31 अगस्त 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

'सहिया' को CBFC का नक्सलवाद का ठप्पा, प्रोड्यूसर संजय शर्मा बोले — सर्टिफिकेट न मिला तो कोर्ट जाएंगे

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
'सहिया' को CBFC का नक्सलवाद का ठप्पा, प्रोड्यूसर संजय शर्मा बोले — सर्टिफिकेट न मिला तो कोर्ट जाएंगे

सारांश

छत्तीसगढ़ के जंगलों में शूट हुई प्रेम कहानी 'सहिया' CBFC के नक्सलवाद के आरोप में फँसी है। प्रोड्यूसर संजय शर्मा का कहना है कि फिल्म हिंसा के खिलाफ है, न कि उसके समर्थन में — और अगर रिव्यू कमेटी ने भी रोका, तो कोर्ट जाएंगे।

मुख्य बातें

फिल्म 'सहिया' पर CBFC ने नक्सलवाद से जुड़े होने का आरोप लगाकर सर्टिफिकेट देने में अड़चन पैदा की है।
प्रोड्यूसर संजय शर्मा ने कहा कि फिल्म हिंसा-विरोधी संदेश देती है और नक्सलवाद का समर्थन कहीं नहीं करती।
एक वरिष्ठ CBFC अधिकारी ने कथित तौर पर कहा कि उत्तर प्रदेश में शूट हुई होती तो सर्टिफिकेट मिल जाता — जिसे शर्मा ने तर्कहीन बताया।
फिल्म को रिव्यू कमेटी के सामने 5 दिन में पेश किया जाना था, लेकिन 21 दिन बाद देखी गई।
शर्मा ने चेतावनी दी कि रिव्यू कमेटी से भी सर्टिफिकेट न मिला तो वे न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाएंगे।

फिल्म 'सहिया' के प्रोड्यूसर संजय शर्मा इन दिनों केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) से सर्टिफिकेट हासिल करने की लड़ाई लड़ रहे हैं। छत्तीसगढ़ के घने जंगलों और आदिवासी समाज की पृष्ठभूमि पर बनी यह प्रेम कहानी कथित तौर पर CBFC की आपत्तियों में उलझ गई है, जिसने फिल्म पर नक्सलवाद से जुड़े होने का आरोप लगाया है। शर्मा ने स्पष्ट किया है कि यदि रिव्यू कमेटी भी फिल्म को हरी झंडी नहीं देती, तो वे न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाने से नहीं हिचकेंगे।

फिल्म की कहानी और CBFC का आरोप

संजय शर्मा के अनुसार, 'सहिया' मूलतः एक आदिवासी युवक की प्रेम कहानी है, जो नक्सलियों और पुलिस के बीच के संघर्ष में फँसा हुआ है। उन्होंने कहा, 'सहिया' असल में एक खूबसूरत लव स्टोरी है, जो नक्सलवाद और पुलिस के संघर्ष के बीच फंसे एक आदिवासी के प्यार की कहानी दिखाती है। फिल्म का मकसद नक्सलवाद को दिखाना या उसका समर्थन करना नहीं है, बल्कि फिल्म में एक आम आदमी नक्सली से चीख-चीखकर कहता है कि हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं है और बंदूक कोई रास्ता नहीं है।' शर्मा ने जोर देकर कहा कि पूरी फिल्म का आधार प्यार और इंसानी रिश्ते हैं।

शूटिंग लोकेशन बनी विवाद की जड़

प्रोड्यूसर ने बताया कि फिल्म की शूटिंग छत्तीसगढ़ के जंगलों और आदिवासी इलाकों में जानबूझकर की गई ताकि कहानी प्रामाणिक लगे। उन्होंने एक वरिष्ठ CBFC अधिकारी के साथ हुई बातचीत का हवाला देते हुए कहा कि उस अधिकारी ने कथित तौर पर कहा — यदि फिल्म की शूटिंग उत्तर प्रदेश में हुई होती, तो सर्टिफिकेट मिल जाता। शर्मा ने इस पर सवाल उठाया: 'कहानी और फिल्म वही है, लेकिन सिर्फ शूटिंग की जगह बदल जाने से फिल्म का मतलब कैसे बदल सकता है? मुझे इस बात की चिंता है कि कहीं ऐसी सोच की वजह से आदिवासी इलाकों को फिल्मों की शूटिंग से ही दूर न कर दिया जाए।'

रिव्यू कमेटी में 21 दिन की देरी पर सवाल

शर्मा ने प्रमाणन प्रक्रिया में हुई देरी को भी उठाया। उनके अनुसार, फिल्म को रिव्यू कमेटी के सामने 5 दिन के भीतर प्रस्तुत किया जाना था, लेकिन वास्तव में यह 21 दिन बाद देखी गई। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय सिनेमा से जुड़े कलाकारों और निर्माताओं के लिए इस तरह की देरी वित्तीय और रचनात्मक दोनों स्तरों पर भारी नुकसान पहुँचाती है।

CBFC की पारदर्शिता पर सवाल

प्रोड्यूसर ने यह भी कहा कि रिव्यू कमेटी ने उन्हें स्पष्ट रूप से यह नहीं बताया कि फिल्म का कौन-सा दृश्य नक्सलवाद से प्रेरित माना जा रहा है। उन्होंने कहा, 'जब बोर्ड किसी खास सीन की ओर इशारा नहीं कर पा रहा, तो पूरी फिल्म को इस आधार पर रोकना कैसे सही हो सकता है? सेंसर बोर्ड की प्रक्रिया में पारदर्शिता जरूरी है।' शर्मा ने यह भी कहा कि उन्हें लगता है कि बोर्ड ने पहले ही तय कर लिया था कि फिल्म को अनुमति नहीं देनी है।

आगे क्या होगा

अब सारी निगाहें रिव्यू कमेटी के अंतिम फैसले पर टिकी हैं। यदि कमेटी फिल्म को प्रमाणित करती है, तो विवाद यहीं समाप्त हो सकता है। लेकिन यदि फिल्म को फिर से रोका जाता है, तो शर्मा ने न्यायालय जाने का पूरा मन बना लिया है। उन्होंने कहा कि उन्हें शत-प्रतिशत भरोसा है कि अदालत फिल्म की विषयवस्तु को समझेगी और उसे पास करेगी। यह मामला भारतीय सिनेमा में रचनात्मक स्वतंत्रता और प्रमाणन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर एक बड़ी बहस छेड़ सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

न कि विषयवस्तु के निष्पक्ष मूल्यांकन की ओर। CBFC का यह भी न बता पाना कि कौन-सा दृश्य आपत्तिजनक है, पारदर्शिता की गंभीर कमी दर्शाता है। यदि क्षेत्रीय सिनेमा के निर्माता यह सीख लें कि आदिवासी इलाकों में शूटिंग खतरे को न्योता है, तो भारत की सांस्कृतिक विविधता को परदे पर लाने वाली आवाज़ें और भी कम हो जाएंगी।
RashtraPress
31 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

फिल्म 'सहिया' पर CBFC की क्या आपत्ति है?
CBFC ने फिल्म 'सहिया' पर नक्सलवाद से जुड़े होने का आरोप लगाते हुए उसे सर्टिफिकेट देने में अड़चन पैदा की है। हालाँकि, प्रोड्यूसर संजय शर्मा के अनुसार बोर्ड ने कोई ठोस दृश्य चिह्नित नहीं किया जो आपत्तिजनक हो।
फिल्म 'सहिया' किस बारे में है?
यह छत्तीसगढ़ के जंगलों और आदिवासी समाज की पृष्ठभूमि पर बनी एक प्रेम कहानी है, जिसमें एक आदिवासी युवक नक्सलियों और पुलिस के संघर्ष के बीच फँसा है। फिल्म का केंद्रीय संदेश हिंसा-विरोधी है।
प्रोड्यूसर संजय शर्मा कोर्ट क्यों जाना चाहते हैं?
यदि रिव्यू कमेटी भी फिल्म को सर्टिफिकेट देने से इनकार करती है, तो संजय शर्मा न्यायालय में चुनौती देने की तैयारी में हैं। उन्हें विश्वास है कि अदालत फिल्म की विषयवस्तु को निष्पक्षता से देखेगी।
रिव्यू कमेटी में 21 दिन की देरी क्यों हुई?
नियमों के अनुसार फिल्म को 5 दिन के भीतर रिव्यू कमेटी के सामने रखा जाना था, लेकिन यह 21 दिन बाद दिखाई गई। प्रोड्यूसर ने इसे क्षेत्रीय सिनेमा के निर्माताओं के लिए गंभीर समस्या बताया है।
क्या शूटिंग लोकेशन सर्टिफिकेशन को प्रभावित कर सकती है?
संजय शर्मा के अनुसार एक वरिष्ठ CBFC अधिकारी ने कथित तौर पर संकेत दिया कि उत्तर प्रदेश में शूट हुई होती तो फिल्म पास हो जाती। शर्मा ने इसे तर्कहीन बताते हुए कहा कि कहानी एक ही है — केवल लोकेशन बदलने से फिल्म का अर्थ नहीं बदलता।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 5 दिन पहले
  2. 1 महीना पहले
  3. 3 महीने पहले
  4. 4 महीने पहले
  5. 6 महीने पहले
  6. 1 साल पहले
  7. 1 साल पहले
  8. 1 साल पहले