसमें गुरु-शिष्य परंपरा के साथ-साथ हर कलाकार अपनी व्यक्तिगत अभिव्यक्ति विकसित करता है।
वाद्ययंत्र नहीं, आवाज़ — खान का दर्शन
अमजद अली खान ने अपने संगीत की विशेषता को एक वाक्य में समेटा: 'भगवान की कृपा से मैं सिर्फ सरोद नहीं बजाता, बल्कि अपने इंस्ट्रूमेंट के ज़रिए गाता हूं।' उनके अनुसार संगीत में सबसे ज़रूरी यह है कि वाद्ययंत्र के माध्यम से भावनाओं को किस तरह सामने लाया जाता है।
उन्होंने कहा, 'सरोद से निकलने वाली धुन में गायकी का अहसास होना मेरे लिए बहुत अहम है। यही बात मेरे संगीत को खास बनाती है।' यह दृष्टिकोण उन्हें परंपरागत वादकों से अलग पहचान देता है, जहाँ वाद्ययंत्र केवल एक तकनीकी उपकरण नहीं, बल्कि भावनाओं की वाणी बन जाता है।
सरोद का भविष्य: उम्मीद की नई सुरलहरें
नई पीढ़ी के कलाकारों पर बात करते हुए अमजद अली खान ने संतोष व्यक्त किया। उन्होंने बताया कि आज दुनियाभर में करीब 500 सरोद वादक हैं, जो इस वाद्ययंत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत है। उन्होंने कहा, 'सितार, तबला, गायकी और नृत्य समेत भारतीय संगीत की अलग-अलग विधाओं में नई पीढ़ी के प्रतिभाशाली कलाकार सामने आ रहे हैं।'
यह ऐसे समय में आया है जब भारतीय शास्त्रीय संगीत को वैश्विक मंचों पर नई पहचान मिल रही है और युवा श्रोताओं में पारंपरिक कलाओं के प्रति रुचि बढ़ी है। खान ने विश्वास जताया कि 'आने वाले समय में सरोद की पहचान और मज़बूत होगी।'