गीता दत्त पुण्यतिथि: गुरु दत्त ने बनाना चाही थी 'गौरी', पर अधूरी रह गई आवाज़ की मलिका की अभिनय-यात्रा
सारांश
मुख्य बातें
गीता दत्त — हिंदी सिनेमा की वह आवाज़ जिसने 1400 से अधिक गीतों में दर्द, प्रेम और जीवन के हर रंग को अमर कर दिया — की आज पुण्यतिथि है। 20 जुलाई 1972 को मात्र 41 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ था, लेकिन 'बाबूजी धीरे चलना', 'वक्त ने किया क्या हसीं सितम' और 'मेरा सुंदर सपना बीत गया' जैसे कालजयी गीत आज भी करोड़ों दिलों में गूँजते हैं। उनकी कहानी केवल एक महान गायिका की नहीं, बल्कि एक ऐसी कलाकार की भी है जिसका अभिनेत्री बनने का सपना एक अधूरी फिल्म के साथ हमेशा के लिए अटक गया।
संगीत की शुरुआत: बंगाल से मुंबई तक का सफर
गीता दत्त का जन्म 23 नवंबर 1930 को बंगाल के एक जमींदार परिवार में हुआ था। दस भाई-बहनों में से एक गीता का बचपन से ही मन पढ़ाई से अधिक संगीत में रमता था। परिवार ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और विधिवत संगीत-शिक्षा दिलाई।
1942 में परिवार मुंबई आ गया और यहीं से गीता की किस्मत बदली। एक दिन घर में रियाज़ के दौरान संगीतकार के. हनुमान प्रसाद ने उनकी आवाज़ सुनी और प्रभावित होकर महज 16 वर्ष की आयु में उन्हें फिल्म 'भक्त प्रह्लाद' में गाने का अवसर दिया।
रातोंरात मिली पहचान और स्वर्णिम दौर
1947 में फिल्म 'दो भाई' का गीत 'मेरा सुंदर सपना बीत गया' जबरदस्त लोकप्रिय हुआ और गीता दत्त रातोंरात हिंदी सिनेमा की चर्चित गायिका बन गईं। 1950 के दशक में वह सबसे माँग वाली आवाज़ों में शुमार थीं। उन्होंने एस.डी. बर्मन, ओ.पी. नैय्यर और हेमंत कुमार जैसे दिग्गज संगीतकारों के साथ काम किया। रोमांटिक हो, दर्द भरा हो या चंचल — हर मिज़ाज का गीत उनकी आवाज़ में ढलकर अलग ही रूप लेता था।
गुरु दत्त से मुलाकात और अभिनेत्री बनने का सपना
1951 की फिल्म 'बाजी' के दौरान गीता दत्त की मुलाकात निर्देशक गुरु दत्त से हुई। दोनों करीब आए और 1953 में विवाह कर लिया। शादी के बाद भी गीता ने गायकी जारी रखी और गुरु दत्त की फिल्मों — 'आर-पार', 'सीआईडी', 'प्यासा', 'कागज के फूल' तथा 'साहिब बीबी और गुलाम' — के लिए एक से बढ़कर एक यादगार गीत गाए।
गुरु दत्त केवल गीता की आवाज़ के नहीं, उनकी अभिनय-क्षमता के भी कायल थे। उन्होंने 1957 में फिल्म 'गौरी' की परियोजना शुरू की — गीता दत्त की बतौर अभिनेत्री यह पहली बड़ी फिल्म होती। शूटिंग कोलकाता में शुरू हुई और योजना थी कि इसे हिंदी के साथ-साथ बंगाली और अंग्रेज़ी में भी बनाया जाए।
अधूरी रही 'गौरी' — टूटा एक सपना
लेकिन शूटिंग शुरू होने के कुछ ही दिनों बाद 'गौरी' का काम अचानक रुक गया। इसके बंद होने की वजह को लेकर अलग-अलग बातें सामने आईं, परंतु फिल्म दोबारा शुरू नहीं हो सकी। यह ऐसे समय में हुआ जब गीता दत्त अपने करियर के शिखर पर थीं — और यही कारण है कि 'गौरी' का अधूरा रहना हिंदी सिनेमा के सबसे मर्मांतक 'क्या हो सकता था' में गिना जाता है।
गौरतलब है कि गुरु दत्त के साथ रिश्तों में आई दूरियों और निजी संघर्षों ने धीरे-धीरे गीता की गायकी को भी प्रभावित किया। फिर भी 1971 में फिल्म 'अनुभव' के लिए उन्होंने 'मुझे जान न कहो मेरी जान', 'कोई चुपके से आके' और 'मेरा दिल जो मेरा होता' जैसे शानदार गीत गाए — यह उनकी अदम्य संगीत-प्रतिभा का प्रमाण था।
विरासत: 1400 गीत और एक अमर आवाज़
अपने करियर में गीता दत्त ने 1,400 से अधिक गीत गाए। उनके सम्मान में भारत सरकार ने उनके नाम पर डाक टिकट जारी किए। 20 जुलाई 1972 को उनका निधन हुआ, किंतु उनकी आवाज़ की विरासत आज भी अमिट है। आने वाली पीढ़ियाँ जब भी 'वक्त ने किया क्या हसीं सितम' सुनेंगी, गीता दत्त का नाम उनके होठों पर आएगा।