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पल्लवी जोशी: डेली सोप्स ने टीवी को 'रोज़ खाने वाला राक्षस' बना दिया, रचनात्मकता पर पड़ा गहरा असर

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पल्लवी जोशी: डेली सोप्स ने टीवी को 'रोज़ खाने वाला राक्षस' बना दिया, रचनात्मकता पर पड़ा गहरा असर

सारांश

पल्लवी जोशी का यह बयान सिर्फ एक अभिनेत्री की शिकायत नहीं — यह उस पूरी व्यवस्था पर सवाल है जिसने भारतीय टेलीविजन को रचनात्मकता की जगह कंटेंट-फैक्ट्री में बदल दिया। डेली सोप्स से शुरू हुई यह दौड़ अब ओटीटी तक पहुँच रही है।

मुख्य बातें

पल्लवी जोशी ने कहा कि डेली सोप्स ने टेलीविजन को एक ऐसा 'राक्षस' बना दिया जिसे हर दिन नया कंटेंट चाहिए।
अब महीने में सिर्फ 15-16 दिनों में 4 एपिसोड की शूटिंग होती है — यानी एक दिन में करीब डेढ़ एपिसोड ।
पहले 28 दिनों के शो के लिए 24 दिन शूटिंग मिलती थी, अब वह समय घट गया है।
'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' की नकल में बने 10 और शो आने के बाद महिला किरदारों की भूमिका सिकुड़ने लगी।
पल्लवी के अनुसार ओटीटी की शुरुआत अच्छी थी, लेकिन उसकी दिशा अभी अनिश्चित है।
पल्लवी हाल ही में वेब सीरीज 'मारगाओ फाइल्स' में नज़र आई हैं।

अभिनेत्री और फिल्ममेकर पल्लवी जोशी ने 8 जुलाई 2026 को कहा कि डेली सोप्स के आगमन ने भारतीय टेलीविजन उद्योग की रचनात्मक नींव को हिला दिया है। उनके अनुसार, रोज़ाना प्रसारित होने वाले धारावाहिकों ने प्रोडक्शन शेड्यूल को इतना अव्यवस्थित कर दिया कि लेखकों और क्रिएटर्स की सोचने-समझने की क्षमता पर सीधा असर पड़ा।

'राक्षस' की तरह बन गया टेलीविजन

पल्लवी ने एक खास बातचीत में कहा, 'जब डेली सोप्स शुरू हुए, तो टेलीविजन एक ऐसे राक्षस की तरह बन गया, जिसे हर दिन कुछ नया देना पड़ता था।' उनके मुताबिक, साप्ताहिक कार्यक्रमों से रोज़ाना के प्रसारण की ओर इस बदलाव ने पूरी इंडस्ट्री को एक अंतहीन दौड़ में धकेल दिया। यह ऐसे समय में आया जब भारतीय टेलीविजन अपनी रचनात्मक पहचान बना रहा था।

शूटिंग शेड्यूल का गणित और दबाव

पल्लवी ने शूटिंग के बदलते गणित को विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा, 'पहले जहाँ 28 दिनों के शो के लिए करीब 24 दिन शूटिंग के मिलते थे, वहीं अब महीने में सिर्फ 15-16 दिनों में चार एपिसोड की शूटिंग करनी पड़ती है।' इसका सीधा मतलब यह है कि एक दिन में लगभग डेढ़ एपिसोड तैयार करना पड़ता है — एक ऐसा दबाव जो गुणवत्ता से समझौते की ओर ले जाता है।

लेखकों पर 'राइटर ब्लॉक' का संकट

अनुभवी अभिनेत्री के अनुसार, इस व्यस्त शेड्यूल का सबसे बुरा असर लेखकों पर पड़ा। उन्होंने कहा, 'लेखकों के लिए इतने सारे एपिसोड लिखना बहुत मुश्किल होता है। राइटर ब्लॉक जैसी समस्या भी होती है — ऐसे में उन्हें बस लगातार लिखते रहना पड़ता है।' नतीजतन, जब कोई नया विचार नहीं सूझता, तो पुराने और आजमाए हुए फॉर्मूले फिर से अपनाए जाने लगते हैं।

'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' और नकल का दौर

पल्लवी ने 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' की सफलता का उदाहरण देते हुए कहा कि यह शो शुरुआत में इसलिए खास था, क्योंकि दर्शकों को कुछ नया देखने को मिला था। लेकिन जब इसी फॉर्मूले पर 10 और शो बनने लगे, तो महिलाओं की भूमिका सिकुड़ने लगी। उन्होंने कहा, 'उस समय तक पुरुष भी प्रोड्यूसर के तौर पर इस क्षेत्र में आने लगे थे, और जब आर्थिक पहलू जुड़ जाता है, तो चीजें बिगड़ने लगती हैं।'

ओटीटी की दिशा पर सवाल

मौजूदा मनोरंजन परिदृश्य पर टिप्पणी करते हुए पल्लवी ने कहा कि ओटीटी प्लेटफॉर्म्स भी इसी तरह की चुनौतियों के मुहाने पर खड़े हैं। उन्होंने कहा, 'ओटीटी की शुरुआत तो बहुत अच्छी हुई थी, लेकिन सच कहूँ तो अभी मुझे नहीं पता कि यह किस दिशा में जा रहा है।' गौरतलब है कि पल्लवी हाल ही में वेब सीरीज 'मारगाओ फाइल्स' में नज़र आई हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

वह आज ओटीटी पर भी दोहराता दिख रहा है। असली सवाल यह है कि जब कंटेंट की माँग गुणवत्ता से ऊपर हो जाती है, तो क्या कोई भी माध्यम — चाहे टीवी हो या ओटीटी — दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ रह सकता है?
RashtraPress
25 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पल्लवी जोशी ने डेली सोप्स के बारे में क्या कहा?
पल्लवी जोशी ने कहा कि डेली सोप्स ने टेलीविजन को एक ऐसे राक्षस की तरह बना दिया जिसे हर दिन नया कंटेंट चाहिए। उनके अनुसार इससे लेखकों और क्रिएटर्स पर अत्यधिक दबाव पड़ा और कंटेंट की गुणवत्ता प्रभावित हुई।
डेली सोप्स से पहले और बाद में शूटिंग शेड्यूल में क्या फर्क आया?
पल्लवी के अनुसार पहले 28 दिनों के शो के लिए करीब 24 दिन शूटिंग के मिलते थे। अब महीने में सिर्फ 15-16 दिनों में 4 एपिसोड की शूटिंग करनी पड़ती है, यानी एक दिन में लगभग डेढ़ एपिसोड।
'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' की सफलता का टीवी पर क्या असर पड़ा?
पल्लवी जोशी के अनुसार यह शो शुरुआत में इसलिए खास था क्योंकि दर्शकों को कुछ नया मिला था। लेकिन जब इसी फॉर्मूले पर 10 और शो बनने लगे, तो महिलाओं की भूमिका सिकुड़ने लगी और पुरुष प्रोड्यूसरों का दबदबा बढ़ गया।
पल्लवी जोशी ने ओटीटी के भविष्य पर क्या राय दी?
पल्लवी ने कहा कि ओटीटी की शुरुआत बहुत अच्छी थी, लेकिन अभी उन्हें नहीं पता कि यह किस दिशा में जा रहा है। उनके अनुसार ओटीटी भी डेली सोप्स जैसी ही चुनौतियों का सामना कर रहा है।
पल्लवी जोशी हाल ही में किस प्रोजेक्ट में नज़र आई हैं?
पल्लवी जोशी हाल ही में वेब सीरीज 'मारगाओ फाइल्स' में नज़र आई हैं। यह उनका ओटीटी पर हालिया काम है।
राष्ट्र प्रेस
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