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राहत इंदौरी: 'बुलाती है मगर जाने का नहीं' से अमर शायर, खेल के मैदान से मुशायरे तक का सफर

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राहत इंदौरी: 'बुलाती है मगर जाने का नहीं' से अमर शायर, खेल के मैदान से मुशायरे तक का सफर

सारांश

खेल के मैदान पर हॉकी-फुटबॉल टीम के कप्तान रहे राहत इंदौरी ने उर्दू शायरी को आम आदमी की ज़ुबान दी। 'बुलाती है मगर जाने का नहीं' जैसी पंक्तियों ने उन्हें इंटरनेट युग में भी अमर रखा। 11 अगस्त को उनकी पुण्यतिथि पर उनका वह सफर याद आता है जो मैदान से मुशायरे तक पहुँचा।

मुख्य बातें

राहत इंदौरी का जन्म 1 जनवरी 1950 को इंदौर, मध्य प्रदेश में हुआ; असली नाम राहत कुरैशी था।
शायरी से पहले उन्होंने स्कूल और कॉलेज स्तर पर हॉकी और फुटबॉल टीमों की कप्तानी की।
उनकी पंक्ति 'बुलाती है मगर जाने का नहीं' सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से वायरल हुई।
फिल्मी गीतों में 'नींद चुराई मेरी' , 'चोरी-चोरी जब नजरें मिलीं' , 'छन छन' और 'दिल को हजार बार रोका' शामिल हैं।
11 अगस्त 2020 को 70 वर्ष की उम्र में कोरोना संक्रमण के दौरान निधन हुआ।

उर्दू शायरी की दुनिया में राहत इंदौरी एक ऐसा नाम है जो आज भी करोड़ों दिलों में ज़िंदा है। उनकी मशहूर पंक्ति 'बुलाती है मगर जाने का नहीं' ने इंटरनेट के दौर में नई पीढ़ी को भी उनसे जोड़ा। 11 अगस्त 2020 को 70 वर्ष की उम्र में उनके निधन के बाद भी उनकी शायरी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी उनके जीवनकाल में थी।

इंदौर से मिली पहचान, राहत कुरैशी बने राहत इंदौरी

राहत इंदौरी का जन्म 1 जनवरी 1950 को मध्य प्रदेश के इंदौर में हुआ था। उनका वास्तविक नाम राहत कुरैशी था। इंदौर से उनका रिश्ता इतना गहरा था कि आगे चलकर उन्होंने अपने नाम के साथ 'इंदौरी' जोड़ लिया — और यही उनकी असली पहचान बन गई। इसी शहर की गलियों, लोगों और संस्कृति ने उनकी शायरी को वह ज़मीन दी जिस पर वह जीवनभर खड़े रहे।

शायरी से पहले खेल के मैदान के कप्तान

बहुत कम लोग जानते हैं कि शायरी की दुनिया में कदम रखने से पहले राहत इंदौरी एक उत्साही खिलाड़ी थे। एक इंटरव्यू में उन्होंने खुद बताया था — 'मैं शुरुआती दिनों में खुद को खिलाड़ी के तौर पर देखता था। मैं हॉकी और फुटबॉल दोनों खेलता था। मैंने स्कूल और कॉलेज के स्तर पर इन खेल टीमों की कप्तानी भी की। उस समय मेरे लिए मैदान सिर्फ खेलने की जगह नहीं था, बल्कि नेतृत्व सीखने की जगह भी था। टीम के दूसरे खिलाड़ियों के साथ खेलना, जिम्मेदारी संभालना और अपनी टीम को आगे ले जाना मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा बन चुका था। लेकिन, वक्त के साथ मेरा रुझान उर्दू साहित्य और शायरी की तरफ बढ़ा।' यह बदलाव हिंदी-उर्दू साहित्य के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ।

मुशायरों से फिल्मी दुनिया तक

उर्दू साहित्य में उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद राहत इंदौरी देश-विदेश के मुशायरों में छा गए। उनकी शायरी की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वह आम आदमी की भाषा में असाधारण बात कहते थे — चाहे मोहब्बत हो, समाज हो या व्यवस्था पर सवाल। उन्होंने फिल्मों के लिए भी कई यादगार गीत लिखे। उनके प्रमुख फिल्मी गीतों में 'इश्क' फिल्म का 'नींद चुराई मेरी', 'करीब' का 'चोरी-चोरी जब नजरें मिलीं', 'मुन्ना भाई एमबीबीएस' का 'छन छन' और 'मर्डर' फिल्म का 'दिल को हजार बार रोका' शामिल हैं।

इंटरनेट युग में नई पीढ़ी से जुड़ाव

सोशल मीडिया के दौर में उनकी दशकों पुरानी शायरी को एक नई उम्र मिली। 'बुलाती है मगर जाने का नहीं' जैसी पंक्तियाँ मीम्स और वायरल पोस्ट के ज़रिए युवाओं तक पहुँचीं। यह ऐसे समय में आया जब उर्दू शायरी को 'पुराने ज़माने की विधा' समझा जाने लगा था। राहत इंदौरी ने साबित किया कि असली शब्दों की कोई उम्र नहीं होती। गौरतलब है कि यह लोकप्रियता महज़ इंटरनेट की देन नहीं थी — इसके पीछे दशकों की साधना और मंच पर हज़ारों घंटों की मेहनत थी।

निधन और विरासत

11 अगस्त 2020 को कोरोना संक्रमण के दौरान अस्पताल में भर्ती रहने के बाद राहत इंदौरी ने अंतिम सांस ली। उनके जाने की खबर से साहित्य, फिल्म और कला जगत में शोक की लहर दौड़ गई। उनकी शायरी आज भी मंचों पर गूँजती है और सोशल मीडिया पर जीवित है — यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिसे अभिजात्य और क्लिष्ट माना जाता है, उनके हाथों में चाय की दुकान और चौराहे की भाषा बन गई। यह महज़ संयोग नहीं था; यह उस खिलाड़ी की सोच थी जिसने मैदान पर टीम को साथ लेकर चलना सीखा था। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर उन्हें 'वायरल शायर' तक सीमित कर देती है, जबकि असली बात यह है कि दशकों के मुशायरों ने उनकी शायरी को वह गहराई दी जो किसी एल्गोरिदम से नहीं आती। उनकी विरासत यह सवाल भी छोड़ती है — क्या हम अपने साहित्यकारों को उनके जीते-जी वह सम्मान देते हैं जो उनके जाने के बाद सोशल मीडिया पर उमड़ता है?
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

राहत इंदौरी कौन थे और उनकी शायरी इतनी मशहूर क्यों है?
राहत इंदौरी उर्दू के प्रसिद्ध शायर थे जिन्होंने आम आदमी की भाषा में जिंदगी, मोहब्बत और समाज को बयान किया। उनकी शायरी में सरलता और गहराई का अनूठा संगम था, जिसने उन्हें मुशायरों से लेकर सोशल मीडिया तक हर पीढ़ी का चहेता बनाया।
'बुलाती है मगर जाने का नहीं' पंक्ति इतनी वायरल क्यों हुई?
यह पंक्ति जिंदगी की उस कशमकश को बयान करती है जो हर इंसान महसूस करता है — जाना है लेकिन जाने का मन नहीं। सोशल मीडिया के दौर में इसे अनगिनत मीम्स और पोस्ट में इस्तेमाल किया गया, जिससे यह इंटरनेट संस्कृति का हिस्सा बन गई।
राहत इंदौरी ने शायरी से पहले क्या किया था?
राहत इंदौरी ने शायरी से पहले स्कूल और कॉलेज स्तर पर हॉकी और फुटबॉल दोनों टीमों की कप्तानी की थी। उन्होंने खुद एक इंटरव्यू में बताया था कि शुरुआत में वह खुद को खिलाड़ी के रूप में देखते थे और मैदान को नेतृत्व सीखने की जगह मानते थे।
राहत इंदौरी का निधन कब और कैसे हुआ?
राहत इंदौरी का निधन 11 अगस्त 2020 को 70 वर्ष की उम्र में हुआ। कोरोना संक्रमण के दौरान उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहाँ उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके जाने से साहित्य और फिल्म जगत में शोक की लहर दौड़ गई।
राहत इंदौरी ने कौन-कौन सी मशहूर फिल्मों के गाने लिखे?
राहत इंदौरी ने 'इश्क' फिल्म के लिए 'नींद चुराई मेरी', 'करीब' के लिए 'चोरी-चोरी जब नजरें मिलीं', 'मुन्ना भाई एमबीबीएस' के लिए 'छन छन' और 'मर्डर' फिल्म के लिए 'दिल को हजार बार रोका' जैसे यादगार गीत लिखे।
राष्ट्र प्रेस
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