दिव्या दत्ता: ओटीटी ने 40+ उम्र की महिलाओं को दिए मजबूत किरदार, बड़े पर्दे से भी बढ़ीं दर्शकों की उम्मीदें
सारांश
मुख्य बातें
अभिनेत्री दिव्या दत्ता ने 28 अक्टूबर 2026 को एक खास बातचीत में कहा कि ओटीटी प्लेटफॉर्म ने भारतीय मनोरंजन उद्योग में कहानी कहने के तरीके को बुनियादी रूप से बदल दिया है — खासकर महिला किरदारों के संदर्भ में, जिन्हें अब उम्र की सीमा से परे नई और बहुआयामी भूमिकाएँ मिल रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि ओटीटी पर बेहतर कंटेंट देखने के बाद दर्शकों की अपेक्षाएँ सिनेमाघरों से भी ऊँची हो गई हैं।
महिला किरदारों में क्रांतिकारी बदलाव
दिव्या दत्ता ने कहा, 'ओटीटी के आने के बाद कहानी कहने पर काफी जोर दिया जाने लगा है। अब ऐसी वास्तविक कहानियाँ सुनाई जा रही हैं, जिनसे लोग खुद को जोड़ सकें।' उन्होंने बताया कि 20, 30 या 40 साल से अधिक उम्र की महिलाओं के लिए अब ऐसे किरदार लिखे जा रहे हैं, जिनमें अभिनय की व्यापक गुंजाइश होती है। उनके अनुसार, 'पहले यह सोचना भी मुश्किल था कि इस उम्र की महिलाओं को किसी कहानी में मुख्य भूमिका मिल सकती है, लेकिन अब किरदारों में पहले के मुकाबले ज्यादा गहराई देखने को मिलती है।'
गौरतलब है कि बॉलीवुड में लंबे समय से यह प्रवृत्ति रही है कि अभिनेत्रियों की मुख्य भूमिकाएँ एक निश्चित उम्र के बाद सिकुड़ जाती थीं। ओटीटी ने इस पारंपरिक ढाँचे को चुनौती दी है।
इंसानी व्यवहार की वास्तविक परतें
अभिनेत्री ने यह भी रेखांकित किया कि ओटीटी ने मानवीय स्वभाव को अधिक प्रामाणिक रूप से दिखाने का अवसर दिया है। उनके शब्दों में, 'किसी मुश्किल परिस्थिति में हर इंसान की प्रतिक्रिया अलग हो सकती है। गुस्सा करना या गलती कर बैठना किसी व्यक्ति को पूरी तरह अच्छा या बुरा नहीं बना देता।' दिव्या का मानना है कि ओटीटी ने किरदारों में इन्हीं जटिल पहलुओं को जगह दी है और उच्च गुणवत्ता की लेखनी को प्रोत्साहन मिला है।
यह ऐसे समय में आया है जब भारतीय ओटीटी उद्योग वैश्विक स्तर पर पहचान बना रहा है और सामग्री में विविधता की माँग लगातार बढ़ रही है।
दर्शकों की बदलती पसंद और स्वतंत्रता
दिव्या दत्ता ने ओटीटी की एक प्रमुख खूबी यह बताई कि दर्शक अपनी सुविधा, समय और पसंद के अनुसार कंटेंट देख सकते हैं — चाहे अकेले हों या परिवार के साथ। उनके अनुसार, 'जब दर्शकों को इस तरह की स्वतंत्रता मिलती है, तो मनोरंजन की दुनिया में भी बदलाव आता है।' यह उपभोक्ता व्यवहार में आया वह परिवर्तन है जो पारंपरिक टेलीविजन और सिनेमा के प्रतिमान को पुनर्परिभाषित कर रहा है।
सिनेमाघरों से भी बढ़ी दर्शकों की अपेक्षाएँ
अभिनेत्री ने एक महत्त्वपूर्ण बात यह कही कि ओटीटी पर गहरी और वास्तविक कहानियाँ देखने के बाद दर्शक अब बड़े पर्दे पर भी उतनी ही गहराई और प्रामाणिकता की माँग करते हैं। 'पहले इस तरह की उम्मीद कम देखने को मिलती थी, लेकिन अब यह दर्शकों की पसंद का हिस्सा बन गई है' — दिव्या ने इस बदलाव को सकारात्मक करार दिया।
आलोचकों का भी मानना है कि ओटीटी ने भारतीय दर्शकों की 'कंटेंट लिटरेसी' को बढ़ाया है, जिससे फिल्म निर्माताओं पर भी बेहतर स्क्रीनप्ले और मजबूत किरदारों की माँग का दबाव बढ़ा है। आने वाले वर्षों में यह प्रतिस्पर्धा भारतीय सिनेमा की समग्र गुणवत्ता को नई ऊँचाइयों पर ले जा सकती है।