4-डे वर्क वीक पर विक्रांत मैसी का जवाब: 'भारत को अभी 30-50 साल और मेहनत करनी होगी'
सारांश
मुख्य बातें
अभिनेता विक्रांत मैसी ने 22 जुलाई 2026 को वेब सीरीज 'मुसाफिर कैफे' के प्रमोशन के दौरान 4-डे वर्क वीक पर अपना स्पष्ट और जमीनी नजरिया पेश किया — उनका कहना है कि यह अवधारणा भारत में फिलहाल व्यावहारिक नहीं है।
विक्रांत मैसी का मुख्य तर्क
मैसी ने कहा कि उत्तरी यूरोप के देशों में जिस तरह की जीवनशैली और काम करने का तरीका अपनाया जाता है, वैसा भारत में अभी संभव नहीं है। उन्होंने कहा, 'हम अभी भी एक विकासशील अर्थव्यवस्था हैं और हमारा लोकतंत्र अभी काफी युवा है। एक देश के रूप में हमें अभी बहुत कुछ हासिल करना है — यह सिर्फ हमारे लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के बेहतर भविष्य के लिए भी जरूरी है।'
भारत की विकास यात्रा और श्रम संस्कृति
अभिनेता ने यह भी जोड़ा कि यदि भारत आने वाले दशकों में अपनी पूरी क्षमता का उपयोग करना चाहता है, तो कड़ी मेहनत अपरिहार्य है। उन्होंने कहा, 'अगर हम सच में भारत को आगे बढ़ते हुए देखना चाहते हैं और उसकी असली क्षमता का इस्तेमाल करना चाहते हैं, तो एक युवा देश के तौर पर, कम से कम अगले 30, 40 या 50 सालों तक, हमें सच में बहुत मेहनत करनी होगी।' यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब वैश्विक स्तर पर 4-डे वर्क वीक को लेकर बहस तेज हो रही है और कई पश्चिमी देश इसे पायलट आधार पर लागू कर चुके हैं।
मनोरंजन उद्योग की कार्यस्थितियाँ
मैसी ने फिल्म और वेब इंडस्ट्री की कार्यसंस्कृति पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि यह उद्योग बेहद खर्चीला है और शूटिंग के घंटे अनिश्चित रहते हैं। उनके अनुसार, '12 घंटे की शिफ्ट में भी असल शूटिंग केवल चार या पाँच घंटे होती है, जबकि कभी-कभी बजट और व्यावहारिक कारणों से 16-17 घंटे तक काम करना पड़ता है।' गौरतलब है कि मनोरंजन जगत में काम के अनिश्चित घंटे और छुट्टियों की कमी लंबे समय से चर्चा का विषय रहे हैं।
वैश्विक बनाम भारतीय संदर्भ
दुनियाभर में 4-डे वर्क वीक को लेकर शोध और परीक्षण जारी हैं। आलोचकों का कहना है कि भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था में श्रम उत्पादकता और आर्थिक विकास की प्राथमिकताएँ अभी भी यूरोपीय देशों से भिन्न हैं। मैसी का यह बयान उसी व्यापक बहस में एक व्यावहारिक भारतीय दृष्टिकोण जोड़ता है।
आगे का परिदृश्य
विक्रांत मैसी की वेब सीरीज 'मुसाफिर कैफे' जल्द दर्शकों के सामने आने वाली है। वर्क-लाइफ बैलेंस पर उनकी यह राय भारतीय कामकाजी वर्ग के बीच व्यापक चर्चा को जन्म दे सकती है।