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पद्मश्री पंडित राजीव तारानाथ: 9 वर्ष में मंच, उस्ताद अली अकबर खान के शिष्य, 91 वर्ष की आयु में हुआ निधन

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पद्मश्री पंडित राजीव तारानाथ: 9 वर्ष में मंच, उस्ताद अली अकबर खान के शिष्य, 91 वर्ष की आयु में हुआ निधन

सारांश

9 वर्ष की उम्र में मंच, पीएचडी के बाद प्रोफेसरी की बजाय सरोद — पद्मश्री पंडित राजीव तारानाथ का जीवन भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रति असाधारण समर्पण की गाथा है। 17 अक्टूबर को उनकी जयंती पर उनकी विरासत को नमन।

मुख्य बातें

पंडित राजीव तारानाथ का जन्म 7 अक्टूबर 1932 को बेंगलुरु, कर्नाटक में हुआ था।
उन्होंने 9 वर्ष की आयु में पहला सार्वजनिक संगीत प्रदर्शन दिया और किशोरावस्था में ऑल इंडिया रेडियो के लिए गायन किया।
वे उस्ताद अली अकबर खान के प्रमुख शिष्य थे; पंडित रविशंकर और विदुषी अन्नपूर्णा देवी से भी मार्गदर्शन लिया।
अंग्रेजी साहित्य में पीएचडी और REC-T, तिरुचिरापल्ली में प्रोफेसरी छोड़कर उन्होंने संगीत को जीवन का मार्ग बनाया।
भारत सरकार ने उन्हें 2019 में पद्म श्री और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया।
11 जून 2024 को मैसूर में 91 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।

सरोद वादक और पद्मश्री से सम्मानित पंडित राजीव तारानाथ का 11 जून 2024 को कर्नाटक के मैसूर में 91 वर्ष की आयु में निधन हो गया। भारतीय शास्त्रीय संगीत की मैहर घराना परंपरा के इस महान साधक ने महज 9 वर्ष की उम्र में अपना पहला सार्वजनिक संगीत प्रदर्शन दिया था और आजीवन राग-संगीत को अपना जीवन समर्पित किया। 17 अक्टूबर को उनकी जयंती पर संगीत प्रेमी उनके अतुलनीय योगदान को स्मरण कर रहे हैं।

जन्म और प्रारंभिक जीवन

पंडित राजीव तारानाथ का जन्म 7 अक्टूबर 1932 को कर्नाटक के बेंगलुरु में एक संगीत-प्रेमी परिवार में हुआ था। उनके पिता पंडित तारानाथ स्वयं संगीत के अनुरागी थे और उन्होंने राजीव को संगीत की प्रारंभिक शिक्षा दी। उनकी माता का नाम सुमति बाई था। बचपन से ही राजीव की रुचि संगीत में असाधारण रूप से गहरी थी, जिसके चलते उन्होंने 9 वर्ष की अल्पायु में अपना पहला सार्वजनिक प्रदर्शन दिया।

अपने किशोर वर्षों में वे ऑल इंडिया रेडियो के लिए गायन करते थे, जो उस समय के लिए एक असाधारण उपलब्धि थी। यह ऐसे समय में आया जब शास्त्रीय संगीत की शिक्षा सीमित केंद्रों तक ही सुलभ थी।

शिक्षा और गुरु-परंपरा

तारानाथ ने अंग्रेजी साहित्य में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की और कुछ समय के लिए तिरुचिरापल्ली के क्षेत्रीय इंजीनियरिंग कॉलेज (REC-T) में अंग्रेजी साहित्य के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष के रूप में कार्यरत रहे। किंतु संगीत का आकर्षण इतना प्रबल था कि उन्होंने शिक्षण-करियर को विराम देकर सरोद को ही अपना मार्ग चुना।

प्रोफेसरी छोड़ने के बाद वे कलकत्ता गए और वहाँ उस्ताद अली अकबर खान के सान्निध्य में सरोद की गहन साधना की। वे उस्ताद अली अकबर खान के प्रमुख शिष्यों में गिने जाते हैं। इसके अतिरिक्त, उन्होंने पंडित रविशंकर और विदुषी अन्नपूर्णा देवी से भी संगीत का मार्गदर्शन प्राप्त किया। गुरु-परंपरा की इस त्रिवेणी ने उनकी संगीत-साधना को अद्वितीय गहराई दी।

सांगीतिक विशेषता और योगदान

तारानाथ मुख्य रूप से रागों की गहरी व्याख्या, सुरों की असाधारण गुणवत्ता और सरोद पर अपनी तकनीकी दक्षता के लिए जाने जाते थे। उन्होंने भारत के साथ-साथ विश्व के अनेक देशों में प्रस्तुतियाँ दीं और भारतीय शास्त्रीय संगीत को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाई। गौरतलब है कि एक अकादमिक पृष्ठभूमि से आने के बावजूद उन्होंने संगीत में जो ऊँचाई हासिल की, वह अपने आप में प्रेरणादायी है।

सम्मान और पुरस्कार

भारतीय शास्त्रीय संगीत में अपने जीवन भर के योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 2019 में प्रतिष्ठित पद्म श्री से सम्मानित किया। इसके अतिरिक्त उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित कई राष्ट्रीय सम्मान भी प्राप्त हुए। ये पुरस्कार उनकी उस संगीत-यात्रा के प्रमाण हैं, जो एक बेंगलुरु के बालक के पहले सार्वजनिक प्रदर्शन से शुरू होकर विश्व के मंचों तक पहुँची।

विरासत और स्मृति

11 जून 2024 को मैसूर में उनके निधन के साथ भारतीय शास्त्रीय संगीत ने एक ऐसा स्तंभ खो दिया जो दशकों से रागों की आत्मा को जीवंत रखे हुए था। उनकी जयंती 17 अक्टूबर को हर वर्ष संगीत प्रेमी उनकी परंपरा और विरासत को सम्मान देते हैं। उनके शिष्यों और संगीत की अगली पीढ़ी के माध्यम से उनकी राग-साधना आज भी जीवित है और भारतीय शास्त्रीय संगीत को समृद्ध करती रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिसमें अकादमिक प्रतिभाओं को करियर की दुविधा झेलनी पड़ती है। एक पीएचडी धारक प्रोफेसर का सरोद के लिए सब कुछ छोड़ना यह दर्शाता है कि संस्थागत संगीत-शिक्षा के बिना शास्त्रीय कलाकारों को व्यक्तिगत बलिदान से ही परंपरा जिंदा रखनी पड़ती है। पद्म श्री उन्हें जीवन के अंतिम पड़ाव पर — 87 वर्ष की आयु में — मिला, जो यह प्रश्न उठाता है कि क्या हम अपने शास्त्रीय कलाकारों को पर्याप्त समय पर पहचानते हैं। उनकी विरासत केवल उनके रागों में नहीं, बल्कि उस चुनाव में भी है जो उन्होंने तब किया जब सुरक्षित राह और संगीत की साधना के बीच खड़े थे।
RashtraPress
17 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पंडित राजीव तारानाथ कौन थे?
पंडित राजीव तारानाथ एक प्रख्यात भारतीय शास्त्रीय सरोद वादक थे, जो उस्ताद अली अकबर खान के प्रमुख शिष्यों में गिने जाते थे। उनका जन्म 7 अक्टूबर 1932 को बेंगलुरु में हुआ था और 11 जून 2024 को मैसूर में 91 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।
पंडित राजीव तारानाथ के गुरु कौन थे?
पंडित राजीव तारानाथ ने उस्ताद अली अकबर खान के मार्गदर्शन में सरोद की गहन साधना की और वे उनके प्रमुख शिष्यों में से एक थे। इसके अतिरिक्त, उन्होंने पंडित रविशंकर और विदुषी अन्नपूर्णा देवी से भी संगीत का मार्गदर्शन प्राप्त किया।
पंडित राजीव तारानाथ को कौन-कौन से पुरस्कार मिले?
भारत सरकार ने उन्हें 2019 में पद्म श्री से सम्मानित किया। इसके अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित कई अन्य राष्ट्रीय सम्मान भी प्राप्त हुए।
पंडित राजीव तारानाथ ने संगीत से पहले क्या किया था?
पंडित राजीव तारानाथ ने अंग्रेजी साहित्य में पीएचडी की उपाधि हासिल की थी और तिरुचिरापल्ली के क्षेत्रीय इंजीनियरिंग कॉलेज (REC-T) में अंग्रेजी साहित्य के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष के रूप में कार्य किया। बाद में उन्होंने प्रोफेसरी छोड़कर कलकत्ता में उस्ताद अली अकबर खान के सान्निध्य में सरोद साधना को पूरा जीवन समर्पित कर दिया।
पंडित राजीव तारानाथ की जयंती कब मनाई जाती है?
पंडित राजीव तारानाथ की जयंती प्रत्येक वर्ष 17 अक्टूबर को मनाई जाती है। इस दिन संगीत प्रेमी और उनके शिष्य भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनके अमूल्य योगदान को श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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