निशिकांत कामत: 'दृश्यम' से 'मदारी' तक का सफर, अमिताभ को निर्देशित करने का सपना रहा अधूरा
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी और मराठी सिनेमा को नई दिशा देने वाले निर्देशक-अभिनेता निशिकांत कामत उन विरले फिल्मकारों में से थे, जिन्होंने अपेक्षाकृत छोटे करियर में ऐसी फिल्में दीं जो दर्शकों के जेहन में स्थायी छाप छोड़ गईं। 'दृश्यम', 'मदारी', 'मुंबई मेरी जान' और 'फोर्स' जैसी फिल्मों के ज़रिए उन्होंने मनोरंजन और सामाजिक यथार्थ का ऐसा संगम रचा, जो हिंदी सिनेमा में दुर्लभ है। 17 अगस्त 2020 को महज 50 वर्ष की आयु में उनके निधन के साथ एक बड़ा सपना भी अधूरा रह गया — अपने आदर्श अमिताभ बच्चन को निर्देशित करने का सपना।
बचपन से थिएटर तक का सफर
निशिकांत कामत का जन्म 17 जून 1970 को महाराष्ट्र के दादर में हुआ था। बचपन से ही उनके मन में सिनेमा के प्रति गहरा आकर्षण था और अमिताभ बच्चन की लगभग हर फिल्म वह बड़े चाव से देखते थे। पढ़ाई के दौरान उनका रुझान थिएटर की ओर बढ़ा। एक बार वह महज एक नाटक की रिहर्सल देखने पहुँचे थे, लेकिन संयोग से उन्हें मंच पर खड़े होने का अवसर मिल गया — और यहीं से उनके थिएटर के सफर की शुरुआत हो गई। धीरे-धीरे यह शौक जुनून में तब्दील हो गया।
एडिटर से निर्देशक तक
थिएटर में सक्रिय रहते हुए उनका झुकाव फिल्म निर्माण की ओर बढ़ा। शुरुआती दौर में उन्होंने दूरदर्शन के एक मराठी धारावाहिक में सहायक के रूप में काम किया, जहाँ उन्हें एडिटिंग की बारीकियाँ सीखने का मौका मिला। महज 22 वर्ष की आयु में वह एडिटर बन गए। 24 वर्ष की उम्र में उन्हें पहली बार निर्देशन का अवसर मिला, जिसके बाद उन्होंने टेलीविज़न छोड़कर पटकथा लेखन की राह चुनी और कई वर्षों तक स्क्रिप्ट राइटिंग में खुद को तराशते रहे।
राष्ट्रीय पुरस्कार से हिंदी सिनेमा तक
साल 2005 में उन्होंने मराठी फिल्म 'डोम्बीवली फास्ट' का निर्देशन किया, जो उस वर्ष की सर्वाधिक सफल मराठी फिल्मों में शामिल रही। दर्शकों और समीक्षकों दोनों की भरपूर सराहना पाने वाली इस फिल्म को सर्वश्रेष्ठ मराठी फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। मराठी सिनेमा में यह सफलता उनके हिंदी फिल्मों की ओर कदम बढ़ाने की नींव बनी।
साल 2008 में आई 'मुंबई मेरी जान' ने 2006 के मुंबई ट्रेन धमाकों के बाद आम लोगों की ज़िंदगी पर पड़े गहरे असर को बेहद संवेदनशीलता से परदे पर उतारा। इसके बाद 'फोर्स', 'दृश्यम', 'रॉकी हैंडसम' और 'मदारी' जैसी फिल्मों ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर एक विश्वसनीय निर्देशक के रूप में स्थापित किया। विशेष रूप से 'दृश्यम' उनके करियर की सर्वाधिक चर्चित फिल्म बनी।
अभिनेता के रूप में भी छाप
निशिकांत कामत केवल निर्देशक ही नहीं, एक सशक्त अभिनेता भी थे। उन्होंने '404', 'रॉकी हैंडसम', 'डैडी', 'जूली 2' और 'भावेश जोशी' जैसी फिल्मों में अभिनय किया। 'रॉकी हैंडसम' में उनके द्वारा निभाए गए खलनायक के किरदार को दर्शकों ने खूब सराहा।
अधूरा सपना और विरासत
सफलता की तमाम ऊँचाइयाँ छूने के बावजूद उनके मन में एक अधूरी इच्छा हमेशा बनी रही — अमिताभ बच्चन को निर्देशित करने का सपना। बचपन से जिनकी फिल्में देखकर उन्होंने सिनेमा की भाषा समझी थी, उनके साथ काम करने की तमन्ना उनके दिल में हमेशा जीवित रही, लेकिन यह मौका कभी नहीं आया। 17 अगस्त 2020 को लंबे समय से लिवर की बीमारी से जूझने के बाद 50 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उनकी फिल्में आज भी उनकी जीवंत विरासत हैं।