गैरी संधू का संघर्ष: डिपोर्टेशन और बैन के बावजूद मिली सफलता, जानिए उनकी कहानी
सारांश
Key Takeaways
- संघर्ष: गैरी संधू ने जीवन में कई बाधाओं का सामना किया।
- प्रेरणा: उनकी कहानी हमें सिखाती है कि कभी हार नहीं माननी चाहिए।
- संगीत में रुचि: गैरी ने संगीत की ओर रुझान रखकर अपने करियर की शुरुआत की।
- सफलता: डिपोर्टेशन के बावजूद उन्होंने अपने गाने से पहचान बनाई।
- परिवार का समर्थन: उनकी मां का हौसला ही उनकी ताकत रहा।
मुंबई, 3 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। कहते हैं, भाग्य से बड़ा कुछ भी नहीं होता है। जो कुछ भी भाग्य में लिखा होता है, वह अवश्य मिलता है और भाग्य उसी के अनुसार रास्ते भी खोलता है। यही कुछ खास गैरी संधू के साथ घटित हुआ।
गैरी संधू कभी भी सिंगर बनने का सपना नहीं देखते थे। उन्होंने घर में अन्य सिंगर्स के गाने सुनते हुए धीरे-धीरे संगीत के प्रति अपनी रुचि विकसित की। आज, वे एक वैश्विक सिंगर बनकर अपने फैंस के दिलों में राज कर रहे हैं। 4 अप्रैल को सिंगर अपना 42वां जन्मदिन मनाएंगे।
जालंधर के रुरका कलां गाँव के निवासी गैरी संधू पढ़ाई में कमजोर थे और उनके पिता एक ड्राइवर थे। परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, जिसके कारण उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। इस सब को देखते हुए, गैरी ने गायन में करियर बनाने का मन बनाया।
संधू ने घर में रेडियो पर गाने सुने और विभिन्न धार्मिक स्थलों पर गाते रहे। 13 साल की उम्र में उन्होंने गुरदीप सिंह से पंजाब के लोकगीत सीखे। बेहतर भविष्य और पैसे की तलाश में उन्होंने इंग्लैंड जाने का निर्णय लिया। 10वीं कक्षा के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़कर काम करने का रास्ता चुना।
इंग्लैंड में उन्होंने जीवन यापन के लिए विभिन्न काम किए और 2010 में अपना पहला गाना 'मैं नी पींदा' रिलीज किया। इस गाने ने पंजाबी वाइब और भांगड़ा स्टाइल के साथ फैंस को दीवाना बना दिया। लेकिन, 2011 में उन्हें भारत वापस भेज दिया गया और उन पर अवैध रूप से रहने के आरोप लगे।
भारत वापस आना गैरी के लिए एक बड़ा झटका था, क्योंकि उन्हें 8 साल का बैन भी लगा। भारत में रहकर वे डिप्रेशन का सामना करने लगे, लेकिन उनकी मां ने उन्हें हिम्मत दी। 2017 में जैस्मीन सैंडलस के साथ उनका गाना 'इलीगल वेपन' और 'बेबी' हिट रहा। इसके बाद उन्हें फिल्मों में गाने के कई ऑफर मिले, जैसे 'दे दे प्यार दे' के लिए 'हौली हौली' और 'स्ट्रीट डांसर 3D' में कई सफल गाने।