लता मंगेशकर जयंती: 5 साल में पकड़ी सुर की गलती, ऐसे बना संगीत का महासफर
सारांश
मुख्य बातें
स्वरकोकिला लता मंगेशकर का जन्म 28 सितंबर 1929 को मध्य प्रदेश के इंदौर में हुआ था — और उनके संगीत की नींव महज 5 साल की उम्र में उस दिन पड़ी, जब उन्होंने अपने पिता के एक शिष्य की सुर की गलती पकड़कर उसे सही राग सुनाया। सात दशकों से अधिक के करियर में हज़ारों गाने गाने वाली लता की यह यात्रा एक साधारण-सी पारिवारिक घटना से शुरू होकर भारतीय संगीत के इतिहास का सबसे चमकीला अध्याय बनी।
सुर की पहचान और पिता की नज़र
लता मंगेशकर ने एक पुराने साक्षात्कार में बताया था कि वह करीब 5 साल की थीं, जब उनके पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर का एक शिष्य घर में रियाज़ कर रहा था। लता को लगा कि वह शिष्य ठीक से नहीं गा रहा। उन्होंने उसे रोककर वही राग अपने पिता से सुने तरीके से गाकर सुनाया। जब पंडित दीनानाथ वापस लौटे तो उन्होंने बेटी से वही चीज़ दोबारा गाने को कहा — और अगले ही दिन से उन्होंने लता को विधिवत संगीत सिखाना शुरू कर दिया।
पंडित दीनानाथ मंगेशकर मराठी रंगमंच के जाने-माने कलाकार और शास्त्रीय गायक थे। घर में संगीत का वातावरण बचपन से ही रचा-बसा था। इसी माहौल में लता की श्रवण-शक्ति और सुर-समझ असाधारण रूप से विकसित हुई। गौरतलब है कि उनके परिवार में आशा भोसले, उषा मंगेशकर, मीना मंगेशकर और हृदयनाथ मंगेशकर भी आगे चलकर संगीत से जुड़े — यह परिवार भारतीय संगीत का एक सम्पूर्ण विद्यालय बन गया।
पिता की मृत्यु और संघर्ष का दौर
1942 में जब लता केवल 13 साल की थीं, तभी उनके पिता का निधन हो गया। परिवार की ज़िम्मेदारी अचानक उनके कंधों पर आ गई। इस कठिन समय में परिवार के करीबी मास्टर विनायक ने उन्हें अभिनय और गायन दोनों में आगे बढ़ने में सहयोग किया।
लता का पहला रिकॉर्ड किया गया गाना 1942 की मराठी फिल्म 'किती हसाल' के लिए था, लेकिन वह गाना फिल्म के अंतिम संस्करण में शामिल नहीं हो पाया। इसके बाद उन्होंने कुछ और मराठी गाने रिकॉर्ड किए। 1945 के आसपास वह मुंबई पहुँचीं और उस्ताद अमान अली खान सहित कई बड़े गुरुओं से शास्त्रीय संगीत की गहन साधना की।
करियर का सुनहरा मोड़
1949 की फिल्म 'महल' का गाना 'आएगा आनेवाला' लता के करियर का निर्णायक पड़ाव बना। इस गाने ने उनकी आवाज़ को पूरे देश में एक अलग पहचान दिलाई और वह हिंदी सिनेमा की सर्वाधिक माँग वाली पार्श्वगायिकाओं में शामिल हो गईं।
उन्होंने नौशाद, मदन मोहन, एस.डी. बर्मन, अनिल बिस्वास, सी. रामचंद्र, खय्याम और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे दिग्गज संगीतकारों के साथ काम किया। मोहम्मद रफी और किशोर कुमार के साथ उनके युगल गाने भी भारतीय संगीत की अमूल्य धरोहर बन चुके हैं।
राष्ट्रीय चेतना की आवाज़
1963 में नई दिल्ली के रामलीला मैदान में लता ने 'ऐ मेरे वतन के लोगों' गाया, जो 1962 के भारत-चीन युद्ध में शहीद सैनिकों को समर्पित था। इस गाने को सुनकर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की आँखें भर आई थीं — यह गाना आज भी देशभक्ति का पर्याय माना जाता है।
पुरस्कार और विरासत
लता मंगेशकर को 1969 में पद्म भूषण, 1989 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार, 1999 में पद्म विभूषण और 2001 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाज़ा गया। उन्होंने तीन बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ महिला पार्श्वगायिका) जीता। 2007 में फ्रांस ने उन्हें अपने प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ऑफिसर ऑफ लीजन ऑफ ऑनर से सम्मानित किया।
जनवरी 2022 में कोविड-19 से संक्रमित होने के बाद उन्हें मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया। करीब एक महीने के उपचार के बाद 6 फरवरी 2022 को 92 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उनकी आवाज़ की विरासत पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।