अमित कुमार जन्मदिन विशेष: आरडी बर्मन के सामने थरथराती आवाज से शुरू हुआ सफर, 80 के दशक की सिग्नेचर आवाज बने
सारांश
मुख्य बातें
साल 1975 में बंबई के एक छोटे से म्यूजिक रूम में एक 23 वर्षीय नौजवान घबराहट से भरा खड़ा था। उसके सामने स्वयं आरडी बर्मन (पंचम दा) विराजमान थे और उनके साथ मन्ना डे तथा किशोर कुमार जैसी महान हस्तियाँ भी मौजूद थीं। पंचम दा के आग्रह पर उस नौजवान ने संकोच और काँपती आवाज में एक गीत सुनाया — वह नौजवान थे किशोर कुमार के ज्येष्ठ पुत्र अमित कुमार, जो आज अपना 73वाँ जन्मदिन मना रहे हैं।
विरासत में मिला संगीत और अभिनय
3 जुलाई 1952 को कलकत्ता में जन्मे अमित कुमार को संगीत और अभिनय दोनों विरासत में प्राप्त हुए। उनके पिता किशोर कुमार हिंदी सिनेमा के अप्रतिम पार्श्वगायक थे, जबकि माँ रूमा गुहा ठाकुरता प्रसिद्ध बंगाली अभिनेत्री और 'कलकत्ता यूथ चायर' की संस्थापक थीं। उनके परिवार का नाता फिल्म जगत की दिग्गज हस्तियों से रहा — उनकी सौतेली माताओं में मधुबाला, योगिता बाली और लीना चंदावरकर शामिल थीं, जबकि अभिनेत्री काजोल उनकी भतीजी हैं।
बचपन कोलकाता में बीता, जहाँ वे दुर्गा पूजा उत्सवों में गाते थे। ऐसे ही एक कार्यक्रम में महान बंगाली अभिनेता उत्तम कुमार ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और सराहा। जब माँ ने शिकायत की कि अमित केवल 'फिल्मी' गाने गाते हैं, तो किशोर कुमार उन्हें बंबई ले आए।
बाल कलाकार से पार्श्वगायक तक का सफर
बंबई आने से पहले ही अमित कुमार ने अपने पिता द्वारा निर्देशित फिल्म 'दूर गगन की छांव में' (1964) में बाल अभिनेता के रूप में काम किया था। इसके बाद मात्र 11 वर्ष की आयु में उन्होंने फिल्म 'दूर का राही' (1971) के लिए अपना पहला गीत "मैं पंछी मतवाला रे" रिकॉर्ड किया। यह वही नींव थी जिस पर बाद में उनका शानदार करियर खड़ा हुआ।
साल 1975 में आरडी बर्मन के समक्ष दिए गए उस पहले ऑडिशन ने उनके पेशेवर सफर की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने धीरे-धीरे बॉलीवुड में अपनी पहचान बनानी शुरू की।
रातोंरात मिली पहचान और ऐतिहासिक फिल्मफेयर मुकाबला
साल 1981 में रिलीज़ हुई फिल्म 'लव स्टोरी' का गीत "याद आ रही है" अमित कुमार के करियर का निर्णायक मोड़ बना — इस गीत ने उन्हें रातोंरात स्टार बना दिया। इस सफलता का सबसे यादगार क्षण 1982 के फिल्मफेयर अवार्ड्स में आया, जब बेस्ट मेल प्लेबैक सिंगर की श्रेणी में पिता किशोर कुमार और पुत्र अमित कुमार आमने-सामने थे। कड़े मुकाबले के बाद विजेता अमित कुमार घोषित हुए और किशोर कुमार ने गर्व से अपने बेटे को गले लगा लिया — हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास में यह दृश्य अविस्मरणीय बन गया।
1980 के दशक में अमित कुमार कुमार गौरव, अनिल कपूर और संजय दत्त जैसे युवा अभिनेताओं की सिग्नेचर आवाज बन गए। उनके प्रमुख गीतों में 'बड़े अच्छे लगते हैं', 'तेरी याद आ रही है', 'एक दो तीन', 'रोज़ रोज़ आँखों तले', 'उठे सबके कदम', 'तू रूठा तो मैं मान जाऊंगा', 'तिरछी टोपीवाले' और 'टिप टिप टिप टिप बारिश' शामिल हैं।
दो गुरुओं का जाना और नई राह
13 अक्टूबर 1987 को पिता किशोर कुमार के आकस्मिक निधन ने पूरी फिल्म इंडस्ट्री को स्तब्ध कर दिया। अमित कुमार ने इस गहरे आघात के बावजूद अपने पिता की अधूरी फिल्म 'ममता की छांव में' (1989) का निर्देशन संभाला और उसे पूरा किया — यह पिता के प्रति एक भावनात्मक श्रद्धांजलि थी। इसके बाद 4 जनवरी 1994 को उनके मार्गदर्शक आरडी बर्मन भी इस दुनिया से विदा हो गए।
दोनों गुरुओं के जाने के बाद अमित कुमार ने 1990 के मध्य में पार्श्वगायन से विराम लिया। उन्होंने अपनी संगीत कंपनी 'कुमार ब्रदर्स म्यूजिक' की स्थापना की और खुद को स्वतंत्र संगीत तथा विश्वव्यापी लाइव कॉन्सर्ट्स के लिए समर्पित कर दिया।
विरासत और आगे का सफर
अमित कुमार आज भी लाइव परफॉर्मेंस के ज़रिए अपने पिता और पंचम दा की धुनों को जीवित रखे हुए हैं। उनकी आवाज में वह पीढ़ी बोलती है जिसने 80 के दशक के रोमांस को परिभाषित किया। 73वें जन्मदिन पर उनका यह सफर — एक काँपते नौजवान से एक युग की सिग्नेचर आवाज तक — हिंदी सिनेमा के संगीत इतिहास का एक अनमोल अध्याय है।