देवोलीना भट्टाचार्जी का 80वें स्वतंत्रता दिवस पर संदेश: 'देशप्रेम दिल में बसे, सिर्फ भाषणों में नहीं'
सारांश
मुख्य बातें
टेलीविजन अभिनेत्री देवोलीना भट्टाचार्जी ने 15 अगस्त 2026 को 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर एक भावपूर्ण संदेश साझा किया — उनका मानना है कि देशभक्ति केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि वह हर नागरिक के दिल में गहराई से बसनी चाहिए। अभिनेत्री ने यह भी बताया कि वे अपने बेटे जॉय को बचपन से ही आज़ादी के मूल्य और उसके पीछे की कुर्बानियों से परिचित करा रही हैं।
स्वतंत्रता दिवस का अर्थ
देवोलीना ने कहा, 'स्वतंत्रता दिवस हमें याद दिलाता है कि आज़ादी हमें मुफ्त में नहीं मिली, बल्कि इसे पाने के लिए कुर्बानी देनी पड़ी थी। यह उन लोगों को सम्मान देने का दिन भी है, जिन्होंने लड़ाई लड़ी ताकि हम इज़्ज़त और सम्मान के साथ जी सकें, खुलकर बोल सकें और बिना डर के सपने देख सकें और उन्हें पूरा कर सकें।'
उनके लिए यह दिन केवल उत्सव का नहीं, बल्कि अतीत को याद करने और वर्तमान जिम्मेदारियों को ईमानदारी से निभाने का अवसर है।
बेटे जॉय को दे रही हैं संस्कार
एक माँ की भूमिका में देवोलीना ने बताया कि वे अपने बेटे जॉय को स्वतंत्रता दिवस मनाना सिखा रही हैं। उन्होंने कहा, 'छोटे-छोटे हाथों में तिरंगा झंडा लहराना, राष्ट्रगान सुनना, माहौल को महसूस करना और आज़ादी के बारे में आसान शब्दों में समझना — ये सारे पल बच्चों के दिल में गर्व और शुक्रिया का भाव पैदा करते हैं।'
अभिनेत्री का दृढ़ विश्वास है कि यदि बचपन से ही ये संस्कार दिए जाएँ, तो देश से प्यार महज़ एक औपचारिकता नहीं रहेगी — वह बच्चे के स्वभाव का हिस्सा बन जाएगी।
भारतीय होने का अर्थ
देवोलीना के अनुसार, भारतीय होने का मतलब केवल एक भूगोल से नहीं, बल्कि दयालुता, हिम्मत और एकता के मूल्यों से है। वे चाहती हैं कि जॉय इन्हीं मूल्यों को आत्मसात करते हुए बड़ा हो।
यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में 80वाँ स्वतंत्रता दिवस हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है और कई著名 हस्तियाँ अपने-अपने तरीके से देशप्रेम का संदेश दे रही हैं।
देवोलीना का टेलीविजन सफर
देवोलीना भट्टाचार्जी को स्टार प्लस के शो 'साथ निभाना साथिया' और 'साथ निभाना साथिया 2' में गोपी बहू की भूमिका के लिए व्यापक पहचान मिली। इसके अलावा वे 'बिग बॉस 13', 'बिग बॉस 14', 'छठी मैया की बिटिया' और 'दिल दियां गल्लां' जैसे शो में भी नज़र आ चुकी हैं।
उनका यह संदेश आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सार्थक दिशा की ओर इशारा करता है — जहाँ राष्ट्रप्रेम की जड़ें शब्दों से नहीं, संस्कारों से सींची जाती हैं।