दुर्गा खोटे पुण्यतिथि: पहली फिल्म के बाद घर से निकलना हुआ दूभर, फिर 200 फिल्मों की दिग्गज बनीं
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय सिनेमा की अग्रणी अभिनेत्री दुर्गा खोटे की आज 22 सितंबर को पुण्यतिथि है। उन्होंने उस दौर में हिंदी और मराठी फिल्मों में अपनी जगह बनाई, जब सम्मानित घरानों की महिलाओं का फिल्म इंडस्ट्री में प्रवेश करना समाज की दृष्टि में अस्वीकार्य था। पाँच दशकों से अधिक लंबे करियर में उन्होंने लगभग 200 फिल्मों में अभिनय किया और दादा साहेब फाल्के पुरस्कार सहित कई प्रतिष्ठित सम्मान अर्जित किए।
संघर्ष से सफलता तक का सफर
दुर्गा खोटे का जन्म 14 जनवरी 1905 को मुंबई में हुआ था। उनका मूल नाम वीटा लाड था। बचपन से ही पिता के साथ नाटक देखने की आदत ने उनके भीतर अभिनय और रंगमंच के प्रति गहरी रुचि जगाई। कम उम्र में उनका विवाह विश्वनाथ खोटे से हुआ और दो पुत्रों की माँ बनने के कुछ वर्षों बाद, मात्र 21 वर्ष की आयु में वे विधवा हो गईं। परिवार की आर्थिक ज़िम्मेदारी निभाने के लिए उन्होंने फिल्मों में काम करने का साहसी निर्णय लिया — यह उस समय परंपरागत समाज की मान्यताओं के विरुद्ध जाना था।
पहली फिल्म और समाज की नाराज़गी
1931 में प्रदर्शित फिल्म 'फरेबी जाल' से दुर्गा खोटे का फिल्मी सफर आरंभ हुआ, किंतु यह फिल्म दर्शकों को रास नहीं आई। उनकी आत्मकथा 'मी दुर्गा खोटे' के अनुसार, उस समय लाड और खोटे परिवार महाराष्ट्रीयन समाज में प्रतिष्ठित माने जाते थे, और एक महिला का फिल्मों में जाना पहले से ही चर्चा का विषय था। फिल्म की विफलता के बाद समाज के एक वर्ग की नाराज़गी इस हद तक बढ़ी कि उनके लिए घर से बाहर कदम रखना भी कठिन हो गया।
करियर को मिली असली दिशा
विपरीत परिस्थितियों के बावजूद दुर्गा खोटे ने हार नहीं मानी। 1932 में उन्होंने मराठी सिनेमा की महत्त्वपूर्ण फिल्म 'अयोध्येचा राजा' में तारामती का किरदार निभाया, जिसने उनकी पहचान को नई दिशा दी। इसके बाद 'माया मच्छिंद्र', 'अमर ज्योति', 'भारत मिलाप', 'सीता' और 'पृथ्वी वल्लभ' जैसी फिल्मों में उनके अभिनय ने उन्हें धीरे-धीरे एक सम्मानित कलाकार के रूप में स्थापित किया। यह ऐसे समय में आया जब हिंदी और मराठी सिनेमा अपनी पहचान बना रहा था।
यादगार भूमिकाएँ और पुरस्कार
दुर्गा खोटे की सबसे चर्चित भूमिकाओं में 'मुगल-ए-आजम' में जोधाबाई का किरदार आज भी दर्शकों के ज़हन में ताज़ा है। इसके अलावा 'भरत मिलाप' में कैकेयी, 'बिदाई', 'बावर्ची', 'बॉबी', 'अभिमान' और 'करज' में उनके किरदार भी अविस्मरणीय रहे। फिल्म 'बिदाई' के लिए उन्हें फिल्मफेयर बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस अवॉर्ड से नवाज़ा गया। 1968 में उन्हें पद्मश्री और 1983 में भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। भारत सरकार के डायरेक्टरेट ऑफ फिल्म फेस्टिवल के अभिलेखों में भी उनका नाम 1983 के दादा साहेब फाल्के पुरस्कार विजेता के रूप में दर्ज है।
अभिनय से परे योगदान और विरासत
दुर्गा खोटे ने अपने आप को केवल अभिनय तक सीमित नहीं रखा। 1937 में उन्होंने फिल्म 'साथी' का निर्माण और निर्देशन भी किया — एक ऐसे युग में जब महिला निर्माता-निर्देशक लगभग अनसुना था। बाद के वर्षों में उन्होंने विज्ञापन, वृत्तचित्र (डॉक्यूमेंट्री) और टेलीविज़न परियोजनाओं में भी अपना योगदान दिया। उनकी अंतिम फिल्म 'दौलत के दुश्मन' 1983 में प्रदर्शित हुई। 22 सितंबर 1991 को 86 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ। उनकी यात्रा भारतीय सिनेमा में महिलाओं के संघर्ष और हौसले की प्रतीक बनी हुई है।