'है जवानी तो इश्क होना है' रिव्यू (4.5/5): वरुण धवन की धमाकेदार कॉमेडी, डेविड धवन का क्लासिक मसाला फॉर्मूला
सारांश
मुख्य बातें
'है जवानी तो इश्क होना है' में निर्देशक डेविड धवन एक बार फिर अपने आज़माए हुए मसाला फॉर्मूले के साथ लौटे हैं — और इस बार नतीजा भरपूर मनोरंजन से भरा है। गलतफहमियों, पारिवारिक उथल-पुथल और बेलगाम कॉमेडी से लबालब यह फिल्म ठीक वही देती है जिसका वादा उसका टाइटल करता है।
कहानी और पटकथा
फिल्म की पटकथा यूनुस सजावल ने लिखी है और संवाद फरहाद सामजी के हैं, जबकि कहानी स्वयं डेविड धवन की है। केंद्र में है 'जस' — एक सीधा-सादा, बिना सोचे-समझे काम करने वाला इंसान, जो एक के बाद एक हास्यपूर्ण मुसीबतों में फंसता चला जाता है। उसकी अलग हो चुकी पत्नी 'बानी' और अचानक जिंदगी में दाखिल होने वाली 'प्रीत' के बीच उसकी उलझन कहानी को आगे बढ़ाती है।
जो शुरुआत रिलेशनशिप ड्रामा के रूप में होती है, वह जल्द ही गलतफहमियों, छुपे हुए रहस्यों और हास्यपूर्ण परिस्थितियों की एक के बाद एक शृंखला में तब्दील हो जाती है। कहानी का तर्क कभी-कभी कमज़ोर पड़ता है, लेकिन फिल्म की गति इतनी तेज़ है कि दर्शकों को रुककर सोचने का मौका ही नहीं मिलता।
अभिनय और परफॉर्मेंस
वरुण धवन 'जस' के किरदार में पूरी तरह रमे हुए हैं। उनकी कॉमिक टाइमिंग, अथक ऊर्जा और स्वाभाविक स्क्रीन उपस्थिति फिल्म की रीढ़ है। वे डेविड धवन की कॉमेडी की लय को सहज रूप से समझते हैं और दर्शकों को शुरू से अंत तक बांधे रखते हैं।
मृणाल ठाकुर 'बानी' के किरदार में भावनात्मक गहराई और अपनापन लाती हैं। चारों ओर मचती अफरातफरी के बीच उनका किरदार दर्शकों को अपना-सा लगता है और वरुण के साथ उनकी केमिस्ट्री बेहद सहज है। पूजा हेगड़े 'प्रीत' के रूप में आत्मविश्वास और ग्लैमर का परफेक्ट मिश्रण पेश करती हैं — जब भी वे स्क्रीन पर आती हैं, माहौल में जान आ जाती है।
सहायक कलाकारों में मनीष पॉल सबसे ज़्यादा प्रभावित करते हैं और कई ऐसे पल रचते हैं जो थिएटर में ज़ोरदार ठहाके छोड़ते हैं। जिमी शेरगिल, चंकी पांडे, कुब्रा सैत, राकेश बेदी और मौनी रॉय भी इस पागलपन भरे माहौल में अपना-अपना रंग जोड़ते हैं।
संवाद और हास्य
फरहाद सामजी के संवाद फिल्म के मनोरंजन-स्तर को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। पंचलाइनें धारदार हैं, सिचुएशनल कॉमेडी काम करती है और कई वन-लाइनर्स सीधे दर्शकों की तालियाँ बटोरते हैं। फिल्म पुराने बॉलीवुड हास्य की परंपरा को थामे रखती है, साथ ही आज के दर्शकों के स्वाद के अनुसार उसे हल्का-सा अपडेट भी करती है।
संगीत और तकनीकी पक्ष
फिल्म का संगीत उसके उत्साही मिज़ाज से पूरी तरह मेल खाता है। रंग-बिरंगा प्रोडक्शन डिज़ाइन और चमकदार विज़ुअल्स फिल्म के उत्सवी अंदाज़ को और उभारते हैं। डेविड धवन ने अधिकांश हिस्सों में कहानी की रफ्तार तेज़ रखी है, जिससे फिल्म कहीं भी ठहरती नहीं।
कमियाँ और निष्कर्ष
कॉमेडी के कुछ दृश्य थोड़े खिंचे हुए लगते हैं और कुछ परिस्थितियों में दर्शकों को तर्क को पूरी तरह किनारे रखना पड़ता है। लेकिन यह फिल्म यथार्थवाद का दावा नहीं करती — यह शुद्ध मनोरंजन का वादा करती है और उसे पूरा करती है।
'है जवानी तो इश्क होना है' उन दर्शकों के लिए है जो बड़े पर्दे पर निर्बाध हँसी, मसाला और क्लासिक बॉलीवुड का जादू चाहते हैं। लॉजिक की तलाश में आए तो निराशा होगी — लेकिन मनोरंजन की तलाश में आए तो यह फिल्म खाली हाथ नहीं जाने देगी।