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ठुमरी की रानी सिद्धेश्वरी देवी: जब केएल सहगल ने लाहौर मंच पर की थी उनकी पैरवी

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ठुमरी की रानी सिद्धेश्वरी देवी: जब केएल सहगल ने लाहौर मंच पर की थी उनकी पैरवी

सारांश

लाहौर के उस मंच पर जब दर्शक केएल सहगल के लिए आए थे, तब एक युवा सिद्धेश्वरी देवी की आवाज़ ने पूरे सभागार को थाम लिया — सहगल की पैरवी के बाद। 'ठुमरी की रानी' की यह यात्री वाराणसी की गलियों से शुरू होकर पद्मश्री और देशिकोत्तम तक पहुँची।

मुख्य बातें

सिद्धेश्वरी देवी का जन्म 8 अगस्त 1908 को वाराणसी, उत्तर प्रदेश में हुआ; उन्हें 'ठुमरी की रानी' कहा जाता था।
सन् 1930 में लाहौर समारोह में केएल सहगल ने स्वयं मंच पर आकर दर्शकों से उनकी गायकी सुनने की अपील की थी।
उन्होंने पंडित सियाजी महाराज, उस्ताद राजब अली खान और उस्ताद इनायत खान से प्रशिक्षण लिया; पंडित बड़े रामदास को मुख्य गुरु मानती थीं।
महान गायिका एमएस सुब्बुलक्ष्मी ने उनसे भजन गायकी की बारीकियाँ सीखी थीं।
भारत सरकार ने 1966 में उन्हें पद्मश्री और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया।
18 मार्च 1977 को नई दिल्ली में उनका निधन हुआ।

सिद्धेश्वरी देवी — जिन्हें 'ठुमरी की रानी' के नाम से जाना जाता है — की आवाज़ में विरह, भक्ति और प्रेम की ऐसी अनूठी गहराई थी कि श्रोता पहली तान पर ही उनके संगीत में डूब जाते थे। उनका जन्म 8 अगस्त 1908 को वाराणसी, उत्तर प्रदेश में हुआ था, और उनका निधन 18 मार्च 1977 को नई दिल्ली में हुआ। उनके जीवन से जुड़ा एक बहुचर्चित प्रसंग 1930 के लाहौर संगीत समारोह का है, जब मशहूर गायक केएल सहगल स्वयं मंच पर आए और दर्शकों से उन्हें ध्यान से सुनने की अपील की।

संगीत की दुनिया में अनोखी शुरुआत

सिद्धेश्वरी देवी का परिवार संगीत की परंपरा से जुड़ा था — उनकी दादी मैना देवी एक प्रसिद्ध गायिका थीं। बचपन में ही माता-पिता के निधन के बाद उनका पालन-पोषण उनकी मौसी राजेश्वरी देवी ने किया, जो स्वयं संगीत की जानकार थीं। घर में संगीत की शिक्षा उनकी मौसी की बेटी को दी जा रही थी, जबकि सिद्धेश्वरी घरेलू कामों में लगी रहती थीं।

कहा जाता है कि एक दिन गुरु पंडित सियाजी महाराज एक कठिन धुन न गा पाने पर नाराज़ हो गए, तब सिद्धेश्वरी ने वही धुन सहज रूप से गाकर सबको चकित कर दिया। उनकी असाधारण प्रतिभा को पहचानते हुए पंडित सियाजी महाराज ने उन्हें संगीत की विधिवत शिक्षा देने का निर्णय लिया — यही वह मोड़ था जिसने भारतीय शास्त्रीय संगीत को एक अमर आवाज़ दी।

गुरुओं की छत्रछाया में निखरी कला

सिद्धेश्वरी देवी ने पंडित सियाजी महाराज से सारंगी और संगीत की आरंभिक शिक्षा ली। इसके पश्चात उन्होंने उस्ताद राजब अली खान और उस्ताद इनायत खान जैसे दिग्गज कलाकारों से भी प्रशिक्षण प्राप्त किया। किंतु वह पंडित बड़े रामदास को अपना प्रमुख गुरु मानती थीं। उनकी गायकी में बनारस घराने की विशिष्ट मिठास और भावनात्मक गहराई का सम्मिश्रण साफ़ झलकता था।

लाहौर का वह ऐतिहासिक क्षण

सन् 1930 में लाहौर में आयोजित एक संगीत समारोह में दर्शक मुख्यतः केएल सहगल को सुनने आए थे। जब मंच-संचालक ने एक युवा गायिका के रूप में सिद्धेश्वरी देवी का नाम घोषित किया, तो कुछ श्रोताओं में उत्साह का अभाव स्पष्ट था। बताया जाता है कि उस समय केएल सहगल स्वयं मंच पर आए और दर्शकों से आग्रह किया कि वे इस गायिका को पूरे मनोयोग से सुनें। इसके बाद सभागार में शांति छा गई और सिद्धेश्वरी देवी की आवाज़ ने हर श्रोता को मंत्रमुग्ध कर दिया। यह प्रसंग संगीत जगत के अनेक आलेखों में उद्धृत होता रहा है।

