मात्र ₹90 मेहनताने ने बदली गिरिजा देवी की किस्मत, कैसे बनीं 'ठुमरी की रानी'
सारांश
मुख्य बातें
नई दिल्ली, 7 मई। भारतीय शास्त्रीय संगीत की विरासत में गिरिजा देवी का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। उनकी आवाज़ में भारतीय संगीत की आत्मा बसती थी, और ठुमरी को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठित करने का श्रेय उन्हीं को जाता है। एक ऐसे समय में जब समाज महिलाओं के सार्वजनिक प्रदर्शन को संदेह की दृष्टि से देखता था, गिरिजा देवी ने न केवल संगीत की राह अपनाई, बल्कि हर बाधा को पार करते हुए अपने को ऐसी ऊँचाई तक पहुँचाया कि देश उन्हें 'ठुमरी की रानी' के रूप में जानने लगा।
वह ₹90 का मोड़
बहुत कम लोग जानते हैं कि करियर की शुरुआत में ही एक छोटी-सी घटना ने गिरिजा देवी के भविष्य को निर्धारित कर दिया। साल 1949 में जब वह इलाहाबाद रेडियो के लिए ऑडिशन देने गईं, तो उनका प्रदर्शन करीब डेढ़ घंटे तक चला। राग देसी का ख्याल, ठुमरी और टप्पा गाने के बाद जब उन्हें पत्र मिला, तो उसमें ₹90 मेहनताना लिखा था। उस दौर में यह रकम केवल स्थापित और ख्यातिप्राप्त कलाकारों को दी जाती थी। यह पल गिरिजा देवी के लिए एक संकेत था कि रेडियो ने उन्हें सीधे शीर्ष कलाकारों की श्रेणी में स्वीकार कर लिया है।
संगीत की शुरुआत: परिवार का समर्थन
गिरिजा देवी का जन्म 8 मई 1929 को वाराणसी के एक ग्रामीण क्षेत्र में हुआ था। उनके पिता रामदेव राय एक जमींदार और संगीत प्रेमी थे, जो स्वयं संगीत का अभ्यास करते थे और नियमित रूप से बनारस की संगीत सभाओं में जाते थे। बालिका गिरिजा भी पिता के साथ इन आयोजनों में शामिल होती थीं, जहाँ उनका संगीत के प्रति झुकाव गहरा होता गया। अपनी बेटी की प्रतिभा को पहचानते हुए, रामदेव राय ने सामाजिक प्रतिरोध के बावजूद उसे औपचारिक संगीत शिक्षा देने का साहस किया।
मात्र पाँच वर्ष की आयु में ही गिरिजा ने अपने गुरु पंडित सरजू प्रसाद मिश्रा के अंतर्गत संगीत सीखना शुरू कर दिया। उन्हें ख्याल, टप्पा और अन्य शास्त्रीय शैलियों की शिक्षा दी गई। बचपन से ही वह घंटों साधना करती थीं। हालाँकि घर के कुछ सदस्य — विशेषकर माता और दादी — चाहती थीं कि वह परंपरागत गृहस्थी के कर्तव्यों पर ध्यान दें। किंतु पिता का निरंतर समर्थन और प्रोत्साहन उनका सबसे बड़ा बल बना। जब भी गिरिजा कोई नया राग आत्मसात करती थीं, पिता उन्हें गुड़िया जैसे उपहार से पुरस्कृत करते थे — यह प्रेम ही उनके आत्मविश्वास की नींव बना।
विवाह के बाद भी संगीत की निरंतरता
1944 में गिरिजा देवी का विवाह मधुसूदन जैन नामक व्यापारी से हुआ, जो उनसे आयु में काफ़ी बड़े थे। विवाह के बाद भी उनकी संगीत यात्रा अवरुद्ध नहीं हुई। उनके पति ने न केवल उनके संगीत को प्रोत्साहित किया, बल्कि उन्हें आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त किया। बाद में गिरिजा देवी ने श्रीचंद मिश्रा से भी संगीत की उन्नत शिक्षा ली, जिससे उनकी गायकी में और गहराई आ गई।
मंच पर प्रथम विजय
1949 के इलाहाबाद रेडियो ऑडिशन के बाद, गिरिजा देवी का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव 1951 में आया, जब उन्होंने बिहार के आरा में अपना पहला बड़ा मंचीय कार्यक्रम प्रस्तुत किया। उस आयोजन में उपस्थित प्रतिष्ठित कलाकारों और संगीत रसिकों ने उनकी आवाज़ की भूरि-भूरि प्रशंसा की। इसके पश्चात धीरे-धीरे उनकी ख्याति पूरे भारत में फैलने लगी।
ठुमरी को नई पहचान
गिरिजा देवी ने ठुमरी, दादरा, कजरी, चैती और होरी जैसी लोकप्रिय और क्षेत्रीय संगीत शैलियों को शास्त्रीय मंच पर प्रतिष्ठित किया। उनकी गायकी में बनारस और पूर्वी उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक परंपरा और भावुकता स्पष्ट रूप से प्रतिध्वनित होती थी। उन्होंने इन विधाओं को इतनी ऊँचाई तक ले जाया कि वे शास्त्रीय संगीत का अभिन्न अंग बन गईं। यही कारण है कि उन्हें 'ठुमरी की रानी' की उपाधि मिली।
सम्मान और विरासत
गिरिजा देवी को उनके असाधारण योगदान के लिए देश के सर्वोच्च सम्मानों से नवाज़ा गया। उन्हें 1972 में पद्मश्री, 1977 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1989 में पद्म भूषण और 2016 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। अपने जीवन के अंतिम दशकों में उन्होंने संगीत शिक्षण पर भी ध्यान दिया, नई पीढ़ी को भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपरा से जोड़े रखा।
विरासत जो अमर रही
24 अक्टूबर 2017 को हृदयगति रुक जाने से गिरिजा देवी का निधन हो गया। किंतु उनकी आवाज़, उनकी ठुमरी, और उनका संगीत आज भी लाखों श्रोताओं के हृदय में जीवंत है। एक महिला जिसने सामाजिक पूर्वाग्रहों को चुनौती दी और संगीत को अपनी पहचान बनाया, वह केवल एक कलाकार नहीं, बल्कि एक प्रतीक बन गई — उन सभी के लिए जो अपने सपनों के पीछे भागने का साहस रखते हैं।