72वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड में योगेश देशपांडे को बेस्ट अडैप्टेड स्क्रीनप्ले, बोले — 'मेहनत, रिसर्च और सच्चाई ही असली पुरस्कार'
सारांश
मुख्य बातें
स्क्रीनराइटर योगेश देशपांडे को 18 जुलाई 2026 को घोषित 72वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स में मराठी फिल्म 'स्वरगंधर्व सुधीर फड़के' के लिए बेस्ट अडैप्टेड स्क्रीनप्ले पुरस्कार से सम्मानित किया गया। पुणे के इस लेखक ने इस सम्मान को भारतीय सिनेमा में ईमानदार और शोध-आधारित लेखन की स्वीकृति बताया।
पुरस्कार पर पहली प्रतिक्रिया
योगेश देशपांडे ने कहा, 'राष्ट्रीय पुरस्कार मिलना किसी भी कलाकार और लेखक के लिए बहुत बड़ा सम्मान है। एक अच्छी कहानी लिखने के लिए लगातार सीखना, अध्ययन करना और किरदारों की सच्चाई को समझना बेहद जरूरी है।' उन्होंने कहा कि स्क्रीनराइटिंग केवल शब्द लिखने की कला नहीं, बल्कि किसी किरदार की पूरी दुनिया को दर्शकों तक पहुँचाने की जिम्मेदारी भी है।
सुधीर फड़के की जीवनी लिखना — सबसे बड़ी चुनौती
देशपांडे ने बताया कि महान संगीतकार सुधीर फड़के — जिन्हें प्रेम से 'बाबूजी' कहा जाता था — की जीवन-यात्रा को पर्दे पर उतारना उनके करियर की सबसे बड़ी चुनौती रही। लता मंगेशकर और आशा भोसले जैसे दिग्गजों के साथ काम कर चुके सुधीर फड़के हिंदी और मराठी सिनेमा के संगीत-जगत में एक अमिट नाम हैं।
उन्होंने कहा, 'बाबूजी जैसे बड़े व्यक्तित्व की कहानी को पर्दे पर दिखाना एक बड़ी जिम्मेदारी थी, क्योंकि लोगों के दिल में उनके लिए बहुत सम्मान है।' सुधीर फड़के के पुत्र और स्वयं प्रतिष्ठित संगीतकार-गायक श्रीधर फड़के ने भी लेखन के दौरान यह अपेक्षा जताई थी कि बाबूजी के जीवन से जुड़ी कोई गलत छवि सामने न आए।
तीन साल की रिसर्च और परिवार का साथ
देशपांडे ने बताया कि उन्होंने तीन वर्षों तक लगातार शोध किया — सुधीर फड़के के परिवार से मुलाकात की, विस्तृत बातचीत की और उनके जीवन के हर पहलू को समझने की कोशिश की। उनका लक्ष्य महज एक दस्तावेज़ी विवरण नहीं, बल्कि एक ऐसा सिनेमाई अनुभव देना था जिसमें कहानी की मजबूती और किरदार की प्रामाणिकता दोनों बनी रहें।
उन्होंने कहा, 'हर सीन और हर संवाद लिखते समय यह ध्यान रखना जरूरी था कि किरदार वास्तविक लगे और दर्शकों को ऐसा महसूस न हो कि कहानी में अनावश्यक बदलाव किए गए हैं।' इस लंबी यात्रा में उनकी पत्नी और बच्चों ने उन्हें पूरा समय और सहयोग दिया, जिसके लिए उन्होंने परिवार का विशेष आभार जताया।
संगीत को कहानी का अभिन्न हिस्सा बनाया
देशपांडे ने बताया कि फिल्म में सुधीर फड़के के कई लोकप्रिय गीतों को कथा का अंग बनाया गया, ताकि नई पीढ़ी भी उनके संगीत और योगदान को आत्मसात कर सके। उन्होंने कहा, 'हम सुधीर फड़के के गाने सुनते-सुनते बड़े हुए हैं।' फिल्म में संघर्ष से सफलता तक की उनकी प्रेरणादायक यात्रा को केंद्र में रखा गया है।
आगे की राह
नेशनल अवॉर्ड मिलने के बाद देशपांडे ने कहा कि एक लेखक के तौर पर उनकी जिम्मेदारी अब और बढ़ गई है। वह आगे भी ऐसी कहानियाँ लिखना चाहते हैं जिनमें भारतीय संस्कृति, समाज और लोगों की भावनाओं की सच्ची झलक दिखाई दे। यह सम्मान उन तमाम लेखकों के लिए एक संदेश है कि गहन शोध और ईमानदार लेखन को भारतीय सिनेमा में आज भी उचित मान-सम्मान मिलता है।