रिद्धि डोगरा ने याद किए मुंबई लोकल ट्रेन के संघर्ष के दिन, 2005 से शुरू हुई थी सफर की कहानी
सारांश
मुख्य बातें
अभिनेत्री रिद्धि डोगरा ने 1 जुलाई को इंस्टाग्राम पर एक भावुक पोस्ट साझा करते हुए मुंबई की भीड़भाड़ वाली लोकल ट्रेनों में बिताए संघर्ष के उन दिनों को याद किया, जब उन्होंने एक अनजान शहर में अपने सपनों की नींव रखी थी। जुलाई 2005 में कॉलेज से निकलकर मुंबई आई रिद्धि आज 'जवान' और 'द साबरमती रिपोर्ट' जैसी बड़ी फिल्मों में नज़र आ चुकी हैं।
मुंबई से पहली मुलाकात
रिद्धि ने अपनी पोस्ट में लिखा कि जुलाई 2005 में उनकी मुंबई की कहानी शुरू हुई थी। कॉलेज से नई-नई निकली थीं और बड़ी दुनिया में पढ़ने, घूमने-फिरने, जीने और सीखने के लिए उत्सुक थीं। उन्होंने लिखा, 'यह एक ऐसा शहर है, जो अनजाने में मुझे लंबे समय से बुला रहा था। मुझे इस शहर की हलचल भरी ज़िंदगी और आकर्षण में सुकून मिलता है।'
लोकल ट्रेन बनी संघर्ष की साथी
रिद्धि ने बताया कि 2005 से 2007 के बीच लोकल ट्रेनें उनकी सबसे पसंदीदा जगह बन गई थीं। वह एक ही दिन में कई तरह के वाहनों से सफर करती थीं — पहले कॉलेज जाती, फिर सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक की नौकरी पर। उन्होंने लिखा, 'मैं पूरा समय ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए और अपने भविष्य के सपनों के बारे में सोचते हुए मुस्कुराती रहती थी।'
रिद्धि ने यह भी साझा किया कि उन दिनों वह रोज़ाना विज़ुअलाइज़ेशन और मैनिफेस्टेशन का अभ्यास करती थीं, जिसे लोग तब 'दिन में सपना देखना' कहते थे। उन्होंने कहा, 'मुझे पूरा यकीन था कि मेरा भविष्य बहुत शानदार होने वाला है — और सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि मैं अपनी किस्मत की खुद मालिक थी।'
टीवी से बॉलीवुड तक का सफर
रिद्धि डोगरा को टेलीविज़न पर 'असुर' में नुसरत, 'द मैरिड वुमन' में आस्था, 'मर्यादा: लेकिन कब तक?' में प्रिया और 'वो अपना सा' में निशा के किरदार के लिए पहचान मिली। वह 'नच बलिए 6' और 'फियर फैक्टर: खतरों के खिलाड़ी 6' जैसे लोकप्रिय रियलिटी शो में भी नज़र आ चुकी हैं।
अपनी दमदार अदाकारी के बल पर उन्हें बड़े पर्दे पर भी जगह मिली। वह शाहरुख खान अभिनीत 'जवान', 'लकड़बग्घा' और 'द साबरमती रिपोर्ट' जैसी फिल्मों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुकी हैं।
संघर्ष से सफलता तक
रिद्धि की यह पोस्ट उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई है जो सपनों को लेकर मुंबई आते हैं। यह ऐसे समय में आई है जब मनोरंजन उद्योग में 'आउटसाइडर बनाम इनसाइडर' की बहस लगातार जारी रहती है — और रिद्धि की कहानी इस बात का प्रमाण है कि कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प से रास्ता बनता है। आने वाले समय में उनकी और परियोजनाओं पर प्रशंसकों की नज़रें टिकी हैं।