विश्व बाघ दिवस 2026: रणदीप हुड्डा और श्रिया पिलगांवकर ने माँगी वन्यजीव गलियारों की सुरक्षा
सारांश
मुख्य बातें
अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस पर 29 जुलाई 2026 को अभिनेता रणदीप हुड्डा और अभिनेत्री श्रिया पिलगांवकर ने इंस्टाग्राम के ज़रिए बाघों के प्राकृतिक आवास और वन्यजीव गलियारों की रक्षा का आह्वान किया। दोनों कलाकारों ने बाघों की बढ़ती संख्या के साथ-साथ उनके जंगलों को बचाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया।
रणदीप हुड्डा का संदेश: संख्या नहीं, आवास बचाओ
वन्यजीव प्रेमी रणदीप हुड्डा ने इंस्टाग्राम पर बाघ की तस्वीरें साझा करते हुए एक तीखा सवाल उठाया। उन्होंने लिखा, 'हम बाघों की बढ़ती संख्या पर गर्व तो करते हैं लेकिन दूसरी ओर खनन और विकास परियोजनाओं के नाम पर उनके जंगलों और उन रास्तों को लगातार नष्ट कर रहे हैं, जिन पर उनका जीवन निर्भर करता है।'
उन्होंने आगे लिखा, 'बाघों को बचाने का मतलब सिर्फ उनकी संख्या बढ़ाना नहीं है बल्कि उनके प्राकृतिक आवास और जंगलों की रक्षा करना भी है। अगर हम उनके घरों को बचाएंगे, तो हम प्रकृति और आखिरकार खुद को भी सुरक्षित रख पाएंगे।' यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब देश में कई वन्यजीव गलियारे खनन और बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं के दबाव में हैं।
श्रिया पिलगांवकर का अनुभव: जंगल में पहली मुलाकात
अभिनेत्री श्रिया पिलगांवकर ने इंस्टाग्राम पर बाघों की तस्वीरें पोस्ट करते हुए अपना एक निजी अनुभव साझा किया। उन्होंने लिखा, 'पहली बार जंगल में बाघों को उनके प्राकृतिक आवास में देखना मेरे जीवन के सबसे यादगार अनुभवों में से एक था। उन्हें खुले जंगल में देखना मन को विनम्रता और प्रकृति के प्रति सम्मान से भर देता है।'
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आज भारत दुनिया में सबसे अधिक जंगली बाघों का घर है और विश्व के लगभग 70 प्रतिशत जंगली बाघ भारत में पाए जाते हैं।
वन्यजीव संरक्षण का व्यापक संदर्भ
श्रिया पिलगांवकर ने अपने संदेश में स्पष्ट किया, 'यह इस बात की याद दिलाता है कि वन्यजीव संरक्षण कितना जरूरी है। हमारे जंगलों की रक्षा करना सिर्फ बाघों को बचाना नहीं बल्कि पूरी प्रकृति और उससे जुड़े जीवन को सुरक्षित रखना है।' गौरतलब है कि हर वर्ष 29 जुलाई को अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस मनाया जाता है, जिसकी शुरुआत 2010 में सेंट पीटर्सबर्ग टाइगर समिट से हुई थी।
आम जनता पर असर और आगे की राह
दोनों कलाकारों की यह अपील सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से साझा की गई। विशेषज्ञों का मानना है कि सार्वजनिक हस्तियों की आवाज़ वन्यजीव संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाती है। बाघ संरक्षण केवल गिनती तक सीमित नहीं, बल्कि उनके प्राकृतिक आवास और गलियारों की निरंतर रक्षा पर भी निर्भर करता है।