11 अगस्त 2026
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पंचम दा आर.डी. बर्मन: बोतल, कांच और चाबियों से बनाते थे जादुई धुनें, जन्मदिन पर याद

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पंचम दा आर.डी. बर्मन: बोतल, कांच और चाबियों से बनाते थे जादुई धुनें, जन्मदिन पर याद

सारांश

बोतल में फूंक, कांच की टकराहट, चाबियों की खनखनाहट — पंचम दा के लिए हर आवाज़ एक धुन थी। 27 जून को उनके जन्मदिन पर याद करें उस संगीतकार को जिसने रोज़मर्रा की चीज़ों को सुरों में बदलकर हिंदी सिनेमा को एक नई भाषा दी।

मुख्य बातें

राहुल देव बर्मन (पंचम दा) का जन्म 27 जून 1939 को कोलकाता में हुआ था।
महज नौ वर्ष की उम्र में फिल्म 'फंटूश' के लिए धुन तैयार की।
फिल्म 'शोले' , 'यादों की बारात' , 'पड़ोसन' सहित कई फिल्मों में बोतल, कांच, चाबी और कंघी जैसी चीज़ों से संगीत बनाया।
1970-80 के दशक में राजेश खन्ना और किशोर कुमार के साथ दर्जनों कालजयी गीत दिए।
अंतिम फिल्म '1942: ए लव स्टोरी' के गीत बेहद लोकप्रिय हुए, लेकिन वे इसकी सफलता देखने से पहले 4 जनवरी 1994 को चल बसे।

महान संगीतकार राहुल देव बर्मन — जिन्हें पूरी दुनिया 'पंचम दा' के नाम से जानती है — ने हिंदी फिल्म संगीत को वह आयाम दिया जो पहले किसी ने नहीं सोचा था। उन्होंने साबित किया कि धुन केवल वाद्ययंत्रों की मोहताज नहीं होती — बोतल की फूंक, कांच की टकराहट और चाबियों की खनखनाहट भी संगीत बन सकती है। 27 जून 1939 को कोलकाता में जन्मे पंचम दा की यह रचनात्मक सोच उनके पूरे करियर की आत्मा रही।

बचपन से संगीत, नौ साल में पहली धुन

पंचम दा के पिता सचिन देव बर्मन स्वयं एक स्थापित संगीतकार थे, इसलिए संगीत का वातावरण उन्हें विरासत में मिला। महज नौ वर्ष की आयु में उन्होंने फिल्म 'फंटूश' के लिए धुन तैयार की, जिसमें 'ऐ मेरी टोपी पलट के आ' जैसे शुरुआती गीत शामिल थे। मुंबई आने के बाद उन्होंने अपने पिता के सहायक के रूप में काम शुरू किया और धीरे-धीरे एक स्वतंत्र संगीतकार के रूप में अपनी पहचान बनाई।

करियर का उदय: 'तीसरी मंजिल' से सुपरहिट तक

आर.डी. बर्मन को पहली बड़ी पहचान फिल्म 'तीसरी मंजिल' के गीत 'आजा आजा मैं हूं प्यार तेरा' से मिली, जिसने उन्हें एक आधुनिक और प्रयोगधर्मी संगीतकार के रूप में स्थापित किया। इसके बाद 'हरे रामा हरे कृष्णा' का 'दम मारो दम' और 'कटी पतंग' का 'ये शाम मस्तानी' जैसे गीतों ने उनकी लोकप्रियता को शिखर पर पहुंचाया।

1970 और 1980 के दशक में उनका स्वर्णिम दौर रहा। राजेश खन्ना और किशोर कुमार के साथ मिलकर उन्होंने एक के बाद एक यादगार गीत दिए — 'आराधना' का 'मेरे सपनों की रानी', 'अमर प्रेम' का 'चिंगारी कोई भड़के', 'कुदरत' का 'हमें तुमसे प्यार कितना', और 'अमर अकबर एंथनी' का 'पर्दा है पर्दा' — ये सभी आज भी श्रोताओं के दिलों में जीवित हैं।

रोज़मर्रा की चीज़ों से संगीत: पंचम दा का अनोखा प्रयोग

पंचम दा की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे स्टूडियो के बाहर की दुनिया से भी संगीत खींच लाते थे। फिल्म 'शोले' के मशहूर गीत 'महबूबा महबूबा' में उन्होंने बोतल में फूंक मारकर एक अनोखी लय तैयार की। 'यादों की बारात' के 'चुरा लिया है तुमने जो दिल को' में कांच की प्याली और चम्मच की टकराहट को संगीत में बदला। 'पड़ोसन' के 'एक चतुर नार' में कंघी और खुरदुरी सतह से ध्वनि निकालकर धुन गढ़ी गई। 'अगर तुम न होते' में चाबियों की खनखनाहट को रिदम का हिस्सा बनाया गया, और फिल्म 'किताब' में स्कूल की बेंच की आवाज़ को संगीत में पिरोया गया। इसके अलावा पानी, थाली और हवा जैसी सामान्य ध्वनियाँ भी उनके संगीत का अंग बनती रहीं।

ढलते दौर में भी अमर रचनाएँ

1980 के दशक के बाद उनके करियर में उतार आया, लेकिन इस दौर में भी उन्होंने 'सनम तेरी कसम' का 'शीशा हो या दिल हो', 'मासूम' का 'तुझसे नाराज नहीं जिंदगी', और 'गोलमाल' का 'आने वाला पल जाने वाला है' जैसे कालजयी गीत दिए। स्वास्थ्य बिगड़ने के बावजूद संगीत से उनका नाता कभी नहीं टूटा।

अंतिम उपहार: '1942: ए लव स्टोरी'

करियर के अंतिम पड़ाव पर फिल्म '1942: ए लव स्टोरी' ने उनकी प्रतिभा को एक बार फिर चमका दिया। 'एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा', 'कुछ न कहो', और 'रिमझिम रिमझिम' जैसे गीत अत्यंत लोकप्रिय हुए। दुर्भाग्यवश, वे इस सफलता के साक्षी नहीं बन सके — 4 जनवरी 1994 को उनका निधन हो गया। उनके जन्मदिन पर संगीत प्रेमी आज भी उन्हें उनकी अमर धुनों के ज़रिए याद करते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

एक दृष्टिकोण की विरासत है — कि संगीत के लिए महंगे उपकरण नहीं, एक जागरूक कान चाहिए। यह सोच आज के डिजिटल प्रोडक्शन युग में और भी प्रासंगिक हो जाती है, जब एल्गोरिदम धुनें तैयार कर रहे हैं। गौरतलब है कि उनके करियर के अंतिम दौर की उपेक्षा और फिर '1942: ए लव स्टोरी' की सफलता — जो उन्हें जीते-जी नहीं मिली — यह उद्योग की उस क्रूर प्रवृत्ति को उजागर करती है जो प्रतिभा को फैशन के पैमाने पर तौलती है।
RashtraPress
11 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पंचम दा कौन थे और उनका असली नाम क्या था?
पंचम दा का असली नाम राहुल देव बर्मन था। वे महान संगीतकार सचिन देव बर्मन के पुत्र थे और हिंदी फिल्म संगीत के सबसे प्रयोगधर्मी संगीतकारों में गिने जाते हैं।
आर.डी. बर्मन ने रोज़मर्रा की चीज़ों से संगीत कैसे बनाया?
आर.डी. बर्मन ने 'शोले' में बोतल में फूंक मारकर, 'यादों की बारात' में कांच की प्याली और चम्मच से, 'पड़ोसन' में कंघी से, और 'अगर तुम न होते' में चाबियों की आवाज़ से धुनें तैयार कीं। 'किताब' में स्कूल बेंच की आवाज़ को भी संगीत का हिस्सा बनाया।
पंचम दा की पहली बड़ी हिट फिल्म कौन सी थी?
पंचम दा को पहली बड़ी पहचान फिल्म 'तीसरी मंजिल' के गीत 'आजा आजा मैं हूं प्यार तेरा' से मिली। इसने उन्हें एक आधुनिक संगीतकार के रूप में स्थापित किया।
आर.डी. बर्मन का निधन कब हुआ?
आर.डी. बर्मन का निधन 4 जनवरी 1994 को हुआ। वे अपनी अंतिम फिल्म '1942: ए लव स्टोरी' की व्यापारिक सफलता देखने के लिए जीवित नहीं रहे।
पंचम दा की अंतिम फिल्म कौन सी थी और उसके गाने कितने लोकप्रिय हुए?
उनकी अंतिम फिल्म '1942: ए लव स्टोरी' थी, जिसके 'एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा' , 'कुछ न कहो' , और 'रिमझिम रिमझिम' जैसे गीत बेहद लोकप्रिय हुए। इस फिल्म ने उनके करियर को एक नई चमक दी, लेकिन इसकी सफलता उन्हें जीते-जी नहीं मिल सकी।
राष्ट्र प्रेस
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