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'कयामत से कयामत तक' के गाने 'कमजोर' थे — डिस्ट्रीब्यूटर्स ने किया था खारिज, आनंद-मिलिंद ने खोला राज़

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'कयामत से कयामत तक' के गाने 'कमजोर' थे — डिस्ट्रीब्यूटर्स ने किया था खारिज, आनंद-मिलिंद ने खोला राज़

सारांश

1988 में जिस फिल्म को डिस्ट्रीब्यूटर्स ने 'कमजोर संगीत' कहकर ठुकरा दिया था, वही 'कयामत से कयामत तक' हिंदी सिनेमा की सबसे यादगार फिल्मों में शामिल हो गई। आनंद-मिलिंद ने 'इंडियन आइडल' पर यह अनसुना किस्सा साझा किया — इंडस्ट्री की सोच और दर्शकों के प्यार के बीच का वह फासला जो इतिहास बन गया।

मुख्य बातें

'कयामत से कयामत तक' (1988) को रिलीज से पहले डिस्ट्रीब्यूटर्स ने यह कहकर खारिज कर दिया था कि इसका संगीत 'बहुत कमजोर और धीमा' है।
निर्माता नासिर हुसैन को फिल्म मुंबई में खुद रिलीज करनी पड़ी, क्योंकि कोई डिस्ट्रीब्यूटर तैयार नहीं था।
रिलीज के बाद बारहवें हफ्ते तक गैएटी-गैलेक्सी थिएटर में शो हाउसफुल रहे।
संगीतकार आनंद ने बताया कि उनकी प्रेरणा पिता चित्रगुप्त और 1960 के दशक के स्वर्णिम हिंदी फिल्म संगीत से मिली।
निर्देशक मंसूर खान स्वयं ड्रम और पियानो बजाते थे, जिससे संगीत-निर्माण की प्रक्रिया सहज रही।

संगीतकार जोड़ी आनंद-मिलिंद ने हाल ही में खुलासा किया कि 1988 में रिलीज हुई आमिर खान और जूही चावला अभिनीत फिल्म 'कयामत से कयामत तक' को रिलीज से पहले इंडस्ट्री के डिस्ट्रीब्यूटर्स ने यह कहकर ठुकरा दिया था कि इसका संगीत 'बहुत कमजोर और धीमा' है। करीब चार दशक बाद यह किस्सा म्यूजिक रियलिटी शो 'इंडियन आइडल' के मंच पर सामने आया, जब दोनों संगीतकारों ने उस दौर की अनसुनी यादें साझा कीं।

डिस्ट्रीब्यूटर्स ने क्यों ठुकराई थी फिल्म

आनंद ने बताया कि फिल्म पूरी होने के बाद डिस्ट्रीब्यूटर्स के लिए एक ट्रायल शो आयोजित किया गया था, लेकिन किसी ने भी इसे खरीदने में रुचि नहीं दिखाई। हर डिस्ट्रीब्यूटर का एक ही तर्क था — फिल्म का संगीत बहुत धीमा है और दर्शकों को पसंद नहीं आएगा।

उस दौर की मानसिकता के बारे में आनंद ने कहा, 'उस समय यह सोच थी कि सिर्फ तेज और जोशीले गाने ही हिट हो सकते हैं।' नतीजतन, निर्माता नासिर हुसैन को मुंबई में यह फिल्म खुद ही रिलीज करनी पड़ी।

रिलीज के बाद दर्शकों ने पलट दी तस्वीर

जब फिल्म आखिरकार सिनेमाघरों में पहुँची, तो दर्शकों की प्रतिक्रिया ने सभी आलोचनाओं को गलत साबित कर दिया। आनंद ने याद करते हुए बताया कि वे अक्सर बांद्रा के गैएटी-गैलेक्सी थिएटर जाकर दर्शकों की प्रतिक्रिया देखते थे।

उन्होंने बताया, 'दूसरे, तीसरे, चौथे, पाँचवें और यहाँ तक कि बारहवें हफ्ते तक भी शो हाउसफुल चल रहे थे। कई कॉलेज के छात्र सिर्फ गाने देखने के लिए थिएटर आते थे और गाने खत्म होते ही बाहर निकल जाते थे। उन्हें ठीक-ठीक पता होता था कि कौन-सा गाना किस समय आएगा।'

प्रेरणा और संगीत की पृष्ठभूमि

शो में जज और रैपर बादशाह ने आनंद से उनकी सदाबहार धुनों के पीछे की प्रेरणा के बारे में पूछा। आनंद ने बताया कि उनकी पहली प्रेरणा उनके पिता और प्रसिद्ध संगीतकार चित्रगुप्त थे।

उन्होंने कहा, '1960 का दशक हमारे लिए सबसे बड़ी प्रेरणा बना। एस.डी. बर्मन, मदन मोहन और कई महान संगीतकारों ने उस स्वर्णिम दौर में जो संगीत दिया, उसने हमें गहराई से प्रभावित किया।'

फिल्म की टीम और निर्देशक की भूमिका

आनंद के अनुसार, 'कयामत से कयामत तक' के लिए संगीत तैयार करना उनके लिए अपेक्षाकृत सहज रहा, क्योंकि पूरी टीम में संगीत को लेकर गहरी समझ थी। उन्होंने बताया कि निर्देशक मंसूर खान स्वयं ड्रम और पियानो बजाते थे, जिससे संवाद और सहयोग आसान हो गया।

उन्होंने जोड़ा, 'इस फिल्म में सब कुछ नया था — नया हीरो, नई हीरोइन और नए निर्देशक। जब किसी निर्देशक को संगीत की अच्छी समझ होती है, तो काम करना और भी आसान हो जाता है।'

चार दशक बाद भी जीवित है विरासत

गौरतलब है कि 'पापा कहते हैं', 'ऐ मेरे हमसफर' और 'गजब का है दिन' जैसे गीत आज भी श्रोताओं के बीच उतने ही लोकप्रिय हैं। यह किस्सा इस बात की याद दिलाता है कि उद्योग की पारंपरिक सोच हमेशा दर्शकों की असली नब्ज को नहीं पकड़ पाती। 'इंडियन आइडल' के मंच पर कंटेस्टेंट अंशिका चोंकर और तनिष्क शुक्ला की परफॉर्मेंस ने इस यादगार फिल्म की स्मृतियों को एक बार फिर ताज़ा कर दिया।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उद्योग की उस संकीर्ण सोच की है जो 'फॉर्मूला' को दर्शकों की भावना से ऊपर रखती है। 1988 में जिन डिस्ट्रीब्यूटर्स ने 'धीमे संगीत' को कमज़ोरी बताया, वही गाने आज चार दशक बाद भी स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर करोड़ों बार सुने जाते हैं। यह विरोधाभास बताता है कि व्यावसायिक पूर्वाग्रह कैसे कला के मूल्यांकन को विकृत कर सकता है। असली सवाल यह है कि क्या आज की इंडस्ट्री भी उसी जाल में फँसी है — जहाँ ट्रेंड को टाइमलेसनेस से ऊपर रखा जाता है।
RashtraPress
10 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

डिस्ट्रीब्यूटर्स ने 'कयामत से कयामत तक' को क्यों खारिज किया था?
डिस्ट्रीब्यूटर्स का कहना था कि फिल्म का संगीत बहुत कमजोर और धीमा है और यह दर्शकों को पसंद नहीं आएगा। उस दौर में यह धारणा थी कि केवल तेज और जोशीले गाने ही हिट हो सकते हैं।
आनंद-मिलिंद ने यह किस्सा कहाँ सुनाया?
संगीतकार जोड़ी आनंद-मिलिंद ने यह किस्सा म्यूजिक रियलिटी शो 'इंडियन आइडल' के मंच पर साझा किया, जब कंटेस्टेंट अंशिका चोंकर और तनिष्क शुक्ला ने फिल्म के एक लोकप्रिय गीत पर परफॉर्म किया।
'कयामत से कयामत तक' को आखिरकार कैसे रिलीज किया गया?
चूँकि कोई डिस्ट्रीब्यूटर फिल्म खरीदने को तैयार नहीं था, इसलिए निर्माता नासिर हुसैन ने इसे मुंबई में खुद रिलीज किया। रिलीज के बाद दर्शकों ने फिल्म को इतना प्यार दिया कि बारहवें हफ्ते तक शो हाउसफुल रहे।
आनंद-मिलिंद की संगीत प्रेरणा क्या थी?
आनंद के अनुसार उनकी पहली प्रेरणा उनके पिता और प्रसिद्ध संगीतकार चित्रगुप्त थे। इसके अलावा 1960 के दशक का हिंदी फिल्म संगीत — विशेषकर एस.डी. बर्मन और मदन मोहन का काम — उनके लिए सबसे बड़ी प्रेरणा रहा।
'कयामत से कयामत तक' के कौन-से गाने आज भी लोकप्रिय हैं?
फिल्म के 'पापा कहते हैं', 'ऐ मेरे हमसफर' और 'गजब का है दिन' जैसे गीत आज भी श्रोताओं के बीच उतने ही लोकप्रिय हैं जितने 1988 में थे। ये गाने हिंदी फिल्म संगीत के सबसे यादगार गीतों में गिने जाते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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