'कयामत से कयामत तक' के गाने 'कमजोर' थे — डिस्ट्रीब्यूटर्स ने किया था खारिज, आनंद-मिलिंद ने खोला राज़
सारांश
मुख्य बातें
संगीतकार जोड़ी आनंद-मिलिंद ने हाल ही में खुलासा किया कि 1988 में रिलीज हुई आमिर खान और जूही चावला अभिनीत फिल्म 'कयामत से कयामत तक' को रिलीज से पहले इंडस्ट्री के डिस्ट्रीब्यूटर्स ने यह कहकर ठुकरा दिया था कि इसका संगीत 'बहुत कमजोर और धीमा' है। करीब चार दशक बाद यह किस्सा म्यूजिक रियलिटी शो 'इंडियन आइडल' के मंच पर सामने आया, जब दोनों संगीतकारों ने उस दौर की अनसुनी यादें साझा कीं।
डिस्ट्रीब्यूटर्स ने क्यों ठुकराई थी फिल्म
आनंद ने बताया कि फिल्म पूरी होने के बाद डिस्ट्रीब्यूटर्स के लिए एक ट्रायल शो आयोजित किया गया था, लेकिन किसी ने भी इसे खरीदने में रुचि नहीं दिखाई। हर डिस्ट्रीब्यूटर का एक ही तर्क था — फिल्म का संगीत बहुत धीमा है और दर्शकों को पसंद नहीं आएगा।
उस दौर की मानसिकता के बारे में आनंद ने कहा, 'उस समय यह सोच थी कि सिर्फ तेज और जोशीले गाने ही हिट हो सकते हैं।' नतीजतन, निर्माता नासिर हुसैन को मुंबई में यह फिल्म खुद ही रिलीज करनी पड़ी।
रिलीज के बाद दर्शकों ने पलट दी तस्वीर
जब फिल्म आखिरकार सिनेमाघरों में पहुँची, तो दर्शकों की प्रतिक्रिया ने सभी आलोचनाओं को गलत साबित कर दिया। आनंद ने याद करते हुए बताया कि वे अक्सर बांद्रा के गैएटी-गैलेक्सी थिएटर जाकर दर्शकों की प्रतिक्रिया देखते थे।
उन्होंने बताया, 'दूसरे, तीसरे, चौथे, पाँचवें और यहाँ तक कि बारहवें हफ्ते तक भी शो हाउसफुल चल रहे थे। कई कॉलेज के छात्र सिर्फ गाने देखने के लिए थिएटर आते थे और गाने खत्म होते ही बाहर निकल जाते थे। उन्हें ठीक-ठीक पता होता था कि कौन-सा गाना किस समय आएगा।'
प्रेरणा और संगीत की पृष्ठभूमि
शो में जज और रैपर बादशाह ने आनंद से उनकी सदाबहार धुनों के पीछे की प्रेरणा के बारे में पूछा। आनंद ने बताया कि उनकी पहली प्रेरणा उनके पिता और प्रसिद्ध संगीतकार चित्रगुप्त थे।
उन्होंने कहा, '1960 का दशक हमारे लिए सबसे बड़ी प्रेरणा बना। एस.डी. बर्मन, मदन मोहन और कई महान संगीतकारों ने उस स्वर्णिम दौर में जो संगीत दिया, उसने हमें गहराई से प्रभावित किया।'
फिल्म की टीम और निर्देशक की भूमिका
आनंद के अनुसार, 'कयामत से कयामत तक' के लिए संगीत तैयार करना उनके लिए अपेक्षाकृत सहज रहा, क्योंकि पूरी टीम में संगीत को लेकर गहरी समझ थी। उन्होंने बताया कि निर्देशक मंसूर खान स्वयं ड्रम और पियानो बजाते थे, जिससे संवाद और सहयोग आसान हो गया।
उन्होंने जोड़ा, 'इस फिल्म में सब कुछ नया था — नया हीरो, नई हीरोइन और नए निर्देशक। जब किसी निर्देशक को संगीत की अच्छी समझ होती है, तो काम करना और भी आसान हो जाता है।'
चार दशक बाद भी जीवित है विरासत
गौरतलब है कि 'पापा कहते हैं', 'ऐ मेरे हमसफर' और 'गजब का है दिन' जैसे गीत आज भी श्रोताओं के बीच उतने ही लोकप्रिय हैं। यह किस्सा इस बात की याद दिलाता है कि उद्योग की पारंपरिक सोच हमेशा दर्शकों की असली नब्ज को नहीं पकड़ पाती। 'इंडियन आइडल' के मंच पर कंटेस्टेंट अंशिका चोंकर और तनिष्क शुक्ला की परफॉर्मेंस ने इस यादगार फिल्म की स्मृतियों को एक बार फिर ताज़ा कर दिया।