विधाओं का विस्तार और राष्ट्रीय पहचान

सिद्धेश्वरी देवी की पहचान मुख्यतः ठुमरी गायिका के रूप में रही, जिसमें शब्द और भाव का संतुलन सर्वोपरि होता है। इसके अतिरिक्त वह ख्याल, दादरा, कजरी, चैती, होरी और भजन भी गाती थीं। उन्होंने राजदरबारों से लेकर बड़े संगीत समारोहों तक अपनी कला का प्रदर्शन किया और ऑल इंडिया रेडियो तथा दूरदर्शन से भी जुड़ी रहीं। देर रात तक दर्शक उनकी प्रस्तुति का इंतज़ार करते थे।

गौरतलब है कि दक्षिण भारत की महान गायिका एमएस सुब्बुलक्ष्मी ने भी उनसे भजन गायकी की बारीकियाँ सीखी थीं — यह तथ्य उनकी अखिल भारतीय संगीत-प्रतिष्ठा का प्रमाण है।

सम्मान और विरासत

भारत सरकार ने 1966 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। उसी वर्ष उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी प्रदान किया गया। इसके अलावा रवींद्र भारती विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डी.लिट. की उपाधि और विश्व भारती विश्वविद्यालय ने 'देशिकोत्तम' सम्मान दिया। जीवन के अंतिम वर्षों में 1976 में लकवे के कारण उनकी गतिशीलता प्रभावित हुई और 18 मार्च 1977 को नई दिल्ली में उनका निधन हो गया। उनकी आवाज़ आज भी रिकॉर्डिंग्स के माध्यम से ठुमरी प्रेमियों के दिलों में जीवित है।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो इतिहास बनता है। यह भी विचारणीय है कि एमएस सुब्बुलक्ष्मी जैसी दक्षिण भारतीय महान गायिका का उनसे सीखना, भारतीय शास्त्रीय संगीत की उस साझी नदी की याद दिलाता है जो घरानों और भाषाओं की सीमाएँ नहीं मानती। आज जब ठुमरी को मुख्यधारा में वह स्थान नहीं मिलता जो उसे मिलना चाहिए, सिद्धेश्वरी देवी की विरासत एक ज़रूरी याद-दिहानी है।
RashtraPress
7 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सिद्धेश्वरी देवी को 'ठुमरी की रानी' क्यों कहा जाता था?
सिद्धेश्वरी देवी की ठुमरी गायकी में भाव और शब्द का अद्वितीय संतुलन था — प्रेम, विरह और भक्ति को वह अपनी आवाज़ के ज़रिए इस गहराई से व्यक्त करती थीं कि श्रोता भावविभोर हो जाते थे। बनारस घराने की परंपरा में पारंगत होने के कारण उनकी ठुमरी को उस विधा की सर्वोच्च अभिव्यक्ति माना जाता था।
लाहौर में केएल सहगल ने सिद्धेश्वरी देवी के लिए क्या किया था?
सन् 1930 में लाहौर के एक संगीत समारोह में दर्शक मुख्यतः केएल सहगल को सुनने आए थे। जब सिद्धेश्वरी देवी का नाम घोषित हुआ तो कुछ श्रोता उत्साहित नहीं थे, तब केएल सहगल स्वयं मंच पर आए और दर्शकों से उन्हें ध्यानपूर्वक सुनने की अपील की। इसके बाद सिद्धेश्वरी देवी की गायकी ने पूरे सभागार को मंत्रमुग्ध कर दिया।
सिद्धेश्वरी देवी के गुरु कौन थे?
उन्होंने सर्वप्रथम पंडित सियाजी महाराज से संगीत की शिक्षा ली, जिन्होंने उनकी प्रतिभा को पहचाना था। बाद में उस्ताद राजब अली खान और उस्ताद इनायत खान से भी प्रशिक्षण प्राप्त किया, किंतु वह पंडित बड़े रामदास को अपना मुख्य गुरु मानती थीं।
सिद्धेश्वरी देवी को कौन-कौन से सम्मान मिले?
भारत सरकार ने 1966 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया और उसी वर्ष उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार भी मिला। इसके अतिरिक्त रवींद्र भारती विश्वविद्यालय ने उन्हें मानद डी.लिट. और विश्व भारती विश्वविद्यालय ने 'देशिकोत्तम' सम्मान प्रदान किया।
एमएस सुब्बुलक्ष्मी का सिद्धेश्वरी देवी से क्या संबंध था?
दक्षिण भारत की महान गायिका एमएस सुब्बुलक्ष्मी ने सिद्धेश्वरी देवी से भजन गायकी की बारीकियाँ सीखी थीं। यह तथ्य सिद्धेश्वरी देवी की उस अखिल भारतीय संगीत-प्रतिष्ठा का प्रमाण है जो घरानों और भाषाई सीमाओं से परे थी।
राष्ट्र प्रेस
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