संजय गुप्ता का बड़ा बयान: बोरिंग कहानियाँ और ₹700 का पॉपकॉर्न भगा रहे दर्शकों को सिनेमाघरों से
सारांश
मुख्य बातें
फिल्म निर्देशक संजय गुप्ता ने 7 जून 2026 को एक्स पर एक पोस्ट के ज़रिए हिंदी सिनेमा की घटती दर्शक संख्या पर सीधा निशाना साधा — और दोष डिजिटल प्लेटफॉर्म पर नहीं, बल्कि खुद फिल्म उद्योग की कमज़ोरियों पर लगाया। उनका कहना है कि दर्शकों ने सिनेमा नहीं छोड़ा, बल्कि इंडस्ट्री ने दर्शकों को निराश किया है।
संजय गुप्ता ने क्या कहा
गुप्ता ने अपनी एक्स पोस्ट में लिखा, 'फिल्मों की मौजूदा स्थिति के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म को दोष देना सही नहीं है। लोग अक्सर मान लेते हैं कि ऑनलाइन वीडियो प्लेटफॉर्म, वेब सीरीज और घर बैठे मनोरंजन की सुविधा ने सिनेमाघरों का महत्व कम कर दिया है, लेकिन असली समस्या कहीं और है। जब दर्शकों को अच्छी कहानी, नया कंटेंट और यादगार अभिनय नहीं मिलता तो वे सिनेमाघरों की ओर आकर्षित नहीं होते।'
उन्होंने महंगाई का मुद्दा भी उठाया। उनके अनुसार, सिनेमाघरों में एक बड़े डिब्बे पॉपकॉर्न की कीमत लगभग ₹700 और एक कोल्ड ड्रिंक की कीमत करीब ₹450 तक पहुँच गई है, जिससे एक सामान्य परिवार के लिए फिल्म देखना भारी खर्च का सौदा बन जाता है।
कमज़ोर कंटेंट पर सीधा प्रहार
गुप्ता ने अपनी पोस्ट में आगे लिखा, 'फिल्मों को खत्म करने का काम किसी डिजिटल प्लेटफॉर्म ने नहीं किया है। इसके पीछे कमज़ोर कहानियाँ, बिना मेहनत के लिखी गई पटकथाएँ और ऐसे सितारे ज़िम्मेदार हैं, जिन्होंने दर्शकों को चौंकाना और कुछ नया देना लगभग बंद कर दिया है।' उन्होंने स्पष्ट किया कि दर्शक आज भी मौजूद हैं और अच्छी फिल्मों का इंतज़ार कर रहे हैं — समस्या रुचि की नहीं, बल्कि गुणवत्ता की है।
सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़
गुप्ता की इस पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा छिड़ गई। कई उपयोगकर्ताओं ने उनके विचारों का समर्थन किया और माँग की कि फिल्म उद्योग अपनी कमियों पर गंभीरता से विचार करे। एक उपयोगकर्ता ने लिखा, 'सिर्फ महंगे खाने-पीने की चीजें ही नहीं, बल्कि टिकटों की बढ़ती कीमतें भी बड़ी वजह हैं।'
एक अन्य उपयोगकर्ता ने कहा, 'मल्टीप्लेक्स कल्चर के बढ़ने के बाद फिल्म इंडस्ट्री ने छोटे शहरों और सिंगल-स्क्रीन सिनेमाघरों के दर्शकों को नज़रअंदाज़ करना शुरू कर दिया।' यह टिप्पणी इस बहस के एक और अनदेखे पहलू की ओर इशारा करती है।
व्यापक संदर्भ: सिनेमाघरों की बदलती तस्वीर
यह ऐसे समय में आया है जब बॉलीवुड की कई बड़े बजट की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाई हैं, जबकि कम बजट की और मजबूत कहानी वाली फिल्मों ने अच्छी कमाई की है। गौरतलब है कि 'स्त्री 2', 'लापता लेडीज़' जैसी फिल्मों की सफलता यह साबित करती है कि दर्शक सिनेमाघर आने के लिए तैयार हैं — बशर्ते कंटेंट उनकी उम्मीदों पर खरा उतरे।
आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या फिल्म उद्योग गुप्ता जैसे अनुभवी निर्देशकों की इस चेतावनी पर ध्यान देता है और कंटेंट की गुणवत्ता सुधारने के साथ-साथ सिनेमाघरों में खाने-पीने की कीमतों पर भी पुनर्विचार करता है